घर के भीतर घर में.

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राजकुमार कुम्भज 

जवाहरमार्ग, इन्दौर

 

 

(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

 

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            घर के भीतर घर में.

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घर के भीतर घर में 

और फिर घर के बहुत-बहुत भीतर ही 

तरतीब से रखी हैं कुछ बेतरतीब चीजें

उन्हीं-उन्हीं बेतरतीब चीजों में एक स्त्री 

तलाश रही है, सदियों से तलाश रही है 

अपनी पसंद, अपने हिस्से की कुछ चीजें

सोचती है, जरा कुछ सोचती है कभी 

कहाँ गईं, कहाँ गईं वे तमाम सुंदर चीजें

जो कभी, यहीं-कहीं सलीके से रखीं थीं 

कठिन वक्त की कठिनाइयाँ समेटते हुए 

एक माँ ने अपने आँसुओं में भीगोकर 

बच्चों की तुतलाती खुशियों के साथ-साथ 

‌समझकर अपने जीवन का तप और ताप

एक स्त्री फिर-फिर तलाशती है जीवन 

और तलाशती रहती है दु:ख दूसरे-तीसरे 

कभी आँसू,कभी आँसुओं में सुख-संताप   

और कभी बेतरतीब चीजों में घर अपना

जो गुम हुआ जाता है बार-बार यहीं-कहीं

और फिर घर के बहुत-बहुत भीतर ही 

घर के भीतर घर में।

 

 

    ___________________                              **************

  माँ ने देखे हैं कई-कई इतिहास.

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घर के खाली हिस्सों में 

हमेशा ही गूँजती रहती है माँ की आवाज़

कोई भी जगह होती नहीं है शून्य समान

बच्चों की किलकारियों के साथ-साथ

हर कहीं बिखरे पड़े हैं माँ के कठिन‌ दिन 

सोचती है, अक्सर ही सोचती रहती है माँ 

क्यों, गुस्से में क्यों हैं आजकल ये बच्चे 

क्यों करते हैं शोर, क्या हैं शिकायतें उन्हें 

क्यों कर रहे हैं हँगामा, क्यों तोड़-फोड़ 

क्या कुछ मटमैला हुआ है पीने का पानी 

क्या कुछ कम हुआ है शब्दों में नमक 

क्या हड्डियाँ झुकने-मुड़ने से करतीं हैं मना

क्या काँटे चुभने का दर्द अब रहा नहीं 

याद रखने की बात है, याद रखना चाहिए 

सिर्फ चीखने से बदलते नहीं हैं इतिहास 

बहुत जरुरी है युद्ध-मैदानों की घुड़दौड़ 

माँ जानती है खून और आँसू का मतलब 

समेटते हुए आँसू अपने समझाती है माँ

आँसू और खून से लथपथ युद्ध-मैदानों के 

माँ ने देखे हैं इतिहास कई-कई।

 

 

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  पृथ्वी का अनुवाद है माँ।

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पृथ्वी का अनुवाद है माँ

और संसारभर की संस्कृतियों का साराँश

जिसके अंतस में रहते हैं खरबों खनिज 

जो कुछ लिखा नहीं, देखा नहीं,सुना नहीं 

वह सब छुपाए रखती है माँ अपने सीने में 

आँखों का पता नदी भी, आग का घर भी 

पाँव उसके, गाँव उसके चहकते पक्षी-राग

खुद जागती है फिर जगाती है सूरज को 

ब्रह्म वही, ब्रह्माँड वही, नाद वही, सृष्टि वही

आँधी-तूफानो की शीतल दृष्टि-वृष्टि वही

उसीसे है अंधेरी रातों में मेले चाँद-तारों के 

फूल में रँगों का खिलना क्या, खौलना क्या

खनकतीं हैं चूड़ियाँ, कौंधती हैं बिजलियाँ

माॅं का होना है होना मेरा, तेरा और सब

अक्सर-अक्सर ही जब आती नहीं है नींद  

मेरे सिरहाने रखकर एक छोटा-सा चाकू

अपने कटे-फटे कपड़ों के किसी पल्लू से 

खुशी-खुशी बाँध रखती है प्रेम और दु:ख

पृथ्वी का अनुवाद है माँ।

   ___________________

 

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