डॉ0 हरि नाथ मिश्र, अयोध्या
(नया अध्याय, देहरादून)
ईद
होली-ईद-दीवाली तीनों,
होतीं प्रेम -पियाली।
प्रेम-पाग का रस पी के-
जन गाएँ फाग-कौव्वाली।।
सभी पैगामे मोहब्ब्त-सभी पैग़ामे मोहब्ब्त।।
होली के सब रंग निराले,
खेलें संग सेवइयाँ वाले।
दीवाली का दीप जला कर-
घर-आँगन में करें उजाले।।
करें सब गम को रुखसत-सभी पैग़ामे मोहब्ब्त।।
भात-भोज-उत्सव-पर्वों पर,
सब मिल कर नाचें-गाएँ।
मिल कर दोनों मुल्ला-पण्डित-
रचि-रचि भोग लगाएँ।।
धर्म की अद्भुत सोहबत-यही पैगामे मोहब्ब्त।।
नंदन-क्रंदन दोनों में भी,
रहें सभी सहभागी।
चलें कदम से कदम मिला कर-
बीतराग-अनुरागी।।
नहीं लें काम से मोहलत।।
सभी पैगामे मोहब्ब्त।।
होते फूल गोया बहुरंगी,
पर रहता एक चमन है।
भाँति-भाँति की खुशबू ले के-
देता शांति-अमन है।।
चमन में गजब की क़ुव्वत-यही पैगामे मोहब्ब्त।।
अम्बर की महफिल सजती है,
सूरज-चाँद-सितारों से।
गौरव-गरिमा मुल्क़ की बढ़ती-
छोटे-बड़ किरदारों से।।
बढ़ाएँ सभी हैं शोहरत-यही पैगामे मोहब्ब्त।।







