कवयित्री चन्द्रमती चतुर्वेदी (चन्दू)
बस्ती, अयोध्या धाम, (उ. प्र.)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
पिता
पिता वटवृक्ष की छाया, जीवन का आधार हैं,
संकट की हर घड़ी में, साहस के भंडार हैं।
अपने सपनों को त्याग, हमारे स्वप्न सजाते हैं,
धूप स्वयं सह लेते, हमें छाँव में बिठाते हैं।
कंधों पर बैठाकर जग का दर्शन करवाते हैं,
ठोकर खाकर भी हमको चलना सदा सिखाते हैं।
मौन रहकर पीड़ाओं का विष पी जाते हैं,
होंठों पर मुस्कान लिए कर्तव्य निभाते हैं।
घर की हर दीवार में उनका त्याग समाया है,
उनके श्रम से ही आँगन ने सुख-वैभव पाया है।
पिता अनुशासन की गंगा, ममता का सागर हैं,
उनके चरणों में बसते जीवन के सुंदर स्वर हैं।
आँधी हो या घोर अँधेरा, ढाल बने रहते हैं,
सच्चाई के पथ पर चलना हर पल कहते हैं।
ईश्वर का अनुपम उपहार, पिता का सम्मान करो,
उनकी सेवा, उनकी पूजा, जीवन में स्वीकार करो।
जिनके दम से मिली पहचान, उनका ऋण अपार है,
पिता नहीं केवल रिश्ते, वे जीवन का सार हैं।
शत-शत नमन उन चरणों को, जिनसे जग उजियार है,
पिता स्वयं भगवान का धरती पर अवतार हैं।॥







