उपन्यास मां – भाग 10 इच्छामृत्यु।

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ब्यूरो छत्तीसगढ़ः सुनील चिंचोलकर।

रश्मि रामेश्वर गुप्ता, बिलासपुर छत्तीसगढ़

उपन्यास मां – भाग 10 इच्छामृत्यु।

मिनी को माँ की होमियोपैथी दवाई के लिए 120 कि.मी. की यात्रा करनी होती थी। जब वो वहाँ जाती तो डॉक्टर अंकल को मां की हालत बताती। डॉक्टर बड़े दुखी हो जाते थे। वो कहने लगे- “मिनी! एक काम कर सकती हो क्या? तुम आदरणीय प्रधानमंत्री जी को एक पत्र लिखो और उसमे तुम्हे ये लिखना है कि वे कोई ऐसा कानून बनाएं जिसके तहत हर वो व्यक्ति जो बुज़ुर्ग हो चुका है वो अपनी इच्छा से आत्महत्या कर सके।”

मिनी चौक गई। उसने कहा- “अंकल जी! ये आप क्या कह रहे है?”

डॉक्टर ने कहा कि तुम्हे नही पता मिनी मेरे पास ऐसे ऐसे पेशेन्ट आते हैं, जिनकी हालत मुझसे देखी नही जाती। तुम एक बार पत्र लिखकर देखो तो सही। मिनी ने कहा-“अंकल जी ! मैं ऐसा कैसे लिख सकती हूँ?”

उन्होंने फिर कहा- “मिनी हमारे प्रधानमंत्री जी बहुत अच्छे है। वो तुम्हारी बातों को अवश्य समझेंगे। अगर तुम अपने नाम से पत्र नही लिख सकती तो मेरे नाम से लिखो।”

मिनी ने कहा-“जी अंकल जी ! मैं सोचूंगी ।”

मिनी दवाइयां लेकर घर आ गई। पर डॉक्टर अंकल की बातों में कितना दर्द है, इसे वो समझने की कोशिश कर रही थी। उसे लगा कि ये मेरी माँ है इसलिए मुझे इतना दुख हो रहा है, ऐसे ही न जाने कितने बुज़ुर्ग प्रताड़ित होते होंगे ।

बुढापा अपने आप में एक रोग जैसा होता है जिसमे व्यक्ति की शक्ति ऐसे ही क्षीण होती चली जाती है और ऐसे में अगर कोई सहारा न मिले तो जाने क्या स्थिति होती होगी।

बुढापा कितना अच्छा हो सकता है ये मिनी ने तब देखा था जब उसके दादा – दादी थे और उनके आज्ञाकारी 2 पुत्र थे।

मिनी को याद आ रहा था कि माता-पिता की सेवा के नाम से मां को अपने माता-पिता के पास छोड़कर मिनी के पापा अकेले दूर रहकर नौकरी करते थे। महीने में कुछ दिनों के लिए घर आते। घर में जरूरत का सारा सामान लाकर रख देते और फिर चले जाते। अपने माता -पिता के नाम से भी कोई भला इतना त्याग करता है क्या? ये मिनी को अब समझ आ रहा था क्योकि अब वो स्वयं विवाहित जीवन जी रही थी। जब मां के पास थी तब तो मिनी के लिए ये सब बाते समझ से परे थी। मां का पूरा समय दादा-दादी की सेवा में और मिनी का खयाल रखने में बीतता था। दादी तो मिनी को “हीरे की अंगूठी” कहती थी और “मां की आखों का तारा”।

जिस मां ने अपने सास-ससुर के लिए इतना त्याग किया उनकी ऐसी हालात ? मिनी रह-रह कर अतीत में खो जाती थी। क्योकि उसका सारा बचपन दादा-दादी और माँ के साथ ही बीता था। मां एक पल भी मिनी के बिना नही रह पाती थी। जब मिनी को कालेज की पढ़ाई के लिए हॉस्टल में 3 साल रहने पड़े तो मां के लिए वो 3 युग हो गए थे। माँ मिनी से हंसते -हँसते मिलने आती और रोते-रोते घर जाती थी। पुरानी बाते मिनी की आँखों के आगे चलचित्र की तरह चलने लगते।

अगर इतनी सेवा और समर्पण के बाद भी किसी की ऐसी हालत हो जाए तो फिर लोग क्यों कहते है “जैसा करोगे वैसा भरोगे” ? मिनी के दिमाग में बार-बार ये प्रश्न आते थे। आखिर मां ने दादा और दादी की सेवा में कही कोई कमी नही की फिर उनकी ऐसी हालत आखिर क्यों?

दादा -दादी सिर्फ इसलिए पापा के पास जाकर नही रहते थे कि वहाँ माइंस के लोग घरों में मीट पकाते थे और दादा-दादी को वो सब बर्दाश्त नही होता था। हमारे घर में लहसुन और प्याज भी प्रतिबंधित था। सात्विक भोजन ही करते थे। सिर्फ बदबू की वजह से दादा-दादी वहाँ रहना नही चाहते थे जिसके कारण मां पापा को कितना बड़ा त्याग करना पड़ा था। सोचकर रोंगटे खड़े कर देने वाली बातें है।

बुढापा इतना भयावह भी हो सकता है, ये मिनी अब देख रही थी पर पतिदेव हमेशा धीरज बंधाते हुए कहते – “आपकी मां बहुत खुशनसीब है। मां के पास हम लोग तो हैं । माँ ने अपने सास-ससुर की इतनी सेवा की शायद इसलिये मां बेटे के पास नही तो क्या हुआ दामाद के पास तो है। मिनी! जरा उनके बारे में भी सोच लिया करो जिनको ऐसी हालत में लोग घर से बेघर कर देते हैं। कितने लोग तड़प-तड़प के जान गवां देते है। ईश्वर का लाख-लाख शुक्र है जो माँ हमारे पास है।”

पति की बातों से मिनी को थोड़ी संतुष्टी अवश्य मिल जाती थी।……………………क्रमशः

 

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