कवयित्री चन्द्रमती चतुर्वेदी (चन्दू)
बस्ती, अयोध्या धाम
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
मुखड़ा
साथ छूटेगा कैसे मेरा आपका,
दिल बना है सनम अब तो घर आपका।
साथ छूटेगा कैसे मेरा आपका,
साँस-साँस में बसता असर आपका॥
अंतरा –
जब से नजरों ने नजरों को पहचान लिया,
प्यार ने जिंदगी का नया गान दिया।
हर खुशी पर लगा है मुकुट आपका,
हर दुआ में रहा बस सफर आपका।
साथ छूटेगा कैसे मेरा आपका,
दिल बना है सनम अब तो घर आपका॥
अंतरा –
चाँदनी रात भी अब सुहानी लगे,
बिन कहे हर नजर इक कहानी कहे।
रूह में घुल गया है नशा प्यार का,
मिल गया है मुझे अब असर आपका।
साथ छूटेगा कैसे मेरा आपका,
साँस-साँस में बसता असर आपका॥
अंतरा –
फूल महके तो लगता है संदेश है,
हर हवा में बसा आपका वेश है।
नाम होठों पे आए दुआ की तरह,
दिल धड़कता रहे बस वफ़ा की तरह।
साथ छूटेगा कैसे मेरा आपका,
दिल बना है सनम अब तो घर आपका॥
अंतरा –
जन्म-जन्मों का बंधन ये लगता मुझे,
रब ने भेजा है अपना ही लगता मुझे।
अब न दुनिया से कोई शिकायत रही,
आपकी प्रीत ही मेरी दौलत रही।
साथ छूटेगा कैसे मेरा आपका,
दिल बना है सनम अब तो घर आपका॥
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“बाढ़ का प्रकोप” विषय पर आल्हा शैली में एक ओजपूर्ण रचना—
पहिले धरती रोई जोरन,
फिर अम्बर ने तान मचाई,
घिर-घिर कारी बदरी आई,
संग अपने जलधार बहाई?
नदियाँ तोड़ किनारे दौड़ीं,
गाँव-गाँव में मचा कुहराम,
कच्चे घर सब बह गए पानी,
डूब गए मंदिर और धाम।
रोवत माई, रोवत बहिनी,
रोवत नन्हे-नन्हे लाल,
सिर पर गठरी, गोद में बच्चा,
कैसे कटिहैं ये बदहाल।
डूब गए खेतन के सपने,
डूब गई किसान की आस,
बरसों की मेहनत बह निकली,
टूट गया जीवन विश्वास।
पशु-पंछी सब शरण खोजते,
ऊँचे टीले रहे न ठौर,
जल ही जल चहुँ ओर दिखाई,
किसे पुकारें, किसकी ओर?
नाव बनी अब एक सहारा,
जीवन की पतवार बनी,
सेवा लेकर जो आगे बढ़े,
वही सच्ची सरकार बनी।
संकट में जो हाथ बढ़ाए,
वही धरम का रखवाला,
भूखे को जो अन्न खिलावे,
वही सच्चा है मतवाला।
मत काटो अब वन की दौलत,
मत छेड़ो प्रकृति का मान,
नदियों की मर्यादा रख लो,
तभी बचेगा हिन्दुस्तान।
आओ मिलकर प्रण ये लें हम,
वृक्ष हजारों रोज लगाएँ,
जल, जंगल और भूमि बचाकर,
आने वाला कल महकाएँ।
चन्द्रमती की यही पुकार है,
सुन लो भारत के रखवालो,
प्रकृति माता रूठ गई तो,
फिर कैसे सुख-चैन संभालो?







