आत्मीय संबंधों में विश्वास का अकाल

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डॉ. सुधाकर आशावादी

 

            (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

 

 दृष्टिकोण :

 

  आत्मीय संबंधों में विश्वास का अकाल

 

 

 

देश भर में हिंसक घटनाएं बढ़ रही हैं। कहीं लव जिहाद के चलते युवतियों की हत्याएं हो रही हैं, कहीं मित्रता के नाम पर मित्र को घर बुलाकर चाकू से गोदकर हत्या की जा रही है। कहीं किसी अबोध बालक को धरती पर पटककर मौत के घाट उतारा जा रहा है, कहीं किसी अन्य जघन्य तरीके से हत्या की जा रही है। कहीं हत्यारे अपरिचित हैं, कहीं पूर्व परिचित। जिन रिश्तों पर गर्व की अनुभूति की जाती थी, वही रिश्ते अब अविश्वास की वजह बन गए हैं। यहाँ तक कि हिंसक वारदातों के चलते एक ही छत के नीचे रह रहे पति पत्नी भी सुरक्षित नहीं हैं।

 

प्रश्न यह उठता है, कि क्या आत्मीय संबंधों में विश्वास का अकाल पड़ गया है ? क्या मित्र जैसे सुख दुःख में साथ निभाने वाले पवित्र संबंधों में विश्वासघात का चलन बढ़ गया है। बहरहाल समाज में बेखौफ होकर हत्या जैसे जघन्य अपराध को अंजाम देने की प्रवृत्ति का बढ़ना गंभीर चिंतन का विषय है। लगता है, कि जंगल में अस्तित्व की लड़ाई हेतु हिंसक प्रवृत्ति मानव समाज में भी अपनी घुसपैठ कर चुकी है। यदि ऐसा नहीं होता, तो नित्य ही हिंसक वारदातों के समाचार अखबारों की सुर्खियां न बनते।

 

प्रश्न यह भी है, कि हिंसक वारदात के दोषियों को संरक्षण देने की प्रवृत्ति क्यों बढ़ गई है। अपराधियों के पक्ष और विपक्ष में जाति और धर्म के अनुसार लोगों का लामबंद होना तथा तथाकथित निरपेक्ष मीडिया का अपराधियों के समर्थन में विमर्श प्रस्तुत करना क्या यह सिद्ध नहीं करता कि देश में एक ऐसा वर्ग सक्रिय है, अपराधियों के साथ जैसे को तैसा जैसे व्यवहार का विरोध करने के लिए ही पैदा हुआ है। क्या कानून किसी अपराधी के अमानवीय आचरण को प्रोत्साहित करने के लिए है ? क्या किसी जघन्य अपराध को अंजाम देने वाले अपराधी का महिमामंडन करके उसे लम्बे समय तक सरकारी सुविधाओं पर जीवित रहने का अधिकार है ?

 

वस्तुस्थिति यह है कि जघन्य अपराधों के पर्याप्त प्रमाण होने के उपरांत भी अपराधी कानूनी दावपेच से लंबे समय तक दण्डित नहीं होता, जिसके चलते कानून व्यवस्था के प्रति वह निडर होकर बेखौफ हिंसक वारदातों को अंजाम देता है। समय आ गया है, कि जघन्य वारदातों को अंजाम देने वाले हिंसक तत्वों के विरुद्ध दण्ड विधान को और अधिक कड़ा किया जाए ताकि समाज में बढ़ रही हिंसक घटनाओं की नित्य होने वाली पुनरावृत्ति पर अंकुश लगाया जा सके।        (विनायक फीचर्स)

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