विकास के दावों के बीच गांव की पगडंडियां पूछ रहीं सवाल

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संवाददाता कन्नौज (उ. प्र.): दीप सिंह 

 

                 (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

विकास के दावों के बीच गांव की पगडंडियां पूछ रहीं सवाल।

 

ग्राम पंचायत रौरी के मजरों में बुनियादी सुविधाओं की तस्वीर पर ग्रामीणों की निगाह, सड़क से लेकर सरकारी योजनाओं तक उठ रहे सवाल।

 

 

 

        कन्नौज:  विकास खण्ड छिबरामऊ क्षेत्र के ग्राम पंचायत रौरी के मजरों में विकास की तस्वीर आखिर कैसी है? सरकारी दावों और गांव की जमीनी हकीकत के बीच कितना अंतर है, यह सवाल अब ग्रामीणों के बीच चर्चा का विषय बनता जा रहा है। गांव की सड़क, नाली, शिक्षा और सरकारी योजनाओं का लाभ जैसे मुद्दे सीधे आम लोगों के जीवन से जुड़े हैं, लेकिन इन सुविधाओं को लेकर ग्रामीणों की अपेक्षाएं अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं।

 

           ग्रामीणों का सवाल सीधा है कि आखिर उनके गांव की सड़क कब बनेगी? बरसात और खराब रास्तों के बीच बच्चों को स्कूल पहुंचने में होने वाली परेशानी कब दूर होगी? जरूरतमंद परिवार सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए दफ्तरों के चक्कर लगाने के बजाय अपने गांव में ही सुविधाएं कब पाएंगे?

 

              विकास केवल कागजों पर योजनाओं की संख्या बढ़ने का नाम नहीं है। विकास तब माना जाएगा, जब उसका असर गांव के अंतिम व्यक्ति के जीवन में दिखाई दे। जिस परिवार के बच्चे को स्कूल जाने के लिए खराब रास्ते से गुजरना पड़े, जिस गरीब को योजना का लाभ लेने के लिए बार-बार कार्यालय जाना पड़े, उसके लिए विकास की परिभाषा घोषणाओं से नहीं, सुविधाओं से तय होती है।

 

                    गांव का आम मतदाता केवल चुनाव के समय महत्वपूर्ण नहीं होता। वह पूरे पांच साल अपने आसपास हो रहे बदलाव को देखता है। वह सड़क की स्थिति देखता है, सरकारी योजनाओं का लाभ किसे मिला यह देखता है और यह भी देखता है कि जनप्रतिनिधियों तथा जिम्मेदार अधिकारियों तक उसकी आवाज कितनी पहुंच रही है।

 

                     लोकतंत्र में सवाल पूछना जनता का अधिकार है। किसी भी जनप्रतिनिधि या सरकार के लिए यह सवाल असहमति नहीं, बल्कि जवाबदेही का हिस्सा है। जनता उम्मीद करती है कि उसके गांव में सड़क बनेगी, बच्चों को बेहतर माहौल मिलेगा और गरीब परिवारों को योजनाओं का लाभ आसानी से मिलेगा। यही उम्मीद लोकतंत्र को मजबूत करती है।

 

         रौरी पंचायत के मजरों की स्थिति भी इसी उम्मीद और सवाल के बीच खड़ी दिखाई देती है। ग्रामीणों को बड़े-बड़े वादों से अधिक अपने आसपास ठोस बदलाव की जरूरत है। सड़क बने, सुविधाएं बढ़ें और सरकारी योजनाओं का लाभ पात्र लोगों तक पहुंचे—यही वह विकास है जिसे गांव का आम आदमी अपनी आंखों से देखना चाहता है।

 

           आखिरकार चुनाव लोकतंत्र का केवल एक दिन है, लेकिन जनता की जिंदगी पूरे पांच साल चलती है। इसलिए विकास के दावों की असली कसौटी चुनावी मंच नहीं, बल्कि गांव की सड़क, स्कूल तक पहुंचता बच्चा और सरकारी योजना का लाभ पाने वाला गरीब परिवार है। सवाल यही है कि ग्राम पंचायत रौरी के मजरों में यह बदलाव कब दिखाई देगा?

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