संजय सोंधी
(संयुक्त निदेशक)
शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
सृष्टि के मूल संरक्षक: संरक्षण, संकट और संघर्ष के बीच भारत का आदिवासी समाज।
प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को ‘विश्व आदिवासी दिवस’ मनाया जाता है। यह अवसर भारत की उस मूल चेतना को नमन करने का है जिसने युगों-युगों से इस धरती को संभाले रखा है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में जनजातीय आबादी लगभग 10.43 करोड़ है, जो देश की कुल जनसंख्या का 8.6 प्रतिशत हिस्सा बनाती है। आदिवासी समाज केवल एक जनसांख्यिकी आंकड़ा नहीं है, बल्कि वह उस सह-अस्तित्ववादी जीवनशैली का जीवंत प्रतीक है जिसकी आवश्यकता आज की पूरी दुनिया को है। प्रकृति प्रेम और पर्यावरण संरक्षण की जो भावना आदिवासी संस्कृति की आत्मा में रची-बसी है, वह किसी आधुनिक वैज्ञानिक शोध की मोहताज नहीं है। हजारों वर्षों से यह समाज जल, जंगल और जमीन को उपभोग की वस्तु मानने के बजाय जीवंत देव-स्वरूप मानता आया है। झारखंड और मध्य भारत की सरना संस्कृति से लेकर पूर्वोत्तर के पवित्र उपवनों तक, आदिवासियों ने पारंपरिक ज्ञान के बल पर जैव विविधता का संरक्षण किया है। वे जंगलों से उतना ही लेते हैं जितना उनके अस्तित्व के लिए अनिवार्य है, जिससे प्रकृति का संतुलन सदैव बना रहता है।
लेकिन इस अटूट प्रकृति प्रेम और समृद्ध धरोहर के बावजूद, आज भारत का आदिवासी समाज अपनी पहचान, अस्तित्व और संसाधनों की रक्षा के गंभीर संकट से जूझ रहा है। इस संकट का सबसे दर्दनाक पहलू आदिवासियों का अनवरत विस्थापन है। स्वतंत्रता के बाद से भारत में बांधों, खदानों, अभयारण्यों और औद्योगिक परियोजनाओं के नाम पर तथाकथित ‘विकास’ का जो ढांचा खड़ा किया गया, उसकी सबसे भारी कीमत इसी समाज ने चुकाई है। विभिन्न स्वतंत्र अध्ययनों और आंकड़ों के मुताबिक भारत में विकास परियोजनाओं के कारण कुल विस्थापित लोगों में से लगभग 40 प्रतिशत लोग आदिवासी समुदाय से आते हैं। अपनी मूल भूमि से उजड़ने का अर्थ केवल भूगोल बदलना नहीं होता, बल्कि उनकी सदियों पुरानी संस्कृति, सामुदायिक जीवन और आजीविका के पारंपरिक स्रोतों का हमेशा के लिए नष्ट हो जाना है।
भूमि विस्थापन के इस दौर में आदिवासी भाषाएं और बोलियां भी विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी हैं। भारत में बोली जाने वाली सैंकड़ों आदिवासी बोलियों में से दर्जनों बोलियां या तो विलुप्त हो चुकी हैं या अंत के करीब हैं। भाषाविदों और यूनेस्को के अध्ययनों के अनुसार भारत में संकटग्रस्त भाषाओं में सबसे अधिक संख्या जनजातीय बोलियों की है। जब एक आदिवासी बोली मरती है, तो उसके साथ हजारों साल का मौखिक इतिहास, जड़ी-बूटियों का पारंपरिक ज्ञान, लोककथाएं और पर्यावरण से जुड़ी समझ भी हमेशा के लिए दफन हो जाती है। औपचारिक शिक्षा प्रणाली में उनकी मातृभाषा की उपेक्षा और आधुनिक भाषाई दबावों के कारण नई पीढ़ी अपनी बोलियों से दूर होती जा रही है।
तमाम अभावों और संकटों के बावजूद आदिवासी समाज की एक सबसे बड़ी ताकत उनका सामाजिक ताना-बाना और महिलाओं का उच्च स्थान है। मुख्यधारा के पितृसत्तात्मक समाज की तुलना में आदिवासी समाज में लैंगिक समानता की जड़ें बहुत गहरी हैं। 2011 की जनगणना के आंकड़े भी इस बात की गवाही देते हैं, जहां राष्ट्रीय लिंगानुपात 943 है, वहीं अनुसूचित जनजातियों में लिंगानुपात 990 दर्ज किया गया था। आदिवासी महिलाओं का सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण किसी कृत्रिम कानून का परिणाम नहीं है, बल्कि उनकी पारम्परिक संस्कृति का हिस्सा है। वे न केवल आर्थिक गतिविधियों और वन उपज के प्रबंधन में बराबर की भागीदार होती हैं, बल्कि पारिवारिक और सामुदायिक निर्णयों में भी उनकी राय का विशेष महत्व होता है। बाल विवाह और दहेज प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियां आदिवासी समाज में अमूमन अनुपस्थित रही हैं।
9 अगस्त का यह दिन केवल उत्सव मनाने का नहीं, बल्कि आत्ममंथन करने का है। यदि हमें एक समावेशी और टिकाऊ भारत का निर्माण करना है, तो हमें आदिवासियों को केवल विकास का लाभ प्राप्तकर्ता मानने के बजाय संरक्षण का संरक्षक मानना होगा। उनकी बोलियों का दस्तावेजीकरण, उनकी भूमि अधिकारों की मजबूत सुरक्षा और उनकी जीवनशैली के सम्मान के बिना भारत की आत्मा को समृद्ध नहीं बनाया जा सकता।







