संशय अन्यथा नहीं है।

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राजकुमार कुम्भज, इन्दौर

 

 

        (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

 

संशय अन्यथा नहीं है।

    ___________________

 

संशय अन्यथा नहीं है कि देश के लगभग सभी राजनीतिक-दल सत्ता-प्राप्ति की मंशा से महाधूर्ततापूर्ण तरीके अपनाते हुए, आंदोलित छात्र-छात्राओं को एक बार फिर, अपनी स्वार्थसिद्धि का साधन बनाने में सक्रिय हो गए हैं।

उन्हें सफलता मिलेगी अ‌थवा नहीं, ये सोचना अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन उनकी कुचालें, आंदोलन के ऊबाल को पथभ्रष्ट करने के लिए पर्याप्त दिखाई दे रही हैं। राजनीति अपना चेहरा राज्यवार बदल रही है। ये सब उपक्रम नये नहीं हैं। जो होना चाहिए, वह तो जरा भी हो नहीं रहा है और जो नहीं होना चाहिए, वह सब कुछ हो रहा है। व्यवस्था-परिवर्तन का मुख्य मुद्दा कहाँ गायब है?

इस दृष्टिकोण को कुछ गहरी गंभीरता और कुछ नये दृष्टिकोण से समझने की जरूरत है। गाने-बजाने के संस्कार और हर्ज क्या अपनी-अपनी परंपराओं तथा निष्ठाओं में नहीं देखे जा सकते हैं?

आज की युवा पीढ़ी के शौक-मौज पहले से संचालित होती आ रही मानसिकता से बहुविध भिन्न हैं। इसी क्रम में उनकी हताशा-निराशा और पीड़ा भी‌। वे स्वाभिमान और स्वनिर्णय-स्वनिर्मित स्वतंत्रताओं की अपेक्षा अधिकतम रखते हैं।

भ्रष्टाचार-मुक्त व्यवस्था के साथ शिक्षा,सेहत और रोटी-रोजी के अधिकार सभी चाहते हैं, लेकिन सवाल वही है कि इसमें सफलता कैसे मिलेगी?

इन तमाम संदर्भों में अजब-ग़ज़ब धुरंधर क़िस्म की राजनीति हो रही है। साॅंस्कृतिक-संगठन की ओर से बागडोर सीधे-सीधे संध-प्रमुख मोहनदास भागवतजी ने अपने लाभार्जन हेतु अपने हाथों में ले रखी है। जाहिर है कि अंदरखाने सेंधमारी हो चुकी है। भोलेपन की ये दिखावटी मरहम-पट्टी बेकार का ड्रामा है। गाड़ी भी वही, गाड़ी मालिक भी वही, गाड़ी में असबाब-अस्लाह भी वही, ड्राइवर भी वही…..?

 

(एक खुला प्रहसन चल रहा है जिसमें सहयोगी कलाकारों को सम्मानित करने और बदलते रहने का विकल्प खुला है।)

 

एलिट-वर्ग के छात्र-छात्राओं को बेहद ही शालीनता से लपेट-लपेटकर, मधुर-मधुर धर्मांधता, राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की घुट्टी पिलाई जा रही है। अपनी असामान्य-सी समस्त रीतियों-नितियों को लागू करने वाला नये चेहरोंवाला नया शासक-वर्ग तैयार किया जा रहा है। क्या अब से आगे समाज में सिर्फ़ दो ही वर्ग होंगे, शासक और शोशित?

भूलना नहीं चाहिए कि किसी भी तमाशे का कार्य-काल अधिक दिनों तक नहीं टिकता है,सत्ता का पागल हाथी किसी न किसी दिन महावत को भी रौंद सकता है?

 

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