काजल का साथ और कालिख से परहेज

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डा. सुधाकर आशावादी

 

 

            (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

 

 

व्यंग्य :

काजल का साथ और कालिख से परहेज

 

 

 

एक गीत का अंतरा था, अच्छों को बुरा साबित करना दुनिया की पुरानी आदत है। ये पंक्तियाँ जगह जगह अपनी उपयोगिता सिद्ध करती हैं। यदि कहीं किसी सज्जन पुरुष को दुर्जन बदनाम करने के लिए षड्यंत्रों का जाल बिछाते हैं और उस षड्यंत्र में सज्जन पुरुष को दोषी सिद्ध करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाते हैं, तब बरबस ही ये पंक्तियाँ स्मरण हो आती हैं। फिर भी सच्चाई को कोई नहीं नकार सकता, कि कोयले की दलाली में हाथ तो काले होते ही हैं। अब कोई दलाली करे या न करे, यदि कोयले के गोदाम की चौकीदारी करेगा, तो कोयले की कालिख उसके हिस्से में भी आएगी, वह भले ही कितना स्पष्टीकरण देता फिरे, कि गोदाम या गल्ले से उसका कोई संबंध नहीं है। वह तो गल्ले के पास तक जाता भी नहीं, गल्ले की कमाई से उसका कोई संबंध नहीं है, मगर जिन्हें दलाली में हिस्सा नहीं मिलेगा, वे तो उसे बदनाम करेंगे ही।

अपने एक मित्र हैं। बिना जेब का कुर्ता पहनते हैं। उनके पाजामे में भी जेब नहीं रहती। बरसों से अनेक चैरिटेबल ट्रस्ट संचालित करते हैं। निराश्रित लोगों के रहने की व्यवस्था करते हैं। मानसिक रूप से विक्षिप्त बेसहारा लोगों को उपचार उपलब्ध कराते हैं। उनका मिशन मानवता के प्रति समर्पित है। पता नहीं समाज सेवा की बीमारी उन्हें कैसे लग गई। जिस दौर में हर कोई अपने परिवार के मोह से उबर नहीं पाता, येन केन प्रकारेण चारों धाम घरवाली मानकर श्रीमती जी के इशारों पर ही नृत्य करने हेतु विवश रहता है, उस दौर में वह सज्जन अपने घर का त्याग करके अपनी अच्छी खासी सरकारी नौकरी छोड़कर सेवा क्षेत्र में आ गए। हर व्यक्ति को अपना विश्वसनीय मानकर भरोसा करने में परहेज नहीं करते थे। उन्होंने ट्रस्ट की व्यवस्था अपने एक कर्मचारी को सौंप दी।

ऐसा अक्सर होता है, कोई कोई अपना सा लगने लगता है, जिस पर आँख बंद करके भरोसा किया जाता है। जॉन डीवी की तरह प्रयोगधर्मी थे। पुरातन सत्य पर भरोसा नहीं था, सत्य को तब तक सत्य नहीं मानते थे, जब तक कि सत्य को परीक्षण की कसौटी पर खरा सिद्ध नहीं करते थे। अपने विश्वास पात्र के प्रति भी उन्होंने शायद यही दृष्टिकोण अपनाया। समाज सेवा के क्षेत्र में योगदान प्राप्त करने के लिए ट्रस्ट क्षेत्र में लगी दान पेटियों और ट्रस्ट के गोदाम की चाबी अपने विश्वास पात्र के हाथ में दे दी। उन्हें क्या पता था, कि विश्वासपात्र उनकी आस्तीन का सांप सिद्ध होगा और उनकी निश्छल तपस्या को भंग करके उनके ट्रस्ट पर ग्रहण लगा देगा। दान पेटियों पर अपना अधिकार जमा कर ट्रस्ट की संपत्ति की चोरी करके अपने घर की तिजोरी भरेगा। उसके संरक्षण में आस्तीन में छिपे साँप इकट्ठा होकर ट्रस्ट को ही डसने लगेंगे।

सारा जीवन ईश भक्ति में समर्पित करने वाले मित्र महोदय संदेह के घेरे में आ गए। उनकी निष्ठा पर प्रश्न चिन्ह लग गया। इससे पहले कि वह अपना स्पष्टीकरण देते और अपने आपको बेगुनाह सिद्ध करने का प्रयास करते। उन्हें विधाता का स्मरण हो आया, कुछ पंक्तियाँ उनके मस्तिष्क में घुमड़ आई – हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ। और वह झोला उठाकर निकल लिए। कुछ पुरानी कहावतें उन्हें स्मरण हो आई कि काजल की कोठरी में रहकर कालिख तो सहनी ही पड़ती है।

(विनायक फीचर्स)

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