राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
थोथा चना बाजे घना,,,
(कहानी)
एक छोटे से गाँव में रामू नाम का एक युवक रहता वह बहुत बोलता था। चाहे कोई बात हो या न हो, वह हमेशा अपनी डींग हाँकता रहता कि
“मैंने इतनी पढ़ाई और मेहनत की है कि कोई मुझसे आगे नहीं निकल सकता! वह कभी किसी बात नहीं मानता न किसी से सहमत होता बस एक बात कहता -मेरे दिमाग में इतने आइडिया हैं कि पूरा गाँव बदल दूँगा! मैं तो बहुत बड़ा विद्वान हूं कि अपनी विधि और पद्धति से गांव क्या? देश का नक्शा बदल सकता हूं।
गाँव वाले पहले तो उसकी बातें सुनते और मुस्कुरा देते। लेकिन धीरे-धीरे सबको समझ आने लगा कि रामू की बातों में कोई दम नहीं है, वह काम कम करता था और बातें बहुत करता था। साथ ही अपने आपको सबसे होशियार समझ बैठा है इससे बहस करना व्यर्थ है।
अचानक एक दिन गाँव में एक बड़ी समस्या आई, नदी का पुल टूट गया था और बरसात के मौसम में लोग दूसरी तरफ नहीं जा पा रहे थे। सरपंच ने गाँव वालों को इकट्ठा किया और कहा -हमें इस पुल को जल्दी ठीक करना होगा जो कोई अच्छा सुझाव दे, वह आगे आए। रामू तुरंत खड़ा हो गया और जोर-जोर से बोला, मैं ही इसे ठीक करूँगा! मेरे पास बहुत बढ़िया प्लान है। मैं एक हफ्ते में नया पुल बना दूँगा कोई मुझसे निर्माण कार्य के बारे में ज़्यादा नहीं जानता, नहीं मुझ से बेहतर काम नहीं कर सकता! सब चुप रहे। रामू बोले ही जा रहा था।
सरपंच ने कहा, अच्छा, रामू तुम ही करो हम सब तुम्हारी मदद करेंगे। आदतन रामू ने बड़ी-बड़ी बातें कीं वह हर दिन गाँव में घूम-घूम कर बताता कि वह कितना मेहनत कर रहा है लेकिन असल में वह न तो कोई नक्शा बना था, न मजदूरों को सही से निर्देश देता सिर्फ बातें ही करता पूरे गांव के लोगों को नव -सिखाया कहता।
एक हफ्ता बीत गया पुल की हालत वैसी की वैसी रही लोग परेशान होने लगे तब गाँव का एक चुपचाप रहने वाला युवक श्याम आगे आया। श्याम कभी ज्यादा नहीं बोलता था। वह रोज चुपचाप काम करता था लेकिन जब बातें बर्दाश्त से बाहर हो जाती तो जरूर अपने अनुभव के आधार सुझाव रखता। उसने सरपंच से कहा,
“मुझे अनुमति दीजिए मैं कुछ दिनों में पुल ठीक कर दूँगा।
श्याम ने बिना डींग हाँके काम शुरू किया। उसने सही माप लिए, मजदूरों को समझाया, सामग्री का हिसाब रखा और खुद भी दिन-रात मेहनत की और तीन दिन में पुल फिर से मजबूत हो गया। जब पुल तैयार हुआ तो गाँव वाले खुश हो गए। सरपंच ने सबके सामने कहा -देखो भाइयो! रामू जितना बोलता था, उतना ही खोखला निकला और श्याम जितना चुप रहता था उतना ही ठोस काम किया सच है। कहावत है कि
थोथा चना ,,बाजे घना।
खोखले चने की आवाज सबसे तेज होती है, लेकिन असली वजनदार चना चुपचाप काम करता है। उस दिन से रामू की बातें सुनकर लोग सिर्फ मुस्कुराते और श्याम का सम्मान गाँव में बढ़ता गया।
जो ज्यादा बोलते हैं उनमें सचमुख अक्ल कम होती है लेकिन अपने आपको अक्लमंद सिद्ध करने के बड़बोलापन दिखाते हैं। असली योग्यता योजना बध्य और व्यवस्थित तरीके से चुपचाप काम करने में झलकती है,ऐसे लोगों का इतिहास बनता है।







