राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस  

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सुश्री सरोज कंसारी

लेखिका/कवयित्री/अध्यापिका

अध्यक्ष: दुर्गा शक्ति समिति,

नवापारा-राजिम, रायपुर, (छ.ग.)

 

 

               (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

 

 

विशेष आलेख:

राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस  

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“अस्पताल! जहाँ जाति-धर्म मिट जाते हैं, सिर्फ इंसानियत बचती है।”

— सुश्री सरोज कंसारी

 

“डॉक्टर होना केवल पेशा नहीं, मानवता की सेवा का सर्वोत्तम अवसर है। वे इस धरा पर साक्षात भगवान स्वरूप हैं, जिनका उद्देश्य सिर्फ धन कमाना नहीं होना चाहिए। सच्चे हितैषी व वंदनीय डॉक्टरों का सहृदय सम्मान करें।”

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धरातल पर चिकित्सक कहलाते हैं,

इनका सेवा धर्म निभाते जाते हैं।

मरीज जिनका देव होता है,

मानवता ही जिनका धर्म-कर्म है।

 

जिंदगी में कभी-कभी ऐसे मोड़ भी आते हैं, जब सब कुछ होते हुए भी हम खुद को बेबस, असहाय और लाचार महसूस करते हैं। लाखों-करोड़ों की धन-दौलत, रिश्ते-नाते होते हुए भी हम दुखी होते हैं। जब तक रूप-रंग, यौवन-शौहरत होती है, हम अपनी धुन में मस्त रहते हैं। ‘मैं हूँ, मेरे हैं’ के घमंड में चूर होकर अपने आप में व्यस्त होते हैं। उस वक्त सिर्फ मौज-मस्ती और स्वार्थ में लिप्त रहते हैं। लगता है कि रिश्तों का संसार है, उसके पास हर खुशी है, दौलत से सब कुछ खरीदने की ताकत है। जब जीने के लिए सारी सुविधाएं होती हैं, कोई परेशानी नहीं होती, उस वक्त जिंदगी जन्नत लगती है। अधिकतर लोगों के अच्छे दिनों में व्यवहार बदल जाते हैं। मीठी वाणी बोलना, किसी की तकलीफ को समझना, सहयोग करना, दया-धर्म, करुणा-क्षमा के भाव भूल जाते हैं। सरलता-सहजता छोड़कर दूसरों से दुर्व्यवहार करते हैं।

 

समय का कोई भरोसा नहीं, कब क्या हो जाए। कभी अचानक से कोई शारीरिक समस्या से ग्रसित हो जाते हैं, कोई गंभीर बीमारी हो जाए, दर्द से कराह रहे होते हैं, एक पल भी चैन नहीं होता, चलने-फिरने में असमर्थ हो जाएं, उस स्थिति में दुनिया की हर खूबसूरती व्यर्थ लगती है। बस मन में एक ही बात होती है: कैसे भी स्वस्थ हो जाएं। एक डॉक्टर की छवि मन-मस्तिष्क में घूमती है, जो उस वक्त की सबसे बड़ी उम्मीद होते हैं। क्योंकि हम सिर्फ सांत्वना दे सकते हैं, डॉक्टर ही दर्द की दवा होते हैं, जिनके पास जाने से राहत मिलती है।

 

कुछ बीमारियां ऐसी होती हैं जिनमें शरीर कमजोर हो जाता है और लंबे समय तक बिस्तर में रहकर सेवा के द्वारा ही जीवन की गाड़ी चलती है। कुछ लोग अपनों के प्रति समर्पित होते हैं जो अंत तक पूरा ध्यान रखते हैं, सहारा देते हैं, समय पर दवा देते हैं। पर आज के व्यस्त जीवन में बहुत कम ही होते हैं जो किसी बीमार की पूरी श्रद्धा-निष्ठा से सेवा करें, परेशान न हों। एक समय के बाद उन्हें भी दिक्कत होती है और आप एक कोने में पड़े रहते हैं। समय-समय पर पारिवारिक जन हाल-चाल पूछ लेते हैं। बाकी सब अपने काम में लग जाते हैं और कभी जब पता चल जाता है कि ठीक नहीं होंगे, तब अमीर लोग नर्स-नौकर के भरोसे और गरीब भगवान भरोसे छोड़ देते हैं।

 

परिवार वाले भी ईलाज करवाते हैं अपनी सामर्थ्य के अनुसार, फिर भी कई ऐसी बीमारियां होती हैं जो जल्द ठीक नहीं होतीं। लंबे समय तक खुद से कुछ करने में सक्षम नहीं होते, किसी के सहारे की ज़रूरत होती है। जिनके पास ईलाज के लिए पर्याप्त धन है, वे हर संभव प्रयास करते हैं और ईलाज करवाते हैं। लेकिन आज अधिकतर लोग ऐसे हैं जो कई बड़ी बीमारियों से घिरे हैं, महंगे ईलाज न करवा पाने के कारण जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं, पर उचित देखभाल और ईलाज के लिए तरस रहे हैं। इसलिए स्वास्थ्य से बढ़कर कुछ भी नहीं।

 

फिल्मों में वो दृश्य देखकर हृदय द्रवित हो जाता है जब किसी गरीब परिवार में किसी की ज्यादा तबियत खराब होने पर, गंभीर हालत में हॉस्पिटल लेकर जाते हैं। दिल की धड़कन तेज होती है, एकदम तनाव में होते हैं: क्या होगा, कैसे ठीक होंगे? ऐसे में डॉक्टर कहे कि गंभीर मामला है, ईलाज में लाखों लगेंगे। तब डॉक्टर से विनती करते मरीज के परिजन रोते, चीखते-चिल्लाते कहते हैं: हमारे पास इतने रुपए नहीं, दया करो, कैसे भी ठीक कर दीजिए। एक ही कमाने वाले हैं, बच्चें अनाथ हो जाएंगे कुछ हो गया तो। डॉक्टर कहते हैं: सॉरी, हम कुछ नहीं कर सकते, पहले रुपए का इंतजाम करिए। सोचिए! तब कैसी स्थिति होती होगी, हम महसूस कर सकते हैं उसे? फिल्मों में देखकर हम दुखी होते हैं, उनकी स्थिति पर दया आती है।

 

आज हकीकत की जिंदगी में भी यही होता है, जिंदगी का कोई भरोसा नहीं। आज बुढ़ापे में ही नहीं, किसी भी उम्र में कोई भी स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो जाती है। चलते-फिरते, बैठे, हंसते-खेलते अचानक चक्कर आना, बेहोश हो जाना, हार्ट अटैक, पैरालिसिस जैसी समस्या के शिकार युवा वर्ग भी हो रहे हैं। जब कोई होनी-अनहोनी हो जाती है, कोई दुर्घटना के शिकार होकर मौत को बेहद करीब महसूस करे, तब एक डॉक्टर ही होते हैं जो मरीज के लिए भगवान होते हैं। परिजनों की स्थिति देखने लायक होती है, इधर-उधर भटकते, कभी ब्लड, ऑक्सीजन, कई प्रकार के चेकअप के लिए दौड़ते-भागते मरीज की सेवा में जो लगा है उस इंसान के मन की पीड़ा को शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं।

 

भले ही चिकित्सा क्षेत्र में उन्नति हुई है लेकिन ईलाज के खर्च वहन करने में आज भी कई लोग असमर्थ होते हैं। एक सार्वभौमिक चिकित्सा सेवा सभी वर्ग के लिए उपलब्ध होनी चाहिए। प्राइवेट और शासकीय दोनों में ईलाज के लिए हर सुविधा दी जानी चाहिए। किसी की जान सिर्फ रुपए के अभाव में नहीं जानी चाहिए। एक डॉक्टर को पूर्ण ईमानदार होना चाहिए, उनमें इंसानियत के गुण हों और अपनी ज़िम्मेदारी के प्रति तनिक भी लापरवाही न करें। आपके पास हजारों मरीज हैं लेकिन अपने परिवार के लिए वह बहुत कीमती है, इस बात का ध्यान रखिए। किसी से भेदभाव न कर एक मरीज के प्रति बहुत ही आत्मीय व्यवहार करें, इंसानियत को जिंदा रखिए।

 

हर व्यक्ति को अपने जीवन से प्यार होता है। जिंदगी जीने की एक कला है। शरीर ही समस्त सांसारिक क्रिया-कलापों का केंद्र बिंदु है। हर कार्य शरीर के विभिन्न अंग मिलकर करते हैं। अनमोल है यह तन। दुनिया की हर खुशी हम अपनी शारीरिक और मानसिक शक्ति से प्राप्त करते हैं। बिना तन के इस जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती, जीवन है तो एक दिन मृत्यु भी होगी। जब तक इस शरीर में प्राण हैं इसकी सुरक्षा का दायित्व हम पर है। हम सभी श्रेष्ठ कर्म करने के लिए यहां आए हैं। मन-वचन और कर्म से शुद्ध भाव रखें और मानवता के कल्याण की दिशा में जितना हो सके आगे बढ़ें।

 

हर मनुष्य की एक ख्वाहिश होती है कि उनका जीवन सुखी-समृद्ध और निरोगी हो। जब हम शारीरिक रूप से पूर्ण स्वस्थ रहेंगे, तभी हर जिम्मेदारी का निर्वहन कर पाएंगे पूर्ण रूप से। स्वस्थ मनुष्य ही परिवार, समाज व देश के विकास में सहयोग देने में सक्षम हो सकते हैं। शरीर के हर पुर्जे एक-दूसरे से जुड़े होते हैं, जिनके कार्य करने और सहने की अपनी एक सीमा होती है। समय-समय पर इनके उचित देखभाल की ज़रूरत होती है। हमारी जीवनशैली का इस तन पर बहुत प्रभाव पड़ता है। व्यवस्थित जीवन के लिए संयमित-मर्यादित होना जरूरी है। जैसे- पर्याप्त नींद, योग-व्यायाम, ध्यान, संतुलित भोजन। विश्राम के अभाव और आधुनिकता के प्रभाव के कारण आज दूषित माहौल में जीवन यापन के लिए सभी मजबूर हैं। रोटी-कपड़ा और मकान के जुगाड़ या अधिक सुख-सुविधा अर्जित करने, धन कमाने की चाह में सभी लगे रहते हैं।

 

अधिक जिम्मेदारी के चलते व्यस्त होने के कारण समय पर स्वास्थ्य जांच न करा पाने के कारण, लापरवाही की वज़ह से बीमार हो जाते हैं, स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं दे पाते। आज सभी का जीवन अस्त-व्यस्त है, किसी के पास फुर्सत नहीं। सभी प्रतिस्पर्धा के लिए एक दौड़ लगा रहे हैं, जिससे मानसिक तनाव के शिकार हैं। हर घर में पारिवारिक कलह, समाज में आपसी द्वेष-बैर, मनमुटाव, राजनीतिक षडयंत्र, धार्मिक कट्टरता, जाति-मजहब, संप्रदाय के नाम पर विवाद की वज़ह से कहीं न कहीं मन विचलित हो ही जाता है।

 

मानसिक तनाव के कारण कई प्रकार की बीमारियों के शिकार हो रहे हैं लोग। कई बार सामान्य बीमारी को अनदेखा करने पर गंभीर रोग उत्पन्न हो जाते हैं। आज के समय में कुछ पल फुर्सत के निकालना बहुत जरूरी है। अशांत मन से ही अनेक व्याधियां जन्म लेती हैं। ज्यादा सोचने, हीन भाव रखने, बेवजह भय, दुख-पीड़ा, संताप में डूबे रहने से भी बीमारी से घिर जाते हैं। व्यस्त दिनचर्या से समय निकालकर प्रकृति के सानिध्य में रहें। सत्संग सुनें, धर्म के कार्य में सहयोगी बनें। ज़रूरतमंद को अपनी सामर्थ्य अनुसार दान दें। किसी मजबूर-लाचार व्यक्ति की मदद करें। अपने मित्रों के साथ दुख-सुख साझा करें। रिश्तेदारों से मेल-जोल रखें, मन में कोई बात दबाकर न रखें। जो करीबी और विश्वसनीय हैं उनसे अपनी हर बात कहें, सलाह लें, उस पर विचार करें और चिंता करने की बजाय समाधान के उपाय ढूंढें। मिलनसार रहें, एकदम धीर-गंभीर और अंतर्मुखी न बनें। जीवन जीने के लिए मधुर संबंध स्थापित करना जरूरी है, इससे मानसिक शांति मिलती है।

 

किसी प्रकार की स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने पर बिना समय गंवाए विशेषज्ञ डॉक्टर के पास जाना चाहिए। समय पर बीमारी का पता चल जाने पर उचित ईलाज संभव हो पाता है। कभी-कभी डॉक्टर भी कहते हैं: लेट कर दिए आने में, पहले आते तो हो सकता है ठीक हो जाते। ऐसे में हमारे पास अफ़सोस करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता। आज विज्ञान ने बहुत प्रगति कर ली है, गंभीर से गंभीर बीमारी का ईलाज भी अब संभव है। पहले पर्याप्त चिकित्सा सुविधा के अभाव के कारण कई बीमारियों का ईलाज संभव नहीं हो पाता था, जिससे मरीज की असमय मृत्यु भी हो जाती थी। कोई भी मानसिक परेशानी के लिए हम परिवार का सहयोग ले सकते हैं, पर शारीरिक कष्ट होने पर डॉक्टर के पास ही जाना पड़ता है।

 

सच कहें तो इस धरा पर देव तुल्य होते हैं डॉक्टर। जो समय पर इलाज कर हमें स्वस्थ शरीर के लिए विभिन्न उपचार बताते हैं। कल्पना कीजिए जब पुराने समय में जब ज्यादा डॉक्टर नहीं थे, उस समय कितनी परेशानियों का सामना किए होंगे? आज पूर्ण रूप से कोई स्वस्थ नहीं होता, कुछ न कुछ समस्या लगी ही रहती है। सर्दी-खांसी, बुखार, सिर दर्द, घुटने दर्द, पेट दर्द जो दवा खाने पर ठीक हो जाते हैं। बी.पी., शुगर तो आज के समय में आम बात है। ज्यादा तनाव की वजह से हार्ट अटैक, पैरालिसिस जैसी समस्या बढ़ती ही जा रही है जिसके लिए कोई उम्र नहीं, युवा वर्ग भी इसके चपेट में आ रहे हैं।

 

जैसे सीमा पर जवान दिन-रात हमारी सेवा में जुटे रहते हैं, अपनी सुख-सुविधाओं की चिंता नहीं करते, बाहरी दुश्मनों से हमारी रक्षा करते हैं वे। वैसे ही डॉक्टर भी राष्ट्र के पहरेदार हैं। अपने चिकित्सा ज्ञान के द्वारा विभिन्न बीमारियों का गंभीरता से इलाज करते हैं। रात हो या दिन परवाह नहीं और दर्द से पीड़ित मरीजों का ईलाज कर उन्हें राहत देते हैं। जिनके कारण हम स्वस्थ हो पाते हैं। इतना आसान नहीं होता चिकित्सा कार्य, उन्हें भी कई समस्याओं से जूझना पड़ता है, फ़िर भी हार नहीं मानते।

 

जिस प्रकार कोई कष्ट होने पर हम प्रार्थना करते हैं, जिससे मन को शांति मिलती है, वैसे ही डॉक्टर होते हैं। उनसे एक विश्वास भाव जुड़े होते हैं, उनके पास जाने से लगता है हम ठीक हो जाएंगे। वे भी पूरा प्रयास करते हैं बीमारी की जड़ तक जाने का। इस दृष्टि से डॉक्टर सच्चे साथी और हमदर्द होते हैं, वे वंदनीय और पूजनीय हैं। एक सफल डॉक्टर का जीवन धन्य है जो मानवता की सेवा में लगे होते हैं। हम सभी की जिम्मेदारी है, उनका दिल से सम्मान करें और बताए सलाह को मानें।

 

जब हम स्वस्थ होते हैं लापरवाही करते हैं, नियम से नहीं रहते। लेकिन शारीरिक कष्ट होने पर पता चलता है कि एक डॉक्टर की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका है जीवन में। कल्पना कीजिए अगर वे न होते तो क्या होता? दर्द-पीड़ा, कराह से चीखते और चिल्लाते लेकिन राहत नहीं पाते। इंसानियत के पुजारी हैं डॉक्टर, जो भगवान के दूत के रूप में हैं और हर समय सेवा में उपलब्ध होते हैं। वैसे तो जब हम स्वस्थ होते हैं तब आपस में लड़ते हैं, भेदभाव में जीते हैं। हर जगह आज कोई न कोई मतभेद है। ऊंच-नीच के कारण न जाने कितने ही लोग व्यथित और उपेक्षित जीवन का निर्वहन कर रहे हैं।

 

हॉस्पिटल ही वो पवित्र स्थान है जहां हिंदू-मुस्लिम, सिख-ईसाई में कोई अलगाव नहीं। वहां कोई अमीर या ग़रीब नहीं होते। समान भाव से हर मरीज का ईलाज निस्वार्थ करते हैं डॉक्टर। वैसे तो हम तेरे-मेरे के भाव में रहते हैं। जब किसी को ब्लड की जरूरत होती है बिना देखे चढ़ा लेते हैं। उस समय नहीं सोचते वो दोस्त है या दुश्मन। तो फिर बेवजह के झगड़ों में उलझकर हम क्यों अपना स्वास्थ्य खराब करते हैं?

 

एक डॉक्टर ही होते हैं जो हमारी पीड़ा, अनंत कष्टों पर मरहम लगाते हैं। जिंदगी और मौत से जूझते इंसान को जीने की एक उम्मीद प्रदान करते हैं। दुख में डूबे मरीज को सांत्वना देकर खुशियों की बौछार करते हैं। हर रिश्ते से ऊपर दुनिया में डॉक्टर का दर्जा होता है। जब कोई मरीज बिस्तर पर किसी बीमारी से लड़ रहा होता है तो डॉक्टर से विनती करता है, हाथ जोड़ता है, गिड़गिड़ाता है ठीक करने के लिए। उस स्थिति में वे मरीज को संभालते हैं, मजबूती प्रदान करते हैं, हिम्मत देते हैं।

 

जीने के लिए वैसे तो हम बहुत कुछ सहेजते हैं। जब शारीरिक-मानसिक रूप से किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित हो जाते हैं, उस वक्त दिमाग़ में और कुछ नहीं आता। सारे रिश्ते, मित्र, समाज, दौलत हर चीज एक तरफ हो जाती है। एक ही बात होती है: एक बार ठीक हो जाए। मन-मस्तिष्क काम करना बंद कर देता है, सारे तीज-त्यौहार फीके पड़ जाते हैं। सिर्फ उस डॉक्टर की तरफ नज़र होती है जो आपको असहनीय पीड़ा से उबार सकते हैं। समय का महत्व समझें और सबसे बड़ा धन स्वास्थ्य है, इसे स्वीकार करते हुए सेवाभावी बनें।

 

वैसे तो कई व्यवसाय और शासकीय नौकरी कार्य हैं जिसमें रहकर हम पद-प्रतिष्ठा और दौलत कमा सकते हैं। जो चिकित्सा कार्य को चुनते हैं वे सबसे श्रेष्ठ कार्य हैं, एक पुनीत कार्य से जुड़ते हैं। भले ही ये उनके दायित्व हैं, पद है जिसके लिए नियुक्त हुए हैं। आज जहां सभी अपने में अस्त-व्यस्त और मस्त हैं, अधिकांश लोगों के पास आज किसी के दुख-दर्द और तकलीफ़ को समझने के लिए समय नहीं, ऐसे में डॉक्टरी पेशा अपनाकर वे पुण्य कर्म के भागीदार बनते हैं। जो इस दुनिया में सबसे ऊंचे दर्ज का काम है।

 

आजकल तो शारीरिक रूप से असमर्थ होने पर बिस्तर पकड़ लेने पर अपने ही सेवा करने से कतराते हैं। अछूत रोग होने पर छूने में भी संकोच करते हैं और पैसे के बल पर हॉस्पिटल में भर्ती कर देते हैं। इन्हें डर होता है कहीं हमें भी बीमारी न हो जाए। ऐसे विकट स्थिति में डॉक्टर और नर्स बिना कुछ सोचे अपनी ज़िम्मेदारी निभाते हैं, उन्हें ठीक करने का प्रयास करते हैं। याद रखिए! आपके परिवार और प्रियजन भी तभी तक आपके हैं, जब तक आप स्वस्थ हैं। लेकिन बिस्तर में लंबे समय तक पड़ जाने पर अधिकतर लोग बोझ समझने लगते हैं। भगवान से प्रार्थना करते हैं: हे भगवान! इन्हें कष्ट से छुटकारा दे। शायद वे उनसे ख़ुद मुक्ति पाना चाहते हैं। लेकिन एक डॉक्टर अंत समय तक ईलाज करते हैं, पीछे नहीं हटते।

 

डॉक्टर-नर्स और मरीज का आत्मीय संबंध होता है, जिनसे एक उम्मीद की डोरी बंधी होती है। सहज-सरल, मिलनसार व सांत्वना देने वाले डॉक्टर मरीज के लिए रामबाण औषधि होते हैं, जो उन्हें हिम्मत देते हैं, तनाव न लेने और हर स्थिति में साथ होने का एहसास दिलाते हैं। मरीज का ईलाज करते-करते डॉक्टर मन पढ़ने में भी माहिर हो जाते हैं। मरीज को देखकर जान जाते हैं कि बीमारी से ज्यादा ये डर से पीड़ित हैं। इसलिए सबसे पहले डॉक्टर मरीज को अपने मधुर वचन से सहज करते हैं। मानसिक रूप से उन्हें खुश करने का प्रयास करते हैं। ज्यादा चिंता न करने और ठीक हो जाने की बात कहते हैं।

 

अधिकतर देखा गया है कि जो किसी बीमारी से पीड़ित होते हैं वे मानसिक रूप से भी कमज़ोर होते हैं। ऐसे समय में उन्हें अपनों के प्यार, स्नेह-दुलार, सानिध्य, समर्पण, सच्ची सेवाभाव की ज़रूरत होती है। सही समय में अगर डॉक्टरी ईलाज के साथ अपनों का साथ मिल जाए तो वे जल्द ही ठीक हो जाते हैं। आज अधिकतर लोग अपनों के दुत्कार, कटु वचन, उपेक्षा, अपनेपन की कमी के कारण मानसिक तनाव में रहते हैं। अधिक सोचने पर शारीरिक रूप से अस्वस्थ हो जाते हैं, धीरे-धीरे वही बीमारी का रूप धारण कर लेती है। डॉक्टर भी कहते हैं: बीमारी का ईलाज तो वे कर सकते हैं लेकिन अनावश्यक शंका को ख़ुद निकालना है। डॉक्टर बताते हैं: कई बार सामान्य बीमार होने पर भी मरीज डर के कारण उसे बड़ा कर लेते हैं और मानसिक रोगी बन जाते हैं।

 

डॉक्टर का स्वभाव वैसे तो हर मरीज के लिए अच्छा ही होता है। कभी भी पारिवारिक या व्यक्तिगत परेशानी की वजह से मरीज पर क्रोध या ईलाज में लापरवाही नहीं करनी चाहिए। एक डॉक्टर वैसे तो अपनी जिम्मेदारी बखूबी समझते हैं। वे भी एक इंसान हैं, उन्हें भी विश्राम की ज़रूरत होती है लेकिन बीमार होने का कोई समय नहीं होता। कई डॉक्टर जो घर पर भी क्लीनिक चलाते हैं और घरेलू डॉक्टर होते हैं, मरीज हर समय उन्हीं के पास ईलाज करवाते हैं।

 

आपातकाल में कोई रात में उनके पास कोई मरीज जाए और वे देखने से मना कर दें तो स्थिति विकट हो जाती है। अगर इसी बीच कोई अनहोनी हो गई, मरीज की जान चली गई तो फ़िर हमेशा के लिए विश्वास टूट जाता है। ईलाज करने से मना नहीं करना चाहिए क्योंकि आपके न करने से किसी की जान भी जा सकती है। किसी की उम्मीद जीवन भर के लिए टूट सकती है।

 

सिर्फ धन कमाने के लिए इस व्यवसाय से जुड़ना, इंसानियत की दृष्टि से हानिकारक है। डॉक्टर बनते ही शपथ लेकर आप दिन-रात हर परिस्थिति में सुख-चैन का त्याग कर सेवा की कसम खाते हैं लेकिन उसे पूरी नहीं कर पाते तो ये वाकई दुखद बात है। सेवा ही परम धर्म है। अपने निजी स्वार्थ को त्यागकर अपनी ड्यूटी ईमानदारी से करते रहें तो किसी का अहित नहीं होगा। एक डॉक्टर से ही मरीज की आस्था और श्रद्धा जुड़ी होती है। किसी की उम्मीद को टूटने न दें। भगवान के बाद दुख-तकलीफ़ दूर करने वाले डॉक्टर ही होते हैं। सिर्फ रुपए कमाने के उद्देश्य से इस क्षेत्र में न आएं। मानवता के कल्याण के लिए आप नियुक्त हैं, ये आपका सौभाग्य है। इसलिए समर्पित भाव से अपने इस पुनीत कर्म को करते रहें।

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