प्रभारी सम्पादक जौनपुर: पंकज सीबी मिश्रा
(राजनीतिक विश्लेषक)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
जमुई मामले ने दी सुशासन को चुनौती
: पंकज सीबी मिश्रा
बिहार के जमुई की शर्मनाक वारदात ने बिहार की सियासत को गर्म कर दिया है। एक तरफ जहाँ दावा किया जा रहा कि अब देश में बेटियां सुरक्षित है वही जमुई के इस आहत कर देने वाली घटना ने उन सभी दावों की पोल खोल के रख दी है। जातिगत संरक्षण प्राप्त और क़ानून में मिले दबे कुचले होने के सर्टिफिकेट का लाभ उठा रहा एक तबका अब क़ानून हाथ में लेने से नहीं हिचक रहा। यह घटना उस पृष्ठभूमि में हुई है, जब सीएम सम्राट चौधरी ने दो हफ्ते के भीतर दो नेशनल न्यूज चैनल को दो अलग अलग इंटरव्यू में लॉ एंड ऑर्डर को लेकर बड़े बड़े दावे किए थे। मेघा प्रसाद को उन्होंने कहा था कि आप पटना से मुंगेर यात्रा करके देखिए समझ में आ जाएगा कि यहां सुशासन की सरकार है। श्वेता सिंह को उन्होंने कहा था कि रात के बारह बजे भी कोई छू तक ले तो सुबह सम्राट का इस्तीफा आ जाएगा। आप जो लोग मुझे मेरे दैनिक आर्टिकल में पढ़ते है वो जानते होंगे की कुछ मुद्दों पर मै सरकार के उन दावों का सदा विरोध करता हूँ जहाँ वह कहते है कि कुछ लोगो को सत्ता का संरक्षण आवश्यक है जबकि वो इसका दुरूपयोग कर रहें और इसके ताजा उदाहरण है दतिया से असपा प्रत्याशी दामोदर यादव जिन्होंने सोशल मिडिया का माहौल भड़काऊ बना रखा है और उनपर कोई कार्यवाही नहीं हो रही जबकि ऐसी घटनाओं में यदि आरोपित किसी विशेष जाति का निकला तो उसे यह यकीन है कि दामोदर जैसे नेता अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने सड़को पर उतरेंगे और उनके समर्थन में धरना देकर उन्हें वंचित शोषित कह कर बचा भी लेंगे। मैं तो जबसे मीडिया में हूं तब से ऐसी घटनाओं को देखता रहा हूं, एक्शन भी होते रहे हैं, लेकिन घटनाएं नहीं थमीं, बिहार हो या यूपी, एमपी हो या कर्नाटक, लोकेशन बदलते रहे, वारदात दोहराई जाती रही है ।
बिहार का जमुई मुंगेर से अस्सी किलोमीटर ही है और वहां जो वारदात हुई है वो शाम सात बजे की है। इससे साफ हो जाता है कि सुशासन के दावे और ज़मीनी हकीकत के बीच कितना बड़ा फर्क होता है। इस वारदात में शामिल तमाम अपराधी कपड़ों और बोली से स्थानीय ही लगते हैं, जिनकी गिरफ्तारी हुई है उनसे पूछताछ के आधार पर बाकी भी पकड़े ही जाएंगे ये भी तय है लेकिन सवाल ये है कि क्या इससे सोच बदल जाएगी ? बीस साल पहले साल 31 दिसम्बर 2006 की घटना तो देश के सबसे आधुनिक शहर मुंबई की थी, जहां नए साल का जश्न मनाने गेटवे ऑफ इंडिया गई एक युवती को बिल्कुल जमुई की तरह ही भीड़ ने लगभग रेप ही कर दिया था। इंसान की शक्ल में छिपे भेड़ियों की मानसिकता इतनी विकृत है कि जब भी वो किसी ऐसी लड़की या महिला को देखता है कि वो अपने पिता, भाई या पति के साथ ना होकर दोस्त, सहपाठी के साथ है या अकेली है तो उसे आसान शिकार मान कर दबोच लेता है। जब सत्ता, पुलिस का रसूख घटता है तो फिर अपराध का ग्राफ बढ़ता है। ऐसे गुंडों को लगता है कि लड़की कोई शिकायत दर्ज कराएगी नहीं और जिसके साथ है उसको मारपीट के भगा देंगे तो कुकृत्य की मंशा पूरी हो जाएगी। जमुई घटना के तमाम वीडियो कल से अब तक के देखने में आ रहें जिसमें लड़की का विडिओ वायरल कर दिया गया जो गलत है। इस पर कार्यवाही होनी ही चाहिए और जो अपराधी सामने आया है, उसमें दो लोग ये कह रहे हैं कि जाने दो इन्हें, दो तीन लोग निरपेक्ष भाव से सरेराह, सरेआम की जा रही गुंडागर्दी का वीडियो बना रहे हैं और एक दो उस एक सबसे बड़े गुंडे का साथ देते दिख रहे हैं जो लड़की को बिल्कुल राक्षस की तरह प्राइवेट पार्ट्स में हाथ डाल कर झपट्टे के साथ पीछे से उठा कर अंधेरे की ओर लेकर भाग रहा था। उस बेबस, असहाय दिख रही लड़की के साथ सिर्फ उसका दोस्त ही एकमात्र रक्षक था जिसने हिम्मत नहीं हारी और इस वारदात को मौजूदा घटना से भी ज्यादा खौफनाक, अमानवीय और कलंकित होने से बचा लिया। लेकिन सवाल यही कि आखिर कब तक ? क्या पहली सांस से लेकर आखिरी साँस तक हर वक्त कोई बचाने वाले का साथ होना संभव है ? ऐसे जाति संरक्षित, पाशविक अपराधियों, यौन विकृत मानसिक अपराधियों की सज़ा सीधे एनकाउंटर ही है क्योंकि जब निर्भया की घटना के बाद भी देश भर से सैंकड़ों निर्भया की घटना सामने आ चुकी हैं तो साफ है कि सोच तो बदलने वाली है नहीं। ये अनपढ़, कुशिक्षित तबके की सोच तक सीमित भी नहीं है क्योंकि कभी – कभी आरोपी तो बड़े बड़े तथाकथित सुशिक्षित और सुसभ्य बताए जाते हैं पर इस घटना में आरोपी अनपढ़ और खास जाति से जुड़े बेहद मनबढ़ लगते है ।






