संजय सोंधी
(संयुक्त निदेशक)
शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
आधुनिक संवेदनाओं का बंजर और पैसों की रसीद पर टिके रिश्ते।
जीवन की जिस दहलीज पर संतान की एक छांव के लिए तरसते पिता की सांसें थम गईं, उस दहलीज पर रिश्तों की कड़वी सच्चाई ने पूरे समाज की आत्मा को झझोक कर रख दिया। हरियाणा के सोनीपत स्थित समाज कल्याण शिक्षा समिति द्वारा संचालित वृद्धाश्रम से आई यह खबर केवल एक बुजुर्ग के देहांत की नहीं, बल्कि आधुनिक समाज में मरती हुई मानवीय संवेदनाओं की दुखद दास्तान है। 74 वर्षीय शिवचरण रामरतन गुप्ता, जो कभी मुंबई में एक खुशहाल कपड़ा व्यापारी थे, अपने जीवन के अंतिम दिनों में बिल्कुल अकेले रह गए थे। समाज अक्सर यह सवाल उठाता है कि क्या बेटे ही मां-बाप का बुढ़ापे का सहारा बनते हैं? लेकिन शिवचरण जी का कोई पुत्र नहीं था। उनकी केवल तीन बेटियां थीं—अनीता, निशा और प्रिया।
शिवचरण जी ने अपनी तीनों बेटियों को पढ़ा-लिखाकर काबिल बनाया था, जिनमें से दो बेटियां अध्यापिका जैसे गरिमामयी पद पर कार्यरत हैं और एक नेपाल, दूसरी उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ तथा तीसरी मुंबई में रहती हैं। पिता ने जिस लाड़-प्यार से बेटियों को बड़ा किया, उन्होंने शायद कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जीवन की अंतिम यात्रा में यही बेटियां केवल एक दर्शक बनकर रह जाएंगी। करीब डेढ़ वर्ष पहले शिवचरण जी अपनी पत्नी के साथ सोनीपत के इस वृद्धाश्रम में रहने आए थे। कुछ समय पहले पत्नी का साथ छूटा, तो वे शारीरिक और मानसिक रूप से और टूट गए।
जब शिवचरण जी की तबीयत बिगड़ी, तब वृद्धाश्रम प्रबंधन ने उनकी बेटियों से संपर्क किया, लेकिन कोई भी उन्हें देखने नहीं पहुंची। जब उन्होंने अंतिम सांस ली, तब वृद्धाश्रम के संचालकों ने तीनों बेटियों को पिता के अंतिम संस्कार के लिए तुरंत सोनीपत पहुंचने की गुहार लगाई। लेकिन जो जवाब मिला, उसने मानवता को शर्मसार कर दिया। बेटियों ने दूरियों और अपनी मजबूरियों का हवाला देते हुए आने से साफ मना कर दिया और अंतिम संस्कार के खर्च के नाम पर ₹5,100 ऑनलाइन ट्रांसफर कर दिए। उन्होंने वृद्धाश्रम के संचालकों से ही अंतिम क्रियाएं संपन्न कराने की विनती की और पूरी प्रक्रिया को लाइव वीडियो कॉल के जरिए देखा। इतना ही नहीं, उन्होंने अंतिम संस्कार की वीडियो रिकॉर्डिंग भी मांगी और बाद में अस्थियों को भी गंगा में प्रवाहित करवाने का आग्रह कर दिया।
₹5,100 की यह डिजिटल रकम उस पिता के जीवन भर के समर्पण का हिसाब तो नहीं हो सकती थी, जिसे उन्होंने अपनी बेटियों के भविष्य के लिए न्योछावर कर दिया था। आख़िरकार, वृद्धाश्रम के कर्मचारियों और स्थानीय समाजसेवियों ने ही एक पुत्र की भूमिका निभाते हुए शिवचरण जी का दाह संस्कार किया। पुत्र का न होना बेटियों के लिए पिता के प्रति दायित्वों से मुंह मोड़ने का बहाना नहीं बन सकता। यह घटना चीख-चीखकर सवाल पूछती है कि क्या हमारी तरक्की ने हमें इतना व्यावहारिक बना दिया है कि हम माता-पिता के अंतिम स्पर्श की कीमत भी पैसों से चुकाने लगे हैं? पैसों से सुविधाएं खरीदी जा सकती हैं, लेकिन संवेदनाएं, कर्तव्य और अंतिम विदाई का दर्द कभी नहीं खरीदा जा सकता।







