“खाकी में स्थितप्रज्ञ” पुस्तक का सीएम धामी ने किया लोकार्पण।

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दिनेश सेमवाल (शास्त्री) देहरादून।

“खाकी में स्थितप्रज्ञ” पुस्तक का सीएम धामी ने किया लोकार्पण। देहरादून।

विनसर पब्लिशिंग कंपनी द्वारा प्रकाशित और उत्तराखंड के पूर्व डीजीपी अनिल रतूड़ी द्वारा लिखित “खाकी में स्थितप्रज्ञ” पुस्तक का शनिवार को सर्वे चौक स्थित आईआरटीडी सभागार में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने गरिमामय समारोह में विमोचन किया। अनिल रतूड़ी ने यह पुस्तक एक आईपीएस अधिकारी के रूप में अपने संस्मरण एवं अनुभव के आधार पर लिखी है। इससे पूर्व वे भंवर नाम से एक उपन्यास लिख चुके हैं और उसके तीन संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। यह उपन्यास भी विनसर पब्लिशिंग कंपनी से प्रकाशित हुआ है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि अनिल रतूड़ी द्वारा इस पुस्तक के माध्यम से एक पुलिस अधिकारी के रूप में अपने सेवाकाल के संस्मरणों, अनुभवों और चुनौतियों को रोचक तरीके से प्रस्तुत किया गया है। “सुखे दुखे समे कृत्वा” का उल्लेख करते हुए धामी ने कहा कि सफलता और असफलता दोनों में एक समान रहना ही स्थितप्रज्ञ है। यह पुस्तक सेवा में आ रहे लोगों को निर्णय लेने में मदद करेगी।

श्री धामी ने कहा कि अनिल रतूड़ी ने एक सफल और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी के रूप में कार्य किया है। रतूड़ी दंपति ने अपने कार्यों और व्यवहार से उत्तराखण्ड में ही नहीं बल्कि देश में अपना एक विशेष स्थान बनाया है। खास बात यह है कि दोनों ने साधारण रहते हुए जनहित में असाधारण कार्य कर अपनी अलग साख बनाई है। ऐसा बहुत कम लोग कर पाते हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि मनुष्य में कर्म करते समय अपने मन को शांत रखते हुए लक्ष्य प्राप्त करने का गुण होना जरूरी है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि पुलिस के पास शांति और कानून व्यवस्था को बनाए रखने की बड़ी चुनौती होती है। हर चुनौती का सामना करने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ संयम का होना भी जरूरी होता है। यह एक ऐसी यात्रा है जिसमें अनेक उतार-चढ़ाव और चुनौतियां आती हैं, इसमें विपरीत परिस्थितयों में नैतिकता और धैर्य बनाये रखना जरूरी है।

‘‘खाकी में स्थितप्रज्ञ’’ पुस्तक के लेखक पूर्व पुलिस महानिदेशक अनिल रतूड़ी ने कहा कि इस पुस्तक के माध्यम से उन्होंने पुलिस अधिकारी के रूप में साढ़े तीन दशक के अनुभव के आधार पर कुछ महत्वपूर्ण संस्मरणों, अनुभवों और चुनौतियों का वर्णन करने का प्रयास किया है। उन्होंने कहा कि शांति और कानून व्यवस्था बनाने के लिए पुलिस को जो शक्तियां दी गई हैं, मानव कल्याण के लिए उनका सदुपयोग करना आवश्यक है। इस पुस्तक के माध्यम से यह प्रयास किया गया है कि हमारे नये अधिकारी कैसे चुनौतियों का सामना कर धैर्य से अपने कर्तव्यपथ पर आगे बढ़ें और अपनी जिम्मेदारियों का पूरी कर्तव्यनिष्ठा और दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ निर्वहन कर सकें।

अपने सारगर्भित संबोधन में दून विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. सुरेखा डंगवाल ने कहा कि ऐसी धारणा होती है कि अगर वर्दी है तो स्थितप्रज्ञ नहीं हो सकता है और अगर कोई स्थितप्रज्ञ है तो वह वर्दी नहीं पहन सकता है। अनिल रतूड़ी ने इस मिथक को अपने जीवन के प्रेरणादायी यात्रा से तोड़ा है कि वर्दी में स्थितप्रज्ञ रहा जा सकता है। उन्होंने कहा कि अनिल रतूड़ी की लेखन शैली में में टी.एस. इलियट का प्रभाव दिखता है। सुख, दुःख, जोश में और अपने उतार-चढ़ाव वाले जीवन में एक तरह का सामान व्यवहार करने वाला व्यक्ति स्थितप्रज्ञ है। उन्होंने कहा कि इस पुस्तक के माध्यम से उन्होंने बताया है कि एक पुलिस अधिकारी की जिंदगी तलवार की धार की तरह है। चक्रव्यूह के अन्दर आ गये और उसे तोड़ दिया तो भी विजित कहलायेंगे वो जरूरी नहीं है, नहीं तोड़ा तो असफल तो आप कहलायेंगे ही।

इससे पूर्व मुख्य सचिव राधा रतूड़ी ने कार्यक्रम के शुभारंभ अवसर पर मांगलगीत गाया और अंत में सभी आगंतुकों का आभार व्यक्त किया। प्रदेश के मौजूदा डीजीपी अभिनव कुमार ने अपने संबोधन में श्री रतूड़ी को अपना आदर्श बताते हुए कहा कि ऐसे व्यक्तित्व बहुत कम होते हैं। इस अवसर पर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव एन. रविशंकर, साहित्यकार एवं पूर्व कुलपति डॉ. सुधा रानी पाण्डे, शासन और पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी एवं साहित्य के क्षेत्र से जुड़े लोग उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन कंचन नेगी ने किया। विनसर पब्लिशिंग कंपनी के कीर्ति नवानी ने इस अवसर पर श्री अनिल रतूड़ी को स्मृति चिह्न भेंट किया।

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