राजेंद्र रंजन गायकवाड (सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक) बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w)6395080071
कर्मफल – भाग 3
रात के तीसरे पहर का सन्नाटा सिमरिया गाँव की पगडंडियों पर पसरा हुआ था। आसमान में बादलों की ओट से छनकर आती धुंधली चाँदनी उस खौफनाक अंधेरे को चीरने में नाकाम साबित हो रही थी। चारों तरफ सिर्फ झींगुरों की एकसूरी आवाज थी और उसी सन्नाटे को भेदती हुई बढ़ रही थीं कुछ थरथराते कदमों की आहटें मुन्ना की कमजोर धड़कनों को बड़ा देती ।
गणेश के मजबूत कंधे आज गृहस्थी के बचे-खुचे सामान के बोझ से नहीं, बल्कि एक अनजाने डर से दबे हुए थे। सिर पर रखी पोटली और कंधे पर टंगे सामान के साथ वह बिना पीछे मुड़े, बस चले जा रहा था। बाबू सिंह के खेत पर साल के पचहत्तर रुपये, बासा खाना और सामंतों की उतरन पहनकर जो संतोष उसके चेहरे पर रहता था, वह आज आधी रात के इस सन्नाटे में काफूर हो चुका था। वह सीधा-सरल आदमी था, जिसे सिर्फ पसीना बहाना आता था, बगावत नहीं।
उसके ठीक पीछे पार्वती थी, जिसका एक हाथ नन्हीं कला और दूसरा हाथ मुन्ना थामे हुए था। बच्चों के छोटे-छोटे पैर नींद और थकान से लड़खड़ा रहे थे, लेकिन नानी की उँगलियों की पकड़ में जो ममता और सुरक्षा का अहसास था, वह उन्हें बिना रोए इस स्याह रात में आगे बढ़ने का हौसला दे रहा था।
सबके पीछे चल रही थी हीरा, उसकी छाती से चिपककर सो रहे थे उसके दोनों जुड़वां बच्चे देवी और देवकी। एक माँ का आंचल उस वक़्त सिर्फ एक कपड़ा नहीं, बल्कि दुनिया का सबसे मजबूत किला बन जाता है जब बाहर का समाज भेड़िया बन जाए और माँ अपने बच्चों को बचाने के लिए जान पर खेल जाती है। हीरा ने दोनों बच्चों को अपनी छाती से इस कदर भींच रखा था, मानो वह अपने कलेजे के टुकड़ों को दुनिया की हर बुरी नजर और ज़ालिम ताकतों से छुपा लेना चाहती हो। लाल सिंह और उसके बाप की वे खौफनाक धमकियां अभी भी उसके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह गूंज रही थीं।
जैसे-जैसे कर्रापुर (सागर) की ओर बढ़ने वाले रास्ते की दूरी घट रही थी, हीरा के भीतर का मातृत्व और उसका गहन चिंतन एक गहरे समंदर की तरह हिलोरें ले रहा था। उसके दिमाग में विचारों का बवंडर उठा हुआ था। क्या यही अंत है? पिता खेमचंद ठेकेदार का भरा-पूरा परिवार, जिसका नाम कभी इलाके में अदब से लिया जाता था, आज वह एक शराबी और भगोड़े भाई छेकोड़ी के जुल्मों के कारण दर-दर भटकने को मजबूर है? पिता की मृत्यु क्या हुई, जैसे घर की छत ही छिन गई। मेरी शादी के छह महीने बाद ही जब मुझे परित्यक्ता बनकर तिली गाँव लौटना पड़ा, तब भाई ने तसल्ली देने के बजाय मेरे सारे जेवरात बेच खाए। सौतेली माँ और बहनों को जान से मारने की धमकी दी… और आज स्थिति यह है कि हमें चोरों की तरह आधी रात को अपना घर-गाँव छोड़कर भागना पड़ रहा है।
हीरा ने नीचे देखा, अंधेरे में भी उसे देवी और देवकी के मासूम चेहरे साफ दिखाई दे रहे थे। उसकी आँखों से गर्म आंसुओं की दो बूंदें टपकीं और सीधे देवी के गाल पर गिरीं। बच्ची ने नींद में ही थोड़ा सा मुंह सिकोड़ा और अपनी माँ की साड़ी को और कसकर पकड़ लिया। पार्वती ने पूछा- क्या हुआ बेटा ? रुककर बेटी के सिर पर हाथ रखा, इस स्पर्श ने हीरा के भीतर एक अजीब सी तड़प और ममता की बेबसी को जगा दिया। ‘यह कैसा कर्मफल है?
गणेश ने कभी किसी का बुरा नहीं चाहा आज बेचारा मेरे और बच्चों के खातिर बंधुआ मजदूर बनकर, बाबू सिंह के खेतों में हाड़-मांस गलाकर भी वह हमेशा मुस्कुराता रहा। उसने मुझे अपनाया, मेरे आने वाले बच्चों को अपना नाम दिया लेकिन क्या इन मासूमों का भविष्य भी इसी बंधुआ मजदूरी की बेड़ियों में जकड़ा रहेगा? क्या ये भी ताउम्र सामंतों की उतरन पहनेंगे और उनका बासा खाना खाकर जिएंगे? नहीं… मैं ऐसा कभी नहीं होने दूंगी। चाहे मुझे पत्थर तोड़ने पड़ें, या सूखी रोटियों पर दिन काटने पड़ें, मैं अपने बच्चों को इस शोषण की आग में झुलसने नहीं दूंगी। उन्हें पढ़ाऊंगी, उन्हें एक ऐसा आसमान दूंगी जहाँ वे आजादी से सांस ले सकें। उन्हें सिमरिया के सामंतों की गुलामी की विरासत नहीं, बल्कि आत्मसम्मान का जीवन दूंगी।
अंधेरी रात की उस खामोशी में हीरा का यह मौन चिंतन कोई लाचारी नहीं, बल्कि एक माँ का वो संकल्प था जो आने वाले कल का इतिहास बदलने का माद्दा रखता था। ममता की उस छुपी हुई शक्ति ने उसके थकते हुए पैरों में गजब की फुर्ती भर दी। पगडंडी अब धीरे-धीरे खत्म हो रही थी और सामने सागर शहर की धुंधली सी सीमा नजर आने लगी थी। भोर की पहली किरण फूटने ही वाली थी। हीरा ने अपनी छाती से लिपटे बच्चों को एक बार फिर चूमा और गणेश की पीठ को देखते हुए मन ही मन कहा ‘मुश्किलें चाहे जितनी बड़ी हों, जब तक इस माँ के आंचल में ममता और आंखों में बच्चों के सुनहरे भविष्य का सपना है, हम बिखर सकते हैं, पर टूट नहीं सकते। यह सफर सिर्फ सिमरिया से भागने का नहीं है, यह एक नई जिंदगी की शुरुआत है और इसी दृढ़ निश्चय के साथ, उस मटमैले अंधेरे को चीरते हुए उनके कदम आगे कर्रापुर टेम्पो के पास बढ़ गए।
कब कितने बजे टेमपु आएगी ? लालसिंह इधर आ जाएगा तो फिर क्या होगा ? गणेश ने हीरा की चिंता समझकर समझाया, अब जो होगा देखेंगे, मैं हूँ ना आज नहीं तो कल सब ठीक कर दूंगा। मुन्ना पिता की बात सुनकर मन ही खुश था। सामने देखा तो टेमपु आने की आवाज आ रही थी।
(शेष भाग 4)







