सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री/लेखिका/शिक्षिका
रिपोर्टर/उद्घोषिका
नवापारा-राजिम, रायपुर, (छ.ग.)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
आलेख
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‘हमारे भीतर एक असीम ऊर्जा है जो हर संकट को बदल सकती है’।
– सुश्री सरोज कंसारी
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भय से बढ़कर कोई वायरस नहीं, हिम्मत से बड़ी कोई वैक्सीन नहीं। इस धरा पर सबसे शक्तिशाली अगर कोई है तो वह है मनुष्य। जिसके पास दुनिया की हर बुराई और समस्या से लड़ने की ताकत है। ऐसा कोई काम नहीं जिसे वह न कर पाए। उसकी मुट्ठी में तूफ़ान का रुख मोड़ने की क्षमता है। अडिग पहाड़ को तोड़कर क्षण भर में चकनाचूर कर देने का हुनर है। धरती पर रहकर आज मनुष्य आसमान को छूने में सफल है। उसकी आँखों में तेज़ ज्वाला है जो हर अत्याचार को मिटा सकती है। विशाल सागर में डूबकर वहाँ से मोती लाने में सक्षम है। असंभव की हर सीमा को पार कर संभव सिर्फ मनुष्य ही कर सकता है।
जीवन की राह काँटों से भरी होती है। दर्द के हर मोड़ पर दरिया है। जख्मों को कुरेदने के लिए तानों के अंबार हैं। हर पल एक इम्तिहान है। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि हादसों से भरी ज़िंदगी के बावजूद जिनके मन में जीने की चाह होती है, वे अंधेरी राह में भी उम्मीदों की रोशनी जला ही लेते हैं। साहस के पग बहुत मजबूत होते हैं जो कभी डगमगाते नहीं। तभी असीम यातनाओं को सहते हुए भी ग़म का भारी बोझ ढोते हैं। कभी सड़क, गली, चौराहे या अपने आसपास किसी शारीरिक रूप से कमज़ोर व्यक्ति को देखते हैं तो हृदय करुणा से भर जाता है और सोचते हैं – कैसे जीवन-यापन करते होंगे ये। किसी के हाथ-पैर नहीं, कोई देख, बोल और सुन नहीं पाता। हम उन पर दया-दृष्टि का भाव रखते हैं। लेकिन आप कभी गौर करेंगे तो पता चलेगा कि शारीरिक रूप से कमज़ोर व्यक्ति भी इतिहास रचते हैं। खेल, साहित्य, कला, संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में अद्भुत कार्य कर दिखाते हैं। वे ऐसा कैसे कर पाते हैं? इसका एक ही कारण है – मनोबल को ज़िंदा रखकर अपनी हर छोटी सोच को निकाल फेंकते हैं। विधाता ने मनुष्य को अपार क्षमता दी है और साथ ही हर पग में परीक्षा, ताकि वह अपनी मेहनत, कला, सोच और क्षमता से एक नया निर्माण करता रहे।
डर एक नकारात्मक प्रक्रिया है। जोखिमपूर्ण कार्य को करने में असमंजस की स्थिति है। होनी-अनहोनी की बुरी कल्पना की जकड़ में होने से भय उत्पन्न होता है। मन की कमज़ोर स्थिति ही भय है। जो छोटी-छोटी बातों में घबरा जाते हैं, किसी भी अव्यावहारिक परिस्थिति को सहज न ले पाना भी इसी का रूप है। परिवार, समाज और राष्ट्र में रहते हुए कई बार अप्रिय बातें हो जाती हैं। अप्रिय घटनाओं को स्वीकार न कर पाने की स्थिति ही डर है। जो व्यक्ति हर पल सुख-सुविधा में होते हैं, कभी कोई बड़ी समस्या का सामना नहीं किए होते, अर्थात एकदम लाड़-प्यार में पले होते हैं, ऐसे लोग अक्सर थोड़ी सी परेशानी आने पर बौखला जाते हैं। अचानक कोई हादसा देख लें या खुद पर गुज़रे तो थोड़ी देर के लिए असहज हो जाते हैं। धड़कन तेज़ होने लगती है, हाथ-पैर काँपने लगते हैं और मन विचलित होने लगता है। उस समय निर्णय लेने की क्षमता उनमें घट जाती है।
डर एक मानसिक कमजोरी है जो कम या ज्यादा मात्रा में हर किसी में होती ही है। यह स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन डर को खुद पर ज़रूरत से ज्यादा हावी कर लेने से यही विकराल समस्या बन जाती है। कभी-कभी अति भय की वजह से भी व्यक्ति अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है। इसलिए हर समय सहज रहें, मन को बोझिल न करें। हर हालात और चुनौतियों के लिए खुद को तैयार रखें। रिश्वत, घूसखोरी, शोषण, आतंक, देशद्रोह, अत्याचार, बेईमानी और भ्रष्टाचार करने से डरें। देश की एकता-अखंडता को नुकसान हो, ऐसा कोई कार्य न करें। लेकिन सत्य की रक्षा, मानवता के कल्याण और परिवार के हित के लिए कभी पीछे न हटें। भय से हमेशा एक कदम आगे जाकर विचार करें। जिस कार्य को करने की आपकी आत्मा गवाही न दे, उसे कभी न करें।
अति डरपोक व्यक्ति अपने जीवन के हर अच्छे अवसर को भी खो देते हैं। मन की अव्यावहारिक कल्पनाएं, जिनसे वास्तविकता से कोई वास्ता ही नहीं होता, उनके बारे में सोचते रहना एक तरह से पागलपन है। लेकिन किसी अज्ञात नुकसान के डर से उसे करने के लिए तैयार नहीं हो पाते। इसी डर के कारण कभी-कभी अपार संभावनाएं होते हुए भी व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का विकास नहीं कर पाता। इसलिए मन-मस्तिष्क से अनावश्यक आशंका को दूर रखकर सही कार्य के लिए, जिससे आपके साथ कई लोगों के हित जुड़े होते हैं, भले ही जोखिम भरे हों, अवश्य करना चाहिए। डर को दूर करने और ज़िंदगी के सफ़र में आने वाली कठिनाई से लड़ने का सबसे बड़ा हथियार है – साहस। जो व्यक्ति साहसी होते हैं, उन्हें कोई नहीं हरा पाता। धन-दौलत और शोहरत हर जगह पर जीत नहीं दिला सकते। भले पास कुछ न हो, खाली हाथ भी आप हर जंग सिर्फ़ हिम्मत करके ही जीत सकते हैं। जब सही कार्य के लिए आगे बढ़ते हैं और भय को निकाल देते हैं, तब आत्मविश्वास बढ़ जाने से हृदय में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। हमें जोखिम उठाने से पीछे नहीं होना चाहिए। जब कोई साथ नहीं होते, उस समय हिम्मत ही शस्त्र बनकर हमारी रक्षा-कवच बनती है।
कहते हैं – “डर से बढ़कर कोई वायरस नहीं और हिम्मत से बड़ी कोई वैक्सीन नहीं।” बेवजह डर को मन में पालकर रखना कायरता की निशानी है। हर कदम पर यहाँ ग़म की अंधियारी है, वीरान राहें हैं, सूनसान सड़कें हैं और कठोर, कुटिल और आक्रामक व्यक्ति का भी कहीं न कहीं सामना करना ही होता है। प्रतिक्षण कोई भी हमारी सुरक्षा के लिए तैनात नहीं रह सकता। सबकी अपनी अलग लड़ाई होती है। अलग-अलग जगह पर अपनी क्षमता का प्रयोग करने के लिए सूझ-बूझ के साथ हमें सबसे अधिक हौसला रखने की आवश्यकता होती है। भय वायरस के समान है। जो एक बार मन में पनप गया, फिर यह अनमोल शरीर और मानसिकता एकदम शिथिल हो जाती है। कई बार अंदर ही अंदर किसी आशंका को लेकर घुटते रहने से कई प्रकार की मानसिक व्याधि हमें घेर लेती हैं और हम समय से पहले ही बीमार हो जाते हैं। डर के भाव बहुत तेज गति से फैलकर मस्तिष्क को नुकसान पहुँचाते हैं और आसपास रहने वाले और करीबी व्यक्ति को भी कमज़ोर कर देते हैं।
जैसे वैक्सीन में रोग-प्रतिरोधक क्षमता होती है जो हमें विभिन्न बीमारियों से बचाती है और उसे लगाने पर हम सहज हो जाते हैं। एक विश्वास का भाव मन में भर जाता है – अब हम ठीक हैं, सुरक्षित हैं। फिर मन में कोई वहम नहीं पालते। उसी समय हौसला आ जाता है। और जब भय को मन से निकाल देते हैं, तभी शरीर में दवाई का असर होता है और हम पूर्ण रूप से स्वस्थ हो जाते हैं। सिर्फ़ साहस और धैर्य के कारण, हिम्मत करने से समस्या का समाधान मिलता है। इंसान को सबसे ज्यादा डर मौत से लगता है। जन्म हुआ है तो मृत्यु तो निश्चित है। लेकिन कुछ लोग अंजान आशंका से ग्रसित होते हैं और मृत्यु की कल्पना करके ही सहम जाते हैं – “कल क्या होगा? मुझे कुछ हो गया तो? कोई बीमारी तो नहीं है मुझे? मेरे बाद परिवार का क्या होगा?” बिल्ली के रास्ता काटने, छींक आने, दिया बुझने, किसी के जाते वक्त टोकने और अफवाह पर विश्वास करने वाले लोग अक्सर ये सब सोचते हैं और शुभ-अशुभ के चक्कर में ही अव्यवस्थित रहते हैं। और जो लम्हें आनंद के होते हैं, उसे भी गँवा देते हैं। अतः भय ही वायरस है और हिम्मत सबसे बड़ी वैक्सीन। हिम्मत से काम लें।
“कविता”
”मनुज! तू स्वयं अपने भीतर,
ईश्वर-सी सृजनशक्ति रखता है,
बस, निराश व भयभीत न होना,
तू तो हर बाधा से लड़ सकता है।
अचल, अटल रह, डटे रहना सदा।”
मनुष्य की बुद्धि संसार को देखती है और चेतना स्वयं को। मनुष्य को भय का त्याग कर देना चाहिए; यदि वह अडिग रहकर कर्म करता जाएगा, तो मुक्त रहेगा। जो कार्य इंसान व्याकुल होकर करता है, यदि वही कार्य शांत मन से करे, तो वह स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभकारी होता है।
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