सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री, लेखिका, शिक्षिका
रिपोर्टर, उद्घोषिका, नवापारा-राजिम
रायपुर (छत्तीसगढ़)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
आलेख
हमारी आंतरिक यात्रा में ही सुख-संतोष निहित है
: सुश्री सरोज कंसारी
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आनंद एक आंतरिक अनुभूति है, जिसे पाकर जीवन की सारी दुविधाएं समाप्त हो जाती हैं। प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में सुख-समृद्धि के साथ ही आनंदित जीवन की कल्पना करता है, लेकिन जीवन की समस्याओं और उलझनों से निकल ही नहीं पाता। यही वजह है कि अधिकतर समय शारीरिक-मानसिक थकान के साथ ही तनाव-चिंता में अपना समय व्यतीत करता है। उसके जीवन में किसी प्रकार की खुशियों का संचार नहीं होता। अधिकतर लोग सोचते हैं कि दौलत-शोहरत और जमीन-जायदाद, बंगले-गाड़ी, नौकर-चाकर होने से हम बहुत खुश रह सकते हैं और उसे पाने के लिए जीवन भर भटकते हैं, लेकिन आंतरिक रूप से उस आनंद की अनुभूति कर पाने में असमर्थ होते हैं। बस उदासी मिलती है, दुत्कार-ताने मिलते हैं, अपनों से अपनापन नहीं मिलता, उपेक्षित होते हैं। जितना हम डूबते हैं रिश्ते-नातों की दुनिया में उतने ही दुखी होते हैं, पर चाहकर भी निकल नहीं पाते। जब तक भौतिक चीजों की चाहत रखेंगे, बाह्य आडंबर से जुड़े रहेंगे, मोह-माया से निकलने का प्रयास नहीं करेंगे, तब तक मानसिक शांति को प्राप्त नहीं कर पाएंगे। क्योंकि एक समय तक ही लोग परवाह करते हैं, समझते हैं, ध्यान देते हैं, फिर अपनी ज़िन्दगी में व्यस्त हो जाते हैं। चाहे कितने भी करीबी प्रिय व्यक्ति हों, एक न एक दिन बिछड़ते ही हैं। कोई किसी के उम्र भर साथ नहीं रह सकता, यह विधि का विधान है, जिसे मानने पर और उसी के अनुकूल आचरण करने पर हम जीवन का सही आनंद ले सकते हैं। जिसके पास करोड़ों की दौलत है, उसे भी एक दिन इसी माटी में मिलना है, सब यहीं छोड़कर जाना है। जीते जी घमंड होता है अपनी अमीरी, रिश्ते-नाते, प्रतिष्ठा, रुतबे का। हम संग्रहित करते हैं अपने भविष्य और अपनों के लिए, पर केवल बटोरने के चक्कर में ही एक प्रकार का नशा हो जाता है अधिक कमाई करने का, एक लत लग जाती है ज्यादा कमाने की। प्रतिस्पर्धा के युग में हम भी शामिल हो जाते हैं, सिर्फ पाने के लिए ही मानवीय संवेदनाओं को शून्य कर लेते हैं। कभी रुक कर देखने की फुर्सत ही नहीं होती, इस बाहरी दुनिया की चकाचौंध में खोकर नैतिकता को भूल जाते हैं। सहज-सरल नहीं रह पाते, हँसना-मुस्कुराना छोड़ देते हैं, इंसानियत की राह नहीं अपनाते। मन में नकारात्मक सोच पालकर जिंदगी का सफर तय करते हैं। अपने मन, वचन और कर्म से दुर्व्यवहार करते हैं अपने संपर्क में आए लोगों से, दूसरों का हिस्सा छीन लेते हैं, किसी पर दया नहीं करते, अपनी वाणी की मिठास से किसी के हृदय को स्पर्श नहीं कर पाते, भेदभाव करते हैं, खुद को बड़ा और दूसरों को छोटा समझते हैं, गलतियों पर झुकना नहीं चाहते बल्कि उसे दोहराते हैं, प्यार नहीं बाँटते, नफरत में ही गुजार देते हैं हर पल, किसी की मदद नहीं करते, बस अपने स्वार्थ के लिए जीते हैं। एक वक्त के बाद शारीरिक-मानसिक रूप से जब कमजोर होते हैं, खुद को तन्हा पाते हैं, तब किसी के साथ प्रेम और सहयोग की उम्मीद करते हैं, जो हम जिंदगी भर किसी को अपने स्वभाव से दिए ही नहीं। एक समय के बाद जब भोग-विलास पूर्ण जीवन से मन भर जाता है, तब याद आते हैं ईश्वर, उनकी भक्ति और मोक्ष के मार्ग, लेकिन यह जीवन का अंतिम दौर होता है, फिर पछतावे के अलावा कुछ नहीं होता। इसलिए तो कहते हैं यह मानव चोला यूँ ही नहीं मिला, इसे इस प्रकार से जीने की कोशिश करें कि हृदय के भीतर से आनंद को महसूस करें। कमाने की चाह में अक्सर जिंदगी व्यस्त हो जाती है और जो हम अधिक मात्रा में जमा पूँजी रखते हैं, उसका उपयोग करने का भी समय नहीं होता। कई मोड़ों से गुजरना होता है, असफल होते हैं, भागदौड़ करते हैं, लेकिन जिनके लिए करते हैं उनसे न ही सम्मान मिलता है, न आत्मीय भाव। तब महसूस होता है कि मानव जीवन लेकर हम जीवन भर रिश्ते-नाते के दलदल में फँसे रहे, धर्म के कार्य नहीं किए, परोपकार नहीं किए, बस लोभ करते रहे और जो अस्थायी सुख है, एक दिन छूट जाना है, नष्ट हो जाना है, उस पर ही अधिक ध्यान केंद्रित किया, पर उस कर्म पर ध्यान नहीं दिया जिसे करने से आत्मा शुद्ध होती है और परम आनंद की अनुभूति होती है, जो कभी कम नहीं होता, बस मस्त रहे अपने आप में। दीन-हीन, दुखी-गरीब, असहाय, बेबस, कमजोर लोगों को गले से नहीं लगाया, किसी के बहते आँसू नहीं पोंछे, काम-वासना में ही लिप्त रहे, बहन-बेटियों का सम्मान नहीं किया, कभी दान नहीं दिया, अब जब अंत समय आया तो पछतावा हो रहा है, जब अपने ही दुत्कार रहे हैं, मानसिक सुख नहीं, शारीरिक रूप से कमजोर हो गए, कोई सेवा करने वाला नहीं है। कैसे देंगे आप पर ध्यान इस बुढ़ापे में, जब अपनी संतान को हम सिर्फ सुख-सुविधा ही दिए हैं, कोई तकलीफ नहीं होने दी, उनके कहने से पहले ही सभी ख्वाहिशें पूर्ण कर दीं, जरूरत से ज्यादा हर चीज की पूर्ति की, एक की जिद पर ढेरों खिलौने लाकर दिए, कभी अभाव को महसूस नहीं करने दिया, मर्यादा और संयमित जीवन, सेवाभावी जीवन के लिए उन्हें माहौल नहीं दिया, इस पर ज्यादा प्रयास नहीं किया। काम-वासना में लिप्त रहे, दूसरों की बहन-बेटी पर बुरी नजर रखी, अब पछता रहे हैं उससे क्या होगा? मनुष्य धर्म निभाने के लिए कई अवसर आए, पर हम उसे देख नहीं पाए। अपनों के लिए सुविधाएं जुटाना गलत नहीं, लेकिन इसके साथ ही उनमें मानवीय गुणों को स्थापित करना, एक योग्य नागरिक बनाना, इंसानियत सिखाना सबसे ज्यादा जरूरी है। अपनी संतान को औरों के हित में जीने की सीख, मन में करुणा-स्नेह के भाव रखना, मनुष्य से प्रेम करना, लोगों की तकलीफ को समझना और सही रास्ते पर चलने के लिए भी मेहनत करना जरूरी है ताकि वे भटके नहीं, अपनी मंजिल तक पहुँच सकें। सब कुछ होते हुए भी आज जीवन में अशांति व्याप्त है, एक पल चैन नहीं, आखिर क्यों? जब इस प्रश्न का उत्तर हम ढूँढ़ते हैं तो पता चलता है हम मौज-मस्ती की तलाश करते हैं, आनंद की नहीं। ईश्वर की सेवा, उनकी भक्ति, सत्संग-प्रवचन, भजन-कीर्तन, औरों की सेवा, एक-दूसरे को प्रेम देना, सहायता करना और शुद्ध भाव रखने में आनंद है, जहाँ किसी प्रकार का संदेह नहीं, मगन हैं अपनी धुन में थिरकते हैं, सभी के लिए हृदय में सद्भाव है, नकारात्मक सोच नहीं, बस सुकून है, ढोंग नहीं करते, वास्तविक दुनिया में रहते हैं, किसी से बैर-नफरत नहीं, एक साथ मिलकर रहते हैं, खुलकर हँसते हैं, मन में कोई संकोच नहीं, दिल की हर बात कह देते हैं, किसी की उदासी पढ़ते हैं, रिश्ते निभाते हैं, उनसे स्वार्थ नहीं निकालते, सांसारिक जीवन में रहकर भी किसी से ज्यादा उम्मीद नहीं रखते, एक-दूसरे के बुरे वक्त में काम आते हैं, यही है जीवन का असली आनंद। आनंद एक आंतरिक अनुभूति है, जिसे पाकर जीवन की सारी दुविधाएं समाप्त हो जाती हैं, जहाँ सुकून मिलता है, इस बाह्य जगत की वास्तविकता को समझ जाते हैं, किसी प्रकार से भ्रम की स्थिति उत्पन्न नहीं होती। इस संसार के रचना-क्रम को हम जान पाते हैं। जन्म-मरण एक शाश्वत सत्य है, इसे समझकर हृदय में संजोकर रखते हैं। जो आए हैं, वो एक दिन किसी न किसी बहाने से जाएंगे, यही सोचकर अति में शोक नहीं करते और एक प्रेरणा मिलती है – जीते जी ही मोहलत है कुछ श्रेष्ठ करने की। तनाव मुक्त रहकर बुराई को त्यागकर सद्गुण को अपनाने की चाहत से फिर भर जाते हैं और खुद को समर्पित कर देते हैं ईश्वर की आराधना में, सद्कर्म में और फिर कोई ख्वाहिश अधूरी नहीं रह जाती, कोई द्वंद्व नहीं होता, मन को मना लेते हैं, सही दिशा देते हैं, विचलित नहीं होते, भौतिक जीवन की उलझन से निकलने में समर्थ हो जाते हैं, संतुष्ट हो जाते हैं, फिर लेने में नहीं देने में आनंद आता है, प्रेम-अपनापन और दूसरों को जीने की वजह देते हैं, कलह-बहस और विवाद नहीं करते और कोई भी गम के तूफान-समस्याएं हमें विचलित नहीं कर पातीं। जब हम खुद की शक्ति को जान लेते हैं और इस झूठी दुनिया में रहकर भी इनके प्रति विशेष लगाव न रखकर सिर्फ सही कर्म करने का संकल्प लेकर चलते हैं, बुरी संगति से दूर हो जाते हैं, किसी की कटुतापूर्ण व्यवहार का असर नहीं होता। आज चारों तरफ का माहौल देख लीजिए, बहुत ही घुटन होती है। मन का बदलना जरूरी है, साधना और सात्विक जीवन अपनाकर, सदाचरण कर, बुरे कर्म से दूर रहकर हम जीवन में शांति व्याप्त कर सकते हैं। यह परिवर्तन की बेला है, अब कुविचार को त्याग दें, जड़ से मिटा दें हर बुराई को, अपराध पर अंकुश लगे। नशा, जुआ, चोरी-डकैती, छेड़खानी, लूट-हत्या को छोड़कर सादगी को अपनाएं, अब खुद में सुधार करें, गलत करने से डरें। अगर हम आज की पीढ़ी में सद्व्यवहार नहीं भरते तो कल का माहौल आज से भी भयानक होगा, इसलिए मिलकर हम संगठित होकर कार्य करें, एक-दूजे के लिए जिएं, सही मायने में मनुष्य होने का प्रमाण दें, यही जीवन है।







