तृतीय केदार के नाम से विश्व विख्यात है तुंगनाथ धाम।  तुंगनाथ घाटी व चन्द्रशिला प्रकृति के अनूठे वैभवों से परिपूर्ण। 

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सम्पादक रुद्रप्रयागः लक्ष्मण सिंह नेगी

 

 

                      (नया अध्याय)

 

 

तृतीय केदार के नाम से विश्व विख्यात है तुंगनाथ धाम।

 

तुंगनाथ घाटी व चन्द्रशिला प्रकृति के अनूठे वैभवों से परिपूर्ण। 

 

 

 

            ऊखीमठ:  तुंगनाथ घाटी की ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य समुद्र तल से लगभग 3,680 मीटर की ऊंचाई पर स्थित तृतीय केदार तुंगनाथ धाम अपनी दिव्यता, प्राचीनता और आध्यात्मिक आभा के लिए विश्व विख्यात है। पंचकेदारों में तृतीय स्थान रखने वाला यह पवित्र धाम भगवान शिव की भुजाओं (बाहुओं) के रूप में पूजित है। मान्यता है कि महाभारत युद्ध के पश्चात पांडवों ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए यहां कठोर तप किया था, जिससे यह स्थल विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण माना जाता है। तुंगनाथ धाम का मंदिर पत्थरों की अद्भुत स्थापत्य शैली का अनुपम उदाहरण है, जिसे आदि शंकराचार्य द्वारा पुनर्स्थापित किया गया माना जाता है। मंदिर के गर्भ गृह में स्थापित स्वयंभू शिवलिंग श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र है। हर वर्ष ग्रीष्मकाल में हजारों श्रद्धालु कठिन पर्वतीय मार्ग पार कर यहां पहुंचते हैं और भगवान तुंगनाथ के दर्शन कर आध्यात्मिक शांति का अनुभव करते हैं। तुंगनाथ घाटी का प्राकृतिक सौंदर्य किसी स्वर्गिक अनुभूति से कम नहीं है। हरे-भरे बुग्याल, रंग-बिरंगे पुष्पों से सजे ढलान, शीतल हवाएं और चारों ओर फैली हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाएं पर्यटकों और प्रकृति प्रेमियों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं। विशेषकर वसंत और ग्रीष्म ऋतु में यह घाटी अपने पूरे यौवन पर होती है, जब बुग्यालों में खिलने वाले दुर्लभ फूल इस क्षेत्र की सुंदरता में चार चांद लगा देते हैं। तुंगनाथ धाम से लगभग डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर स्थित चन्द्रशिला शिखर ट्रैकिंग प्रेमियों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। समुद्र तल से लगभग 4,000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस शिखर से चौखम्भा पर्वत, नंदा देवी, त्रिशूल पर्वत तथा केदारनाथ , क्रौंच पर्वत शिखर सहित असंख्य हिमालयी चोटियों का विहंगम दृश्य एक साथ देखने को मिलता है। सूर्योदय और सूर्यास्त के समय यहां का दृश्य अत्यंत मोहक और अविस्मरणीय होता है, जब सुनहरी किरणें बर्फ से ढकी चोटियों को आलोकित कर दिव्य आभा बिखेरती हैं। चन्द्रशिला के विषय में धार्मिक मान्यता है कि यहां भगवान राम ने लंका विजय के पश्चात तपस्या की थी। यही कारण है कि यह स्थल न केवल प्राकृतिक दृष्टि से, बल्कि धार्मिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

 

तुंगनाथ घाटी में फैली शांत वादियां, कल-कल बहती जलधाराएं और शुद्ध वातावरण मन को आध्यात्मिकता से जोड़ते हैं। यहां की जैव विविधता भी अत्यंत समृद्ध है, जहां दुर्लभ वनस्पतियों और वन्यजीवों का निवास है। यह क्षेत्र न केवल श्रद्धालुओं, बल्कि ट्रैकिंग, फोटोग्राफी और प्रकृति अध्ययन करने वाले लोगों के लिए भी स्वर्ग समान है। तुंगनाथ घाटी के प्रसिद्ध कथावाचक लम्बोदर प्रसाद मैठाणी का कहना है कि तृतीय केदार तुंगनाथ धाम, तुंगनाथ घाटी और चन्द्रशिला का यह अद्वितीय संगम धार्मिक आस्था, प्राकृतिक सौंदर्य और साहसिक पर्यटन का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। देवभूमि उत्तराखंड का यह पावन स्थल हर आगंतुक को आध्यात्मिक ऊर्जा, मानसिक शांति और प्रकृति के सान्निध्य का अनुपम अनुभव प्रदान करता है।

 

आगामी 22 अप्रैल को खुलेंगे तुंगनाथ धाम के कपाट।

 

तृतीय केदार तुंगनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि वैसाखी पर्व पर शीतकालीन गद्दी स्थल मक्कूमठ में पंचांग गणना के अनुसार विधिवत घोषित कर दी गयी है। डोली प्रभारी प्रकाश पुरोहित ने बताया कि २० अप्रैल को भगवान तुंगनाथ की चल विग्रह उत्सव डोली शीतकालीन गद्दी स्थल मक्कूमठ से रवाना होगी तथा रात्रि प्रवास के लिए गांव के मध्य भूतनाथ मंदिर पहुंचेंगी। 21 अप्रैल को भगवान तुंगनाथ की चल विग्रह उत्सव डोली भूतनाथ मंदिर से रवाना होकर अन्तिम रात्रि प्रवास के लिए चोपता पहुंचेगी तथा 22 अप्रैल को वेद ऋचाओं के साथ भगवान तुंगनाथ के कपाट ग्रीष्मकाल के लिए खोलें जायेंगे। तुंगनाथ धाम के प्रबन्धक बलवीर नेगी ने बताया कि कपाट खुलने की तैयारियां शुरू कर दी गई है।

 

कैसे पहुंचे तुंगनाथ धाम। 

उत्तराखंड के प्रवेश द्वार हरिद्वार से 202 किमी दूरी बस या निजी वाहन से तय करने के बाद तहसील मुख्यालय ऊखीमठ पहुंचा जा सकता है। ऊखीमठ से बस या निजी वाहन से 28  किमी दूरी तय करने के बाद तुंगनाथ यात्रा के आधार शिविर व खूबसूरत हिल स्टेशन चोपता पहुंचा जा सकता है। चोपता से चार किमी दूरी पैदल तय करने के बाद तृतीय केदार तुंगनाथ धाम पहुंचा जा सकता है। विगत दिनों जी एम ओ यू लि० द्वारा जिला मुख्यालय रुद्रप्रयाग से चोपता से सीधी बस सेवा शुरू कर दी गई है जो कि प्रतिदिन सुबह नौ बजे चोपता के लिए रवाना होती है तथा दूसरे दिन नौ सुबह चोपता हरिद्वार के लिए रवाना होती है।

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