राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
याद-ए-माजी का कोई भी
हिसाब मैं दे न सका,
दिल में जो कड़वी सी यादें थीं,
उन्हें भी मैं भुला न सका।
रात कटती है मेरी बस,
आंसुओं की तेज बारिश में,
नींद को मैं गले से चाहकर
यार लगा न सका।
राह में इस इश्क की खाई हैं
मैंने ठोकरें इतनी,
ख़ुद को मैं इस मोड़ पर आकर
कभी भी अब संभाल न सका।
खो गया हूँ भीड़ में दुनिया की
कुछ इस तरह से मैं,
सामने आईने के
खुद को पहचान न सका।
ओढ़कर बैठा हूँ चुपचाप आज मैं
इस ग़म की चादर को,
ज़ख़्म जो गहरे मिले हैं,
उनको रंजन मैं मिटा न सका।






