लिफ्ट की घंटी

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राजेंद्र रंजन गायकवाड

(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक) 

बिलासपुर, छत्तीसगढ़

 

                    (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

 

 

 

           लिफ्ट की घंटी

 

रायपुर की एक ऊँची इमारत की लिफ़्ट में भीड़ हमेशा रहती थी। सुबह नौ बजे ऑफिस जाने का समय, लोग फोन में डूबे, इयरफोन लगाए, एक-दूसरे को देखे बिना खड़े रहते ,कुछ लोग तो इतनी जल्दी में रहते कि पहले से खड़े आदमी को धता बता कर लिफ़्ट में घुस जाते। 

 

        अनिल, तीस साल का सॉफ्टवेयर इंजीनियर, रोज उसी लिफ्ट से नीचे जाता, उसकी आदत थी दरवाजा बंद होते ही तुरंत फोन निकाल लेना। एक दिन लिफ्ट में एक बुजुर्ग सज्जन भी चढ़े, उनके हाथ में भारी बैग था। अनिल ने देखा पर फोन में मैसेज टाइप करते हुए अनदेखा कर दिया, लिफ्ट रुकी, बुजुर्ग बड़ी मुश्किल से उतरे, कोई मदद करने नहीं आया।

 

         दोपहर में ऑफिस में अनिल के बॉस ने मीटिंग में उसे सबके सामने डाँटा “तुम्हारी लापरवाही से प्रोजेक्ट फँस गया।” अनिल का चेहरा लाल हो गया, मानो किसी ने उसके चेहरे पर थप्पड़ मार दिया हो। शाम को घर लौटते समय वही बुजुर्ग फिर लिफ़्ट में मिले। अनिल ने इस बार बैग थाम लिया, बुजुर्ग ने मुस्कुराते हुए कहा, “बेटा, धन्यवाद,, शहर में लोग अक्सर एक-दूसरे को नहीं देखते, आज मैं बहुत खुश हूंँ कि सीनियर सिटीजन की कोई तो मदद करने आया।

 

              रात को अनिल सोचता रहा, सुबह बॉस का अपमान कितना चुभा था। उसी चुभन ने उसे याद दिलाया कि हर इंसान के अंदर एक नाज़ुक जगह होती है मान और अपमान का बोध जो चेतना हमें खुद का दर्द महसूस कराती है, वही हमें दूसरों का दर्द भी दिखा सकती है, इसलिए हमें यथासंभव, यथाशक्ति लोगों की मदद करना चाहिए।

 

     अगले दिन अनिल ने छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देना शुरू किया और अपनी अकड़ू / अहंकारी आदत बदल ली, लिफ़्ट में किसी का बैग भारी दिखे तो थाम लेता और आयु के मान से विश / सम्मान करता। साथ ही ऑफिस में जूनियर को गलती पर सबके सामने नहीं डांटता, अलग बुलाकर, प्यार से समझाने लगा। अपार्टमेंट के पार्किंग में झगड़ा होने पर दोनों पक्षों को शांत बैठकर सुनता और समझा बुझाकर आपसी मेल मिलाप कराता,, धीरे-धीरे लोगों का व्यवहार भी बदला, लिफ़्ट में अब लोग एक-दूसरे को रास्ता देते, मुस्कुराते और एक दूसरों को यथेष्ठ आदर देते।

 

     एक शाम वही बुज़ुर्ग फिर अनिल को मिले उन्होंने कहा, बेटा – “शहर की भाग-दौड़ में हम अक्सर भूल जाते हैं कि हर इंसान के अंदर वही चेतना है जो मान-अपमान का फर्क समझती है। जब हम खुद का अपमान महसूस करते हैं, तब दूसरों का सम्मान करना सीखते हैं। यही छोटी-छोटी बातें शहर को रहने लायक बनाती हैं, लेकिन आजकल सोचने का भी किसी पास समय नहीं। 

 

           अनिल ने सचमुच महसूस किया नगरीय जीवन की भागदौड़ में सामाजिक समरसता बड़े भाषणों से नहीं, बल्कि उस साधारण चेतना से बनती है जो हमें याद दिलाती है कि मेरे मान की तरह दूसरे का मान/ सम्मान भी उतना ही कीमती है। दो दिन बाद अनिल जब लिफ़्ट से निकल कर बाहर घर की और आ रहा था, तब बॉस का संदेश/ नोटिफिकेशन अनिल के सेलफोन पर बजा, अनिल ने तत्काल संदेश देखा कि बॉस ने लिखा – आपका प्रोजेक्ट आंशिक सुधार से ठीक करके मैंने एप्रूव्ड कर दिया हूं। 

 

        दूसरे दिन ऑफिस जाते समय फिर लिफ़्ट की घंटी बजी, दरवाज़ा खुला, अनिल ने लिफ्ट में सभी परिचितों को मुस्कुराते हुए रास्ता दिया सभी लोग मंद -मंद मुस्कान ओढ़े अपने रास्ते निकल गए। लेकिन अनिल के मैनर्स के कायल हो गए।

 

    दरअसल हम लोग हर पल किसी न किसी बात से हैरान परेशान होने पर अपना मानवीय गुण भूल जाते हैं। लेकिन अगर यही भूल दूसरा व्यक्ति करें तो नैतिकता और सिविक सेंस का पाठ पढ़ाने लगते हैं।

 

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