राजकुमार कुम्भज
जवाहरमार्ग, इन्दौर
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
एक विनम्र स्मरण; राजेन्द्र माथुर।
7 अगस्त, जन्मदिन।
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राजेन्द्र माथुर पत्रकारिता के पुरोधा भी थे और निर्भय निर्देशक-प्रहरी भी।
वे एक ऐसा मार्ग-संकेतक थे, जिसने पत्रकारिता को नये-नये अर्थ और आयाम दिए। उनका लिखा पत्थर की लकीर नहीं था, लेकिन नई लकीर अवश्य ही खींचता था।
सुविधा अथवा संघर्ष के लिए लिखना, इसके समुच्य अनंत को वे अच्छी तरह जानते-पहचानते थे।
राजेन्द्र माथुर की सोच-समझ ने, राजेन्द्र माथुर को पत्रकारिता का पाठ्यक्रम बना दिया था। उनकी सीख तथा दृष्टि का विस्मयकारी-प्रमाण यही है कि उनका, रोजमर्रा का लिखा आज भी नये-पुराने पत्रकारों के लिए अनुकरणीय उदाहरण बना हुआ है।
वे बदनावर के ग्रामीण-क्षेत्र की मिट्टी से निकला एक ऐसा छोटा-सा पत्थर थे,जो निश्चित ही यह जानता था कि पत्थर कहाँ लगना चाहिए?
उत्पात और उत्पाद हो रहना,पत्रकार का ध्येय नहीं हो सकता है।एक पत्रकार की निष्ठाऍं तथा प्रतिबद्धताऍं क्या होती हैं अथवा हो सकती हैं अथवा होनी चाहिए, इसकी सीमाओं और जिम्मेदारियों से ही उसकी विश्वसनीयता कायम होती है। इस मंत्र की व्याख्या और व्यवहारिक-व्यवस्था, राजेन्द्र माथुर से बेहतर क्या कोई और भी माई का लाल दे सकता है?
राजेन्द्र माथुर की लिखी-अलिखी ऐसी कई स्थापनाऍं हैं, जो समकालीन मिडियाकर्मियों के लिए, स्थापित मान्यताओं के विरुद्ध, टाॅर्च का काम करती हैं।
राजेन्द्र माथुर का स्मरण करना, खुद को टटोलने-खोजने जैसा काम है।
मैं उन्हें विनम्रतापूर्वक याद करता हूँ और खुद को टटोलने की कोशिश भी।
7 अगस्त की तारीख है, रज्जू बाबू का जन्म दिन. उनकी मैत्री और उनके मार्गदर्शन को कोटिश: नमन।







