केदार घाटी में गूंज रहा सिद्धवा–विद्धवा नृत्य। आस्था, परंपरा और वंशावली की जीवंत विरासत। 

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सम्पादक रुद्रप्रयागः लक्ष्मण सिंह नेगी

 

                 (नया अध्याय, देहरादून)

 

 

केदार घाटी में गूंज रहा सिद्धवा–विद्धवा नृत्य।

आस्था, परंपरा और वंशावली की जीवंत विरासत। 

 

 

           ऊखीमठः इन दिनों केदार घाटी के अधिकांश गांवों में पारंपरिक सिद्धवा–विद्धवा नृत्य का आयोजन पूरे उल्लास और श्रद्धा के साथ किया जा रहा है। पीढ़ियों से चली आ रही यह लोकपरंपरा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि इसमें क्षेत्र की पौराणिक मान्यताएं, लोकगाथाएं, वंशावली और बुग्याल गमन की ऐतिहासिक परंपरा भी समाहित है। गांव–गांव में डौर – थाली की थाप पर सजे इस आयोजन ने पूरी घाटी को सांस्कृतिक रंग में रंग दिया है।

 

सिद्धवा–विद्धवा नृत्य को देवपरंपरा से जुड़ा अत्यंत पवित्र आयोजन माना जाता है। लोकमान्यताओं के अनुसार, “सिद्धवा” और “विद्धवा” देवताओं के गण या दिव्य शक्तियों के प्रतीक होते हैं, जो विशेष अवसरों पर लोककलाकारों के माध्यम से अवतरित होकर गांव–समाज की कुशलक्षेम पूछते हैं। इस दौरान नर्तक विशेष वेशभूषा धारण कर देवभाव में आकर नृत्य करते हैं, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु उमड़ पड़ते हैं।

 

इस नृत्य की पौराणिक महत्ता भी अत्यंत गहरी मानी जाती है। मान्यता है कि केदारखंड में जब देवताओं और ऋषियों ने तपस्या की, तब उन्होंने लोकजीवन के साथ संवाद स्थापित करने के लिए इस प्रकार की परंपराओं की स्थापना की। सिद्धवा–विद्धवा नृत्य उसी परंपरा का विस्तार है, जिसमें देवशक्ति और मानव समाज का संगम दिखाई देता है। यह आयोजन विशेष रूप से खेती-बाड़ी के कार्यों के बाद और गर्मियों में बुग्यालों की ओर प्रस्थान से पूर्व किया जाता है।

 

नृत्य के दौरान “बुग्याल गमन” की गाथा विशेष आकर्षण का केंद्र रहती है। इसमें पश्वा पारंपरिक गीतों के माध्यम से बताते हैं कि किस प्रकार पूर्वज अपने पशुधन के साथ ऊंचे हिमालयी बुग्यालों की ओर प्रस्थान करते थे। यह गाथा केवल एक यात्रा का वर्णन नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलन, सामूहिक जीवनशैली और कठिन परिस्थितियों में जीवित रहने की कला का भी संदेश देती है। बुग्यालों का वर्णन, वहां की सुंदरता और जीवनशैली का चित्रण लोकगीतों में जीवंत रूप से उभरता है।

 

वंशावली (जागर) का पाठ भी इस आयोजन का अभिन्न हिस्सा है। इसमें क्षेत्र के विभिन्न कुलों और गोत्रों की उत्पत्ति, उनके इष्ट देवता और ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन किया जाता है। जागर गायक (जागरिये) विशेष लय और स्वर में इन वंशावलियों का गायन करते हैं, जिससे नई पीढ़ी को अपने पूर्वजों और सांस्कृतिक जड़ों की जानकारी मिलती है। यह परंपरा मौखिक इतिहास को सहेजने का सशक्त माध्यम मानी जाती है।

 

गांवों में इस आयोजन को लेकर विशेष तैयारियां की जाती हैं। मंदिर परिसरों और सार्वजनिक स्थानों को सजाया जाता है, और ग्रामीण सामूहिक रूप से इसमें भाग लेते हैं। यह आयोजन सामाजिक एकता और सामूहिक सहभागिता का भी प्रतीक बन गया है। पूर्व सुबेदार मेजर जगमोहन सिंह नेगी का कहना है कि सिद्धवा–विद्धवा नृत्य केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि यह देवआस्था, लोकज्ञान और पर्यावरणीय संतुलन का संदेश देने वाली परंपरा है। बदलते समय में भी इस परंपरा का जीवित रहना क्षेत्र की सांस्कृतिक समृद्धि का प्रमाण है। जागर गायक दिनेश सिंह नेगी का कहना है कि हालांकि, युवा पीढ़ी के शहरों की ओर पलायन के कारण इन आयोजनों की निरंतरता को लेकर चिंता भी जताई जा रही है। रंगकर्मी कृष्णानंद नौटियाल का मानना है कि इस प्रकार की लोकपरंपराओं के संरक्षण के लिए सरकारी और सामाजिक स्तर पर प्रयास किए जाने चाहिए। स्कूलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में इन परंपराओं को शामिल कर नई पीढ़ी को इससे जोड़ा जा सकता है। साथ ही, पर्यटन के माध्यम से भी इन आयोजनों को पहचान दिलाकर स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है। सिद्धवा के पश्वा सुरेन्द्र सिंह नेगी का कहना है कि केदार घाटी सहित तल्लानागपुर क्षेत्रो में इन दिनों हो रहा सिद्धवा–विद्धवा नृत्य न केवल आस्था और परंपरा का उत्सव है, बल्कि यह एक जीवंत सांस्कृतिक धरोहर भी है, जो आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य कर रही है।

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