“खुद को पहले से बेहतर बनाते चलना है”

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सुश्री सरोज कंसारी

लेखिका/कवयित्री/अध्यापिका

अध्यक्ष: दुर्गा शक्ति समिति,

नवापारा-राजिम, रायपुर, (छ.ग.)

 

               (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

 

  “खुद को पहले से बेहतर बनाते चलना है”

— सुश्री सरोज कंसारी

 

“आगे बढ़ने का जज्बा और हुनर हृदय में है। जब जीवन ही स्थायी नहीं है, तो जीवन के दुःख-दर्द (जख्म) भी स्थायी नहीं हो सकते।”

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भीतर की व्याकुलता तुझे भटका नहीं सकती।

तू हिम्मत से काम तो ले, मन को हल्का रखना।

जिंन्दगी एक सफर है, इसे खूबसूरत बनाते जाना।

कोशिश यही रहे कि शांत रह सकें हर पल में।

 

जीना ही पर्याप्त है। हम ज़िंदा हैं — यही हर पल को खूबसूरती से जीने के लिए काफी है। अगर सुकून चाहिए तो जो पास है, उसे जकड़ कर मत रखो। खोने का डर दिल-दिमाग से निकाल दो। इस संसार में कुछ भी स्थायी नहीं। मोह उतना ही रखो कि छूट जाए तो खुद को संभाल सको। बेचैनी मत पालो। जिसमें छोड़ देने की ताकत है, वही हर हाल में मजबूती से खड़ा रहता है। जो छोड़ नहीं पाते, वे उम्र भर दुख ढोते हैं। जिस पर तुम्हारा बस नहीं, उसे पल भर में त्याग दो और आजाद जीना सीखो। ज्यादातर परेशानियाँ मोह से जन्म लेती हैं। जब तक पकड़ कर रखा है, बेचैन रहोगे। जिस दिन हर होनी-अनहोनी को सहजता से स्वीकार कर लोगे, उसी दिन शांत हो जाओगे। सुख-दुख ही जीवन है, इससे भागा नहीं जा सकता।

 

हम अक्सर सांसारिकता में डूबे रहना चाहते हैं — पद, प्रतिष्ठा, दौलत, शोहरत, भोग-विलास में। रिश्ते-नाते, परिवार-समाज हमारी जिम्मेदारी हैं, उन्हें निभाना धर्म है। मगर हम कभी-कभी केवल दूसरों से उम्मीद करते हैं कि वे हमें समझें, हमारा साथ दें, और अपना कर्तव्य भूल जाते हैं। विवाद यहीं से शुरू होता है। दूसरों की कमी निकालने से हम अच्छे नहीं बन जाते। समझदारी यही है कि अपने हिस्से की जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभाएँ। जीवन में अचानक हादसे होते हैं। नुकसान होता है, मन पर गहरा असर पड़ता है। हादसों पर हमारा नियंत्रण नहीं, पर खुद को मजबूत रखकर हम दुख से बाहर निकल सकते हैं। इसलिए हर चुनौती से लड़ने की ताकत खुद में पैदा करना जरूरी है।

 

हर इंसान के पास अपना दर्द है। सबको साथ लेकर चलो, मिल-जुलकर काम करो — तभी आगे बढ़ पाओगे। गुस्से में चिल्लाने से मसले हल नहीं होते, और उलझ जाते हैं। अपनी बात मजबूती से रखो, पर दूसरों की पीड़ा भी सुनो। हर भावना का सम्मान करो। खुलकर जियो और खुशियाँ बाँटो। जो तुम्हारा है, उसे स्वीकार करो, जो नहीं है, उसे जाने दो। दर्द है तो सहना ही होगा, पर हँसना-मुस्कुराना मत छोड़ो।

 

कभी किसी दुखी को प्रेम से गले लगाकर देखो — दर्द सच में कम हो जाता है। हम सब अधूरे हैं। न कोई पूरी तरह ईमानदार है, न पूरी तरह बुरा। हम सबमें कुछ खामी, कुछ खूबी है। इसलिए शिकवे भूलकर खुशियाँ ही बाँटो। नफरत की किसी को आवश्यकता नहीं।

 

जब तक जिंदगी है, तभी तक सुख-दुख महसूस कर सकते हो। होनी-अनहोनी चलती रहेगी। तुम्हें बस चलते रहना है और इस सफर को सुखद बनाना है। घबराओ मत। अपनी जिंदगी के हर अँधेरे को मिटाने की कोशिश करते रहो। जब जीवन दुख से भर जाए तो मन का व्याकुल होना स्वाभाविक है। हर कोई दुख का बोझ नहीं संभाल पाता। कभी-कभी सही रास्ता, सांत्वना या प्रेम समय पर न मिले तो इंसान भटक जाता है।

 

गिरकर फिर खड़े होने की हिम्मत रखो। एक बार गलत कदम पड़ जाए तो सुधरने में वक्त लगता है, या सिर्फ पछतावा बचता है। कष्ट में तनाव होता है, पर डिप्रेशन में चले जाना खुद को ही नुकसान पहुँचाना है। तनाव में सबसे पहले मन को शांत करो। ‘क्या होगा’ सोचकर घबराओ मत। धड़कन को थामो। यकीन रखो, हर समस्या का हल निकलता है। दुख की घड़ी में संयम मत खोना। जख्म भरने तक इंतजार करना भी जरूरी है।

 

आज हमारी सबसे बड़ी कोशिश यही रहनी चाहिए कि हम आज में जी सकें, हर पल खुश रह सकें और अपने कर्म पूरी निष्ठा के साथ कर सकें। मन को हर पल मजबूत रख सकें। इंसान की सांसें चल रही हैं, क्या ये हमारी हैं? नहीं हैं, कभी भी बंद हो सकती हैं। तो हमारे जख्म हमारे कैसे हो सकते हैं? यह जीवन एक बार मिलता है, इसे तो खुशी-खुशी जीना है। हर दिन खुद को पहले से बेहतर बनाते चलना है, बढ़ते जाना है।

 

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