संजय सोंधी
(संयुक्त निदेशक)
शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
अंतरिक्ष में हथियारों की बढ़ती तैनाती और उनका वैश्विक असर।
अमेरिका द्वारा अंतरिक्ष में आधिकारिक रूप से काउंटर-स्पेस वेपन की तैनाती की घोषणा और रूस तथा चीन के पूर्व गुप्त अभियानों (जैसे रूसी कॉस्मॉस ‘स्टॉकर’ उपग्रह और चीन के अज्ञात स्पेस-ड्रोन) ने वैश्विक सुरक्षा संतुलन को एक नए दौर में ला खड़ा किया है। यह मुख्य रूप से डायरेक्टेड-एनर्जी वेपन्स (लेजर और हाई-पावर माइक्रोवेव), काइनेटिक-किल इंटरसेप्टर और जैमिंग प्रणालियों पर आधारित हथियार हैं, जिनका प्राथमिक उद्देश्य किसी मिसाइल को नष्ट करने के बजाय प्रतिद्वंद्वी देशों के सैन्य व संचार उपग्रहों के सिग्नल को ठप्प करना, उनके सेंसर्स को अंधा करना या सीधे टकराकर उन्हें अक्षम बनाना है। अंतरिक्ष हथियार तीन श्रेणियों में काम करते हैं: अर्थ-टू-स्पेस (जमीन से उपग्रहों को निशाना बनाना), स्पेस-टू-स्पेस (कक्षा में मौजूद दूसरे उपग्रहों को तबाह करना), और स्पेस-टू-अर्थ (अंतरिक्ष से पृथ्वी पर हमला करना); इनका मुख्य उद्देश्य युद्ध की स्थिति में दुश्मन के नेविगेशन, टोही प्रणाली और कमान नेटवर्क को पंगु बनाकर रणनीतिक बढ़त हासिल करना है। यदि इनका उपयोग होता है तो यह अत्यधिक घातक साबित हो सकते हैं, क्योंकि इनसे उत्पन्न लाखों अंतरिक्ष मलबे के टुकड़े (केसलर सिंड्रोम) पूरी पृथ्वी की उपग्रह प्रणाली को हमेशा के लिए नष्ट कर सकते हैं। यद्यपि अधिकांश काउंटर-स्पेस क्षमताएं लो अर्थ ऑर्बिट (LEO, 160 से 2,000 किमी) में काम करती हैं, लेकिन 35,786 किमी ऊंचे जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट (GEO) में तैनात अति-महत्वपूर्ण मिसाइल-वार्निंग और संचार उपग्रहों को बेअसर करने के लिए विशेष रूप से सह-कक्षीय (co-orbital) ‘किलर सैटेलाइट्स’ और दूरगामी इलेक्ट्रॉनिक जैमर्स भी तैनात किए जाते हैं। 1967 की आउटर स्पेस ट्रीटी (OST) अंतरिक्ष में परमाणु हथियार या सामूहिक विनाश के हथियार (WMD) रखने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाती है, परंतु इसमें पारंपरिक हथियारों, लेजर या काउंटर-स्पेस तकनीकों की तैनाती पर कोई स्पष्ट रोक नहीं है, जिससे देश इस कानूनी खामी का फायदा उठाकर अंतरिक्ष का सैन्यीकरण कर रहे हैं।







