सुश्री सरोज कंसारी
लेखिका, कवयित्री व अध्यापिका
अध्यक्ष: दुर्गा शक्ति समिति,
नवापारा-राजिम, (रायपुर, छ.ग.)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
आलेख:
“प्रेम पावन है, जो हंसना सिखाता है, मरना नहीं !”
-सुश्री सरोज कंसारी
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”प्रेम एक पावन नदी है,
माँगता केवल आदर है।
देना ही जाने,
यह तो अमित सागर है।”
प्रेम पवित्र व आदर से भरा होता है और बिना किसी उम्मीद के सिर्फ नि:स्वार्थ भाव से देना जानता है। प्रेम में एक-दूसरे के लिए मरना नहीं, जीना सीखिए। प्रेम का हर रूप सुंदर होता है। असफल होने पर जीवन समाप्त कर लेना प्रेम नहीं, कायरता है। आज की युवा पीढ़ी फिल्मों से प्रभावित होकर अपने वास्तविक जीवन को तमाशा बना रही है। चंद मुलाकातों, घूमने-फिरने और दिखावे को प्रेम का नाम देकर युवा अपने भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं। प्रेम का वास्तविक अर्थ समझे बिना ही वे जन्म-जन्मांतर के वादे कर बैठते हैं। जिन्हें जीवन की कटुता का ज्ञान नहीं, दो वक्त की रोटी का जुगाड़ कैसे होता है यह भी नहीं पता, वे जीवनसाथी चुनने की जल्दबाजी कर बैठते हैं।
माता-पिता अपने बच्चों को आंखों का तारा मानते हैं। पर बच्चे उनसे छुपकर क्या करते हैं, यह वे जान नहीं पाते। आज विश्वास तोड़कर हदें पार करने में युवाओं को संकोच नहीं होता। माता-पिता बच्चों को व्यक्तित्व-विकास और आत्मनिर्भरता के लिए घर से बाहर भेजते हैं। पर कुछ युवक-युवतियां इस आज़ादी का गलत फायदा उठाते हैं। यह देखकर मन विचलित हो जाता है। प्रेम एक पवित्र भावना है। इसमें सुकून है, मानसिक मजबूती है। किसी को देखकर, सोचकर जो सुखद एहसास हो, वही प्रेम है। आत्मिक प्रेम में पाने या खोने का भय नहीं होता।
पर, आज प्रेम का विचित्र रूप सामने है—असफल होने पर फांसी लगाना, कीटनाशक खा लेना, नदी में कूद जाना। जरा सोचिए, अचानक ऐसी खबर सुनकर माता-पिता के मन पर क्या बीतती होगी? जिन माता-पिता ने रात-रात जागकर, अपना पूरा जीवन आपके लिए समर्पित कर दिया, एक पल में आप उनकी परवरिश पर ही सवाल उठा देते हैं। कोई भी माता-पिता नहीं चाहते कि उनके बच्चे का जीवन बर्बाद हो। पर आज के बच्चे समझने को तैयार नहीं। हर सुख-सुविधा मिलने के कारण वे संघर्ष से दूर हैं।
फिल्मी नायक-नायिकाओं की नकल में होटल जाना, मौज-मस्ती करना और सार्वजनिक फूहड़ता को वे प्रेम मान बैठे हैं। जिस दिन प्रेम का वास्तविक रूप समझ जाएंगे, ऐसे कदम नहीं उठाएंगे। केवल पाना ही प्रेम नहीं है। आज देश को आज्ञाकारी, संस्कारी और सेवाभावी युवा पीढ़ी की जरूरत है। हमारे देश में गौतम बुद्ध, गांधी, सुभाषचंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद, विवेकानंद जैसे महापुरुष हुए जिन्होंने मातृभूमि के लिए सर्वस्व बलिदान कर दिया। आज भी सीमा पर खड़ा जवान दिन-रात पहरा देता है, जान की बाजी लगाता है। यही सच्चा प्रेम है—देशहित में कुर्बान होना।
केवल विवाह न हो पाने के कारण जीवन समाप्त कर देना महानता नहीं, कायरता है। यह परिवार से धोखा और प्रेम का अपमान है। बचपन से माता-पिता की गोद में पले बच्चे युवा होते ही प्रेम के चक्कर में पड़ जाते हैं। उन्हें प्रेम का भूत ऐसा सवार होता है कि बाकी सारे रिश्ते एक पल में ठुकरा देते हैं। सामाजिक नियम, कानून, मर्यादा, बंधन सब तोड़ देते हैं। जातीय और सामाजिक बंधन इसलिए हैं ताकि व्यवस्था बनी रहे, संस्कृति जीवित रहे। अगर कोई बंधन न हो तो चारों ओर अराजकता फैल जाएगी। बड़ों के हर निर्णय में सर्व-कल्याण की भावना होती है। जोश में होश खोकर हम अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार लेते हैं।
प्रत्येक माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे पढ़-लिखकर उनका नाम रोशन करें, बुढ़ापे का सहारा बनें। लेकिन युवा अवस्था की दहलीज पर कदम रखते ही आकर्षण में आकर युवा ऐसे कार्य कर बैठते हैं जिन्हें देखकर माता-पिता शर्मिंदा हो जाते हैं। अखबारों और सोशल मीडिया पर आए दिन खबरें आती हैं—जातीय बंधन या पारिवारिक असहमति के कारण प्रेम में असफल युवक-युवती ने आत्महत्या कर ली। यह बेहद चिंताजनक है। प्रेम मन का भाव है, आकर्षण स्वाभाविक है। लेकिन असफल होने पर या अनुमति न मिलने पर जीवन समाप्त कर लेना दुर्भाग्यपूर्ण है।
माता-पिता ने आपको पालने में अपना पूरा जीवन खर्च कर दिया। उनसे बढ़कर किसी और को प्राथमिकता देना और उसके न मिलने पर जीवन समाप्त कर देना छोटी मानसिकता का परिचायक है। जिंदगी मिली है तो इसे भरपूर जिएं। काबिल और आत्मनिर्भर बनें। फिर माता-पिता को विश्वास में लेकर सही व्यक्ति से विवाह करें। प्रेम करना गलत नहीं है, लेकिन अनुमति न मिलने पर घर से भाग जाना या आत्मघाती कदम उठाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं। जो माता-पिता अपना यौवन आपके निर्माण में खर्च कर देते हैं, बुढ़ापे में आपके सहारे जीते हैं, आपके बिना रह नहीं सकते—आप उनके कर्ज को कैसे भूल जाते हैं?
जो कल मिला उसके बिना आप रह नहीं सकते, पर जिसने जन्म दिया उसे दर्द देते हैं—यह कैसा प्रेम है? प्रेम का अर्थ सिर्फ किसी को पाना नहीं है। अपने माता-पिता, परिवार, गुरुजन और समाज का सम्मान करना और उनके अनुकूल कार्य करना ही वास्तविक प्रेम है। युवावस्था जीवन का नाजुक मोड़ है। इसमें परिपक्वता नहीं होती, सही-गलत का फैसला करने की क्षमता पूरी तरह विकसित नहीं होती। जीवन बहती नदी है। अगर हम एक जगह रुक गए तो निष्क्रिय हो जाएंगे। चलने का नाम जिंदगी है। मौत तो एक दिन आनी ही है, लेकिन समस्याओं से घबराकर मौत को गले लगाना कायरता है।
आज समय बदला है। अपने अनुसार व्यक्तित्व-विकास की स्वतंत्रता है। पर चंद पलों की खुशी के लिए परिवार से हमेशा के लिए दूर होना प्रेम नहीं हो सकता। जब माता-पिता आपके उचित-अनुचित कार्य पर सीख देते हैं, तो वे दुश्मन लगने लगते हैं। जरा सोचिए, मां-बाप का दिल दुखाकर क्या आप खुश रह पाएंगे? वे जो भी करते हैं, आपकी भलाई के लिए करते हैं। अक्सर जातीय बंधन के कारण प्रेमी जोड़ों को अंतरजातीय विवाह में समस्या आती है। परिवार और समाज मना करते हैं तो युवा उन्हें दुश्मन मान लेते हैं। भागकर विवाह कर लेते हैं या दबाव में आकर जान दे देते हैं।
जिंदगी जीने के लिए मिली है। अगर प्रेम में विवाह नहीं हो पाता तो इसका अर्थ यह नहीं कि आप आत्मघाती कदम उठा लें। समर्पण और त्याग करके भी प्रेम दिया जा सकता है। प्रेम सिर्फ लड़के-लड़की तक सीमित नहीं। प्रेम सृष्टि के कण-कण में है। जीवित रहकर अपनी जिम्मेदारियां निभाइए, माता-पिता और समाज को खुश रखिए। काबिल इंसान बनकर आप प्रेम का श्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकते हैं। यह हमारा सौभाग्य है कि हमारे जीवन के बड़े फैसले हमारे बुजुर्ग लेते हैं। पर हम किसी अजनबी से कुछ मुलाकातों के बाद उसे अपनी ज़िन्दगी मान बैठते हैं। माता-पिता पर विश्वास नहीं करते, पर कल मिले व्यक्ति के लिए जान देने को तैयार हो जाते हैं। यह कैसा प्रेम है? प्रेम जीवन की पावन तथा सकारात्मक ऊर्जा होती है। जीवन एक बार मिलता है—खुश रहिए और खुशियाँ बाँटिए। यही तो जिन्दगी है।
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