सुनील कुमार वर्मा
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
स्थान: (लघुकथा)
आज नेशनल एथलेटिक्स चैंपियनशिप में हंड्रेड मीटर रेस मेन्स का फाइनल है। दर्शक दीर्घा में एक भी स्थान खाली नहीं है। वैसे भी सौ मीटर की फर्राटा दौड़ किसी भी एथलेटिक्स चैंपियनशिप की सबसे जोशीली स्पर्धा मानी जाती है। खिलाड़ियों के लिए भी और दर्शकों के लिए भी। चाहे कोच हों या प्रायोजक सभी का उत्साह, जोश और समर्पण देखते ही बनता है.सौ मीटर फर्राटा का वह फैसला जिसे जानते सभी थे पर लोग तो बस सक्षम द्वारा वह रिकार्ड टूटते देखना चाहते थे। जिसे सक्षम ने खुद पिछले राष्ट्रीय एथलेटिक्स चैंपियनशिप में बनाया था। सक्षम की गति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि, गोली की रफ्तार भी कम लगती है। पलक झपकते वह फिनिशिंग लाइन पर दिखाई देता है। दर्शक दीर्घा से सक्षम…सक्षम… का शोर उभरना शुरू हो चुका था। ऐसा लग रहा था कि, पूरे स्टेडियम में सिर्फ सक्षम ही सक्षम है।
मैं सक्षम से मिलना चाहता था। क्योंकि मैं जिस सक्षम को जानता था वह यह नहीं था। मेरे लिए यह जानना अत्यंत जरूरी था कि, सक्षम यहाँ तक कैसे और क्यों पहुँचा ? वह तो एक क्रिकेटर बनना चाहता था। स्कूल के वक्त एक क्रिकेटर बनना ही उसका पहला और आखिरी सपना था। जुनून था। लक्ष्य था। मेरे साथ राज्य क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष भी थे। वह तो पूरी तरह मोबाइल फोन के हवाले थे। मैंने भी उन्हें वही करने दिया जो वह कर रहे थे।इतना जरूर था कि, वे बीच बीच में मेरी ओर देख कर मोबाइल पर बातें करने की अपनी जिम्मेदारी पूर्ण विवशता इशारे से जाहिर करना नहीं भूल रहे थे। मैंने भी उन्हें पूरी तरह स्वतंत्र छोड़ते हुए चिप्स का एक पैकेट लिया और कुतरने लगा। स्टेडियम नया और विशालकाय था। एक दूसरे कोने पर एकाध दूसरी स्पर्धाएं भी सम्पन्न की जा रही थीं। चुंकि चैंपियनशिप हमारे स्टेट में हो रही थी और मैं स्टेट मेन्स सीनियर क्रिकेट टीम का कोच भी हूँ इसलिए सक्षम से मुलाकात करने में मुझे कोई दिक्कत नहीं होने वाली थी।वैसे पिछले एशियन गेम्स में सक्षम ने एंजुरी के बावजूद बेहतरीन परफॉर्मेंस देते हुए स्वयं की टाइमिंग में सुधार भी किया था और ब्रांज मेडल पर कब्जा भी किया था। तब अखबार, मीडिया ने उसे भारी कवरेज दे सराहा था। अभी दौड़ शुरू होने में थोड़ा बहुत समय था। तब तक चिप्स के पैकेट को खाली करते हुए मैंने कुछ वर्ष पहले के पलों को वर्तमान में लाने का प्रयास किया और…
मुझे याद है सभी खिलाड़ियों को सुबह ग्राउंड पर पहुँचना था।अधिकांश आ चुके थे। सबसे पहले पहुँचने वाला था दुबला पतला लंबा सा एक लड़का। जिसे मैंने आज पहली बार स्कूल के ग्राउंड में देखा था। मैंने देखा वह मुझसे पहले वहाँ पहुँच चुका था। प्रेक्टिस शुरू करने से पहले वार्म अप और खासकर रनिंग को मैं सबसे ज्यादा महत्व देता था। वार्म अप और रनिंग के बाद मैंने सभी खिलाड़ियों को कतार बध्द खड़ा किया। कद के हिसाब से सक्षम अपनी कतार में सबसे पीछे खड़ा किया गया था। मैंने छात्रों को कहना शुरू किया।
“दो माह बाद इंटर स्कूल क्रिकेट टूर्नामेंट है। हमारा स्कूल डिफेंडिंग चेम्पियन है। जाहिर है इस साल भी हम कुछ नया नहीं चाह रहे होंगे।”
मेरी बातें शायद सभी खिलाड़ियों पर अच्छा प्रभाव डाल चुकी थीं।क्योंकि आठ राउंड रनिंग के बाद भी सभी के चेहरों पर एक धनात्मक मुस्कान आ गई थी। कुछेक नए स्टूडेंट भी आज दिखलाई दे रहे थे। मैंने सब का परिचय लिया। तभी मुझे पता चला दसवीं कक्षा का वह विद्यार्थी सक्षम है। प्रेक्टिस का शेड्यूल रोज सुबह और शाम का था। पुराने प्लेयर्स सभी ठीक चल रहे थे। इस बीच कुछ ऐसा हुआ कि, लास्ट इयर की टीम में से चार के चार प्लेयर इंज्यूर्ड हो गए। दो बैट्स मैन, एक आलराउंडर और एक बॉलर !अब ? मुझे चार स्थानों के लिए कम से कम पांच या छह खिलाड़ियों को टूर्नामेंट के लिए चयनित कर ट्रेंड करना होगा। मैं समझ रहा था। नए में से किसे लें ? किस पर यकीन किया जा सकता था ? कैप्टन से सलाह ली। उसने भी कहा… मैं तो नहीं बता पाऊँगा…नए में से किसी को किसी टूर्नामेंट में खेलते हुए भी नहीं देखा है, मैंने। मुझे मुश्किल में देख कर सक्षम मेरे पास आया और बोला।
“सर आप मुझ पर भरोसा कर सकते हैं”
“क्यों?”
मैंने पूछा। वह बोला।
“सर मैं मेहनत करूंगा और मुझे लगता है कि, मैं क्रिकेट के लिए ही बना हूँ।”
मैंने पूछा।
“क्रिकेट में क्या कर सकते हो… बैटिंग, बाउलिंग…क्या?”
वह बोला।
“कुछ भी।”
मैंने सोचा चलो देखते हैं.समय तो था अपने पास।
दो तीन दिनों तक फिटनेस पर ध्यान दिया, नए लड़कों पर.फिर ग्राउंड पर, नेट पर प्रेक्टिस… दो लड़के तो जबरदस्त नजर आए।एक बाॅलर और एक बैट्समैन। पर मुझे दो और चाहिए थे। एक आलराउंडर और एक बैट्समैन। यहां इतनी मेहनत के बाद सक्षम और बाकी खिलाड़ी औसत भी नहीं थे। फिर भी सक्षम से बेहतर थे। इस प्रकार उन्हें टीम में लेना मेरी मजबूरी भी थी और जरूरत भी थी। मैंने एक दिन सक्षम को बुलाया और कहा।
“सक्षम, मुझे लगता है…तुमसे नहीं होगा।”
सक्षम निराश नहीं हुआ। मेरी बात सुन कर वह बोला।
“मैं और मेहनत करूंगा… और आपको बताऊँगा कि, मैं क्रिकेट के लिए ही बना हूँ।”
मैंने उसे समझाने की फिर से कोशिश की।
“मेरे पास अब समय नहीं है, सक्षम। मैं चांस नहीं ले सकता।”
सक्षम ने अनुरोध किया।
“दो दिन…बस दो दिन और…सर प्लीज।”
मैं तैयार हो गया। मैंने सक्षम को पूरा मौका दिया पर कोई मतलब का नहीं निकला। न बैटिंग, न बाउलिंग… यहाँ तक कि उससे कीपिंग भी करवाई पर उसकी नजरें गेंद से हट जाया करती थीं। नतीजा, वह चोटिल हो जा रहा था। बस उसे गेंद के पीछे भागना आता था। वह तेज गति से गेंद के पीछे भागता और कुछ ही पल में गेंद से आगे निकल कर उसे पकड़ने की कोशिश करता पर सफल नहीं हो पाता था। मतलब फिल्डिंग भी नहीं हो पा रही थी, उससे।मुझे उस पर तरस भी आ रहा था। वह पूरी लगन और मेहनत से कोशिश कर रहा था। मैंने सक्षम से पूछा कि, आखिर वह खेल में ही विशेष कर किक्रेट में ही क्यों आगे बढ़ना चाहता है। वह बता रहा था।
“सर, मैं कुछ बनना चाहता हूँ। जीवन में नाम कमाना चाहता हूँ, एक स्थान बनाना चाहता हूं…. और कुछ नहीं।”
मैंने बड़े ध्यान से उसकी बातें सुनीं। मुझे उसकी बातें अच्छी लगीं पर ग्राउंड में सिर्फ बातों से ही काम नहीं चलता, मैं जानता था। यहाँ सही परफार्मेंस देना होता है। मैंने उसे भावुकता से परे व्यवहारिकता के साथ समझाया।
“देखो सक्षम, तुम्हारी सोच सही है। मेहनती भी हो। पर मेरे नजरिए से तुम्हारे लिए क्रिकेट नहीं है और न ही तुम क्रिकेट के लिए बने हो।”
मेरी बातें सक्षम बहुत गंभीरता के साथ सुन रहा था। उसे मेरी बातें बहुत अच्छी नहीं लग रही थीं। मैंने परवाह नहीं की। मैं जानता था कि, अगर अभी मैं सक्षम को नहीं समझा पाया तो देर हो सकती है और उसके सपने अधूरे रह जाएंगे। मैंने कहना जारी रखा और कहा।
“तुम व्हालिबॉल या बास्केटबॉल बेहतर खेल सकोगे लंबे कद का एडवांटेज मिलेगा, तुम्हें। तुममे गति है जो किसी भी खेल के लिए महत्वपूर्ण होती है।”
मैं समझ भी रहा था कि, उसे मेरी बातें बहुत बुरी लग रही हैं फिर भी उसने खुद पर काबू रखा और बोला।
“ठीक है सर, मैं कुछ और ट्राई करूंगा।”
इतना कहकर वह वहाँ से जाने लगा। मैंने उससे जाते जाते बस इतना और कहा।
“सक्षम बहुत बार ऐसा होता है कि, हम कहीं और खड़े होते हैं पर हमारा स्थान कहीं और होता है।”
उसने सर झुका कर मेरी बातों को सम्मानपूर्वक सुना और वह वहाँ से चला गया और आज उस दिन के बाद मैं उससे पहली बार मिलने वाला था। उसके कामयाबी के समाचार तो हम सभी को मिल जाते थे। पर स्कूल के बाद जब मुझे पहली बार उसके एथलेटिक्स के रूप में उसकी उपलब्धियों की खबर अखबारों और मीडिया के जरिए पता चलीं तभी से मुझे सक्षम से मिलने की इच्छा हो रही थी।
रेस शुरू हुई और खत्म भी हो गई। जैसे शुरू ही नहीं हुई और खत्म हो गई हो। सक्षम ने अपनी टाइमिंग में जबरदस्त सुधार किया और अगले ओलंपिक गेम्स में सफलता लिए एक कदम और बढ़ाया।
उसने मुझे देखते ही तुरंत पहचान लिया। चेहरे पर विजयी मुस्कान के साथ वह मुझसे मिल रहा था। मैं हाथ बढ़ाकर उसे बधाई देने उसकी ओर बढ़ा। वह झुका और उसने मेरे पैर छू लिए। मैंने उसे गले लगाकर बधाई दी। थोड़ी बहुत औपचारिक बातों के बाद हम दोनों बातों में मशगूल थे। वह बता रहा था।
“उस दिन के बाद से मैंने भी मान लिया कि,क्रिकेट मेरे लिए और मैं क्रिकेट के लिए नहीं बना हूं…मतलब जैसा कि आपने समझाया था… वह मेरा स्थान नहीं था।”
उसने अपनी बातों की कड़ी का अंतिम वाक्य मुस्कुराते हुए कहा और बहुत ही चतुराई और सम्मान के साथ अपने संघर्ष और कामयाबी के सफर में मेरा एक अहम स्थान तय कर दिया। हम कॉफी पी रहे थे। वह अपेक्षाकृत शांत सा था। शायद मेहनत, परिपक्वता और कामयाबी इसकी वजह हो सकती थी। वह बता रहा था।
“मैंने गौर किया कि, मैं तेज भाग सकता हूँ। जैसे कि, गेंद के पीछे भागा करता था…बस तब से भागते भागते आज उस स्थान पर पहुँचा हूँ जो स्थान मेरे लिए बना था, शायद…”
इतना कह कर वह एक बार फिर मुस्कराया। मैं भी उसकी बातों को समझा और मैंने भी मुस्कुराते हुए कहा।
“सही कहा तुमने। मुझे भी ऐसा ही लगता है कि, अभी भी तुम उस स्थान पर नहीं पहुँचे हो जहाँ तुम्हे होना चाहिए, सक्षम ?”
सक्षम की आँखों में चमक थी। उसने माहौल को खुशनुमा बनाने की कोशिश की और कहा।
“मुझे लगता है आप इस बार भी सही कह रहे हैं सर…तभी तो मेरे इस सफर में आप उस दिन के बाद से मुझे प्रत्यक्ष रूप से कहीं नजर नहीं आए…”
मैं भी उसके साथ हँस पड़ा। वह बोला।
“…क्योंकि आप अब भी मेरा उस फिनीशिंग लाइन पर इंतजार कर रहे हैं जो आपकी नजर में मेरा स्थान है और वहाँ तक पहुँचने का मेरा सफर अभी भी जारी है।”
इतना कुछ…? मुझे सक्षम की बातें सुनकर बेहद खुशी हो रही थी।उसके विचारों में इमेजिनेशन के साथ कितनी क्लीएरिटी थी जो उसकी उपलब्धियों के लिए बहुत जरूरी थी !
“ठीक है सर मैंने अपने रेस की शुरुआत आपके साथ की थी…अब मैं आपको उस रेस की फिनिशिंग लाइन पर ही मिलूंगा जहाँ आप खड़े हो कर मेरा इंतजार कर रहे हैं।”
मुझे उसकी बातें सुनकर बहुत खुशी महसूस हो रही थी। मैं गर्व से पुलकित हुआ था रहा था कि, कल का एक दुबला पतला सा जुझारू किस्म का बालक आज अपना, हमारा और पूरे देश का नाम रौशन करता जा रहा है और आज भी अपने लक्ष्य और स्थान को पाने के लिए कितना सहज है। मैंने पाया वह पूरी तरह से एक खिलाड़ी, एक एथलेटिक्स, एक रेसर के रूप में ढल चुका था। बहुत दूर निकल चुका था। फिर भी मेरे नजरों में वह अभी फिनीशिंग लाइन तक नहीं पहुँचा था। मेरी इस बात को वह समझ भी रहा था और सम्मान पूर्वक स्वीकार भी कर रहा था। एक गुरु के लिए इससे ज्यादा खुशी और गर्व की बात और क्या हो सकती थी?
मैंने उसे ओलिम्पिक गेम्स के लिए बधाई और शुभकामनाएं दीं। मैं खुश था। बहुत खुश था। अपने एक कोच, गुरु होने का निष्पक्ष और निःस्वार्थ कर्तव्य अप्रत्यक्ष रूप से ही सही पर निभाया था, मैंने। अब सक्षम की बारी थी। जिसके लिए वह मुझे पूरी तरह से सक्षम नजर आ रहा था। एक और एकलव्य की तरह उसने सिर्फ अपनी कल्पनाओं की तस्वीर में मुझे अपना गुरु माना था और आज भी सफलताओं के हर कदम पर वह मुझे अपना गुरु मान रहा है।







