राजनीति में यायावरी का असीम आनंद

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डा. सुधाकर आशावादी

 

 

              (नया अध्याय, देहरादून)

 

 व्यंग्य 

 

            राजनीति में यायावरी का असीम आनंद

 

प्राकृतिक वातावरण में घुमक्क्ड़ी व्यक्ति को यायावर की संज्ञा प्रदान की जाती है। यदि यही प्रवृत्ति राजनीतिक परिदृश्य में अपनाई जाए, तो यायावर पर दल बदलू होने का ठप्पा लग जाता है। राजनीति में हृदय परिवर्तन होना नई बात नही है। कब किसका हृदय परिवर्तन हो जाए, कहा नहीं जा सकता। कब कोई किसी का स्तुति गान करते करते निंदा गान करने लगे, यह भी पूर्व निर्धारित नही होता। अलबत्ता राजनीति की शतरंज में कब कौन सा प्यादा वजीर बन जाए, यह प्यादा खुद भी नही जानता। वैसे इसके लिए अपना लक्ष्य तय करते हुए साम दाम दंड भेद अपनाने वाली लंबी पारी खेलने का हुनर आना चाहिए। मौकापरस्ती महत्वाकांक्षी राजनीतिक प्राणी की रग रग में समाहित होनी चाहिए। जिस कंधे को सीढ़ी बनाकर प्रयोग में लाया जाए, पहले उसी कंधे को नकारना चाहिए, ताकि कंधे बदल बदल कर कुर्सी तक पहुँचने का सफर तय किया जा सके। यह मैं नहीं कहता, सत्ता शीर्ष तक पहुँचने का सफर तय करने के लिए अपनाए जाने वाला तिकड़मी आचरण कहता है।

 

साधारण सी बात है, कि किसी भी गंतव्य तक पहुँचने के लिए यातायात के अनेक साधन अपनाने पड़ते ही हैं, वे साधन परिस्थितिजन्य होते हैं। साधन अपनाने में अपने उपलब्ध संसाधनों का ध्यान भी रखना होता है। यदि जेब का वजन भारी हो, तब सफर की टेंशन अधिक नहीं होती। समस्या तब आती है, जब संसाधन सीमित हों और गंतव्य तक पहुंचना जरुरी हो। ऐसे में यातायात के सार्वजनिक साधनों का प्रयोग मज़बूरी बन जाता है। लक्ष्य निश्चित समय सीमा में गंतव्य तक पहुंचना होता है। बहरहाल सियासत और जिंदगी के सामान्य सफर में यही समानता है। यहाँ निष्ठा, समर्पण, विश्वसनीयता, वफ़ादारी, त्याग, जैसे मूल्यों का कोई मोल नहीं होता।

 

अपने एक मित्र खानदानी सियासी हैं। सियासत उन्हें विरासत में मिली है। अक्सर ऐसा ही होता है, जब सियासत खानदानी पेशा बन जाती है, तब विरासत में रोजगार मिलता ही है। दुकान पर बैठने के लिए केवल उत्तराधिकारी होना ही अनिवार्य योग्यता होती है। स्कूली पढ़ाई ऐसे में कोई मायने नहीं रखती। वे भी समय से पढ़ नहीं पाए। उन्होंने अपनी सियासत की दुकान संभाली। सुबह एक दल में कटी और दूजे में शाम, दलबदलू बन कर किया जीवन में संग्राम। अंततः वह अपने गंतव्य तक पहुंच ही गए। जब लक्ष्य मछली की आँख पर निशाना लगाकर प्राप्त किया जा सकता हो, तो सियासत का अर्जुन उस दिशा में बढ़ ही जाता है। मित्र महोदय के साथ भी ऐसा ही हुआ। सत्ता का सफर शुरू किया, किसी और दल से, वहां महत्वाकांक्षा पूरी नहीं हुई, तो कहीं और खिसक गए, वहां भी दिल के अरमां आंसुओं में बह गए, तो वहां से भी बिस्तर बोरिया बाँध लिया, उसके बाद वे मैं से हम हो गए, फिर हम में भी दाल नहीं गली, कहीं और खिसक गए, जहाँ खिसके वहां लगा, कि टिक सकते हैं, टिके और निष्ठावान कार्यकर्ताओं के कंधे की सीढ़ी बनाकर मचान पर चढ़ गए। अक्सर ऐसा ही होता है। पुरानी कहानियों के पात्रों की तरह कब कोई चरवाहा या लकड़हारा राजा बन जाए। पहले से सुनिश्चित नहीं होता।

 

दल बदल बदल कर सत्ता शीर्ष तक पहुँचना केवल कलाकारी नहीं है, यदि भाग्य साथ दे, तो राजनीति में किसी का सितारा कभी भी चमक सकता है यानी बार बार हृदय परिवर्तन करने के बदले विशिष्ट उपहार मिल सकता है यानी प्राकृतिक यायावरी की तरह राजनीतिक यायावरी भी व्यक्ति को असीम आनंद की अनुभूति करा सकती है।    (विनायक फीचर्स)

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