प्रकाशमान सत्य श्रीकृष्ण की आनंदमयी अनुभूति हैं राधारानी

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डॉ.दीपक गोस्वामी

 

                (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

 

 

प्रकाशमान सत्य श्रीकृष्ण की आनंदमयी अनुभूति हैं राधारानी

 

 

 

 “सदा राधिकानाम जिह्वाग्रतः स्यात्…” यह केवल स्तुति नहीं, साधना का संकेत है। जिह्वा पर राधा हों तो वाणी में माधुर्य उतरता है, नयन में राधा हों तो दृष्टि में करुणा आती है, श्रवण में राधा हों तो सुनना भी साधना बन जाता है और हृदय में राधा हों तो मनुष्य के भीतर प्रेम का जन्म होता है।

          राधा कौन हैं? यह प्रश्न जितना सरल दिखता है, उतना ही गहरा है।

          दार्शनिक दृष्टि से श्री राधा को कृष्ण की आह्लादिनी शक्ति के रूप में समझा जाता है, वह शक्ति जिसके माध्यम से आनंद स्वयं को अनुभव करता है। कृष्ण यदि प्रकाशमान सत्य हैं तो राधा उस सत्य की आनंदमयी अनुभूति हैं। दीपक और प्रकाश को अलग-अलग दिखाया जा सकता है, पर उनके अस्तित्व को पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता। इसी भावभूमि में राधा-कृष्ण की एकात्मता का दर्शन सामने आता है।

          भक्ति की दृष्टि से वही राधा वृषभानु नंदिनी, बरसाने की लाड़िली और ब्रज की ठकुरानी हैं। वह केवल किसी कथा की पात्र नहीं, ब्रज की भाव-संस्कृति का प्राण हैं। सखियों के बीच उनकी हँसी, उनका मान, उनकी चितवन, उनका रूठना और फिर सहज हो जाना,इन सबमें भक्त प्रेम की ऐसी भाषा पढ़ता है, जिसे शब्दों में पूरी तरह बाँध पाना कठिन है।

           और रस की दृष्टि से राधा केवल प्रेम करने वाली नहीं, प्रेम की पराकाष्ठा हैं। संसार का प्रेम प्रायः पाने की इच्छा से शुरू होता है। राधा का प्रेम पाने से आगे जाकर स्वयं को अर्पित करने की ओर ले जाता है। वहाँ प्रश्न यह नहीं रहता कि मुझे क्या मिला, प्रश्न यह हो जाता है कि मैंने अपने प्रिय के लिए क्या छोड़ दिया। यही राधा-तत्व की सबसे बड़ी मधुरता है।

          यदि प्रेम केवल अधिकार होता तो मिलन ही उसकी अंतिम मंजिल होता। यदि प्रेम केवल स्वार्थ होता तो दूरी असह्य होती। पर राधा का प्रेम बताता है कि सच्चा नेह कभी-कभी निकटता से अधिक विरह में बोलता है। वहाँ प्रिय की प्रसन्नता अपने सुख से बड़ी हो जाती है।इसीलिए राधा का मान भी प्रेम का ही एक रूप माना गया है। उनका रूठना विरोध नहीं, प्रेम की गहराई का अभिनय है, उस आत्मीयता का संकेत है जहाँ औपचारिकता समाप्त हो जाती है। भक्ति-साहित्य ने इसी भाव को इतने रंगों में चित्रित किया कि राधा का मान स्वयं एक रस बन गया।

        कृष्ण के लिए संसार में अनेक उपमाएँ हैं – योगेश्वर, परमात्मा, जगद्गुरु, मुरलीधर। पर ब्रज की गलियों में वही कृष्ण राधा के श्याम बन जाते हैं। यहाँ ऐश्वर्य पीछे छूट जाता है और माधुर्य आगे आ जाता है। यही ब्रज की विशेषता है।

         ब्रज में “राधे-राधे” केवल अभिवादन नहीं। यह एक भाव-संकेत है। सामने वाला कौन है, कितना बड़ा है, कितना छोटा है? इन प्रश्नों से पहले एक ही संबोधन सबको जोड़ देता है – राधे। एक नाम, जिसमें दूरी घटती है और आत्मीयता बढ़ती है।

            राधा के सौंदर्य का वर्णन करने बैठो तो शब्द स्वयं संकोच करने लगते हैं। उपमाएँ छोटी पड़ जाती हैं। कवि चंद्रमा कहता है तो चंद्रमा भी फीका लगता है, कमल कहता है तो कमल को ही लज्जा आती है। पर वास्तव में राधा का सौंदर्य केवल मुखाकृति का सौंदर्य नहीं है। वह भाव का सौंदर्य है – करुणा का, समर्पण का, माधुर्य का और उस प्रेम का जिसमें “मैं” धीरे-धीरे मिटने लगता है। इसीलिए राधा को केवल “सुंदर” कहना उनके अर्थ को छोटा कर देना है। वह सौंदर्य की अनुभूति हैं।

         शक्ति-दर्शन में संधिनी, संवित् और आह्लादिनी का उल्लेख मिलता है। आह्लादिनी का संबंध आनंद और प्रेम से जोड़ा जाता है और गौड़ीय वैष्णव परंपरा में श्री राधा को इस शक्ति की पूर्णतम अभिव्यक्ति माना गया है। यहीं से राधा केवल कथा नहीं रहतीं, वह तत्व बन जाती हैं।

          कृष्ण को यदि आनंद का परम स्रोत माना जाए, तो राधा उस आनंद की अनुभूति हैं। समुद्र और उसकी लहर का उदाहरण इसी भाव को समझाने में सहायक है। लहर समुद्र से अलग दिखाई दे सकती है, पर उसका अस्तित्व समुद्र से ही है। राधा और कृष्ण की कथा इसलिए केवल दो व्यक्तियों की प्रेमकथा नहीं है। यह भारतीय भक्ति-दर्शन में प्रेम और परमात्मा के संबंध का अत्यंत सूक्ष्म प्रतीक बन जाती है।

           राधा का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है कि प्रेम मनुष्य को बड़ा बनाता है, यदि उसमें अधिकार से अधिक समर्पण हो, अपेक्षा से अधिक करुणा हो और पाने से अधिक देने की आकांक्षा हो।

           इसलिए हे मन! यदि जिह्वा को एक नाम देना हो – राधा। यदि नयन को एक रूप देना हो – राधा। यदि हृदय को एक भाव देना हो – राधा और यदि जीवन को एक साधना देनी हो, तो प्रेम।

             क्योंकि राधा को केवल मंदिर में खोजोगे तो मूर्ति मिलेगी, कथा में खोजोगे तो चरित्र मिलेगा, दर्शन में खोजोगे तो तत्व मिलेगा, लेकिन हृदय में खोजोगे तो प्रेम मिलेगा और शायद यही राधा का सबसे बड़ा रहस्य है – राधा प्रेम करती नहीं हैं, राधा स्वयं प्रेम हैं।

          (विभूति फीचर्स)

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