राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
अतीत में डूबी आँखें
(कविता)
वृद्धाश्रम की खामोश दीवारों पर लटकी आँखें
जो देखती नहीं आज, तलाशती हैं अतीत को
धुँधली पुतलियाँ झांकती हैं हसीन दिनों को
जहाँ बच्चे दौड़ते थे, आँगन की धूल में।
हाथ काँपते हैं, पर यादें नहीं काँपतीं,
माँ की गोद, पिता का कंधा, घर का वह कोना।
अब सिर्फ दीवारें हैं, और एक खाली बिस्तर,
जहाँ रातें लंबी हो जाती हैं बिना किसी सवाल के।
आँखें अतीत में डूबी हैं, वर्तमान जीने के लिए
जैसे कोई पुरानी तस्वीर में खो गई हो।
वहाँ हँसी थी, वहाँ रोशनी थी,
यहाँ सिर्फ छाया है, और एक धीमी साँस।
वृद्धाश्रम की खिड़की से बाहर देखो,
पेड़ हरे हैं, पर उनकी जड़ें भी अकेली।
वही आँखें जो कभी सपनों से चमकती थीं,
अब बस यादों के समुद्र में डूबी पड़ी हैं।
कोई आवाज नहीं पूछती, “क्या हुआ?”
सिर्फ समय गुजरता है, चुपचाप।
और वे आँखें, अतीत में डूब कर
आज भी इंतजार करती हैं
किसी जाने-पहचाने चेहरे को,,
पर कोई नहीं आता,,,सालों,,







