सेवानिवृत्ति के उपरांत (लघुकथा)

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डा. सुधाकर आशावादी

 

               (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)                                               (w)6395080071

 

 

 

                 सेवानिवृत्ति के उपरांत

                      (लघुकथा)

 

 

 

सेवानिवृत्त होने के उपरांत महाविद्यालय पहुँचा, तो कुछ आत्मीय साथियों ने गर्म जोशी से स्वागत किया। कुछ ऐसे भी थे, जिन्होंने उपेक्षित नजरों से देखकर मुझसे दूरी बना ली। 

        शिक्षा संकाय अध्यक्ष प्रोफेसर सिद्धार्थ के विभाग में पहुँचा, तो वे बैठते ही बोले – “परिमल बाबू … और बताओ, सेवानिवृत्ति के उपरांत कैसा महसूस कर रहे हो ?”

                   मैंने कहा – “ सिद्धार्थ जी …. आप भी इसी वर्ष सेवानिवृत्त होने वाले हैं, तदुपरांत कुछ अनुभव आपको भी होंगे, तब चर्चा कर लेंगे।”

           वह खिलखिला कर हंसे, फिर बोले – “लगता है कि कुछ तल्ख अनुभव हुए हैं ।”

         मैंने कहा – “सिद्धार्थ जी , आप अभी हंस रहे हैं, किंतु सेवानिवृत्त होने से पूर्व से ही आपको कुछ विशिष्ट अनुभव होने लगेंगे। एक अध्यापक वाली नजर से औरों के व्यवहार में आए परिवर्तन पर सिर्फ पैनी नजर रखने से सत्य पहले से ही सामने आने लगेगा।”

          “मतलब … क्या कहना चाहते हो ?” प्रोफेसर सिद्धार्थ ने कहा ।

               “मतलब यही है कि सेवानिवृत्ति की अंतिम तिथि निकट आने से पहले ही आपके अधीनस्थ आपके आदेशों की अवहेलना करना प्रारम्भ कर देंगे। सेवानिवृत्ति की तिथि से अधिवर्षता पूर्ण होने तक आपका अधीनस्थ आपके स्थान पर बैठेगा और आप उसके सम्मुख अधीनस्थ होकर बैठेगें, तब आपको कैसा प्रतीत होगा ? यही नहीं, जो कर्मचारी आपको आता हुआ देखकर आपको सम्मान देकर प्रणाम करते हैं,वही आपकी उपेक्षा करने लगेंगे। सेवानिवृत्ति के उपरांत और अधिक दुर्गति होगी, जब विद्यालय के प्रशासनिक अधिकारी से लेकर उनके कार्यालय के कर्मचारी भी आपकी उपेक्षा करने लगेंगे।” मैंने कहा।

            “क्या कह रहे हो, क्या ऐसा वास्तव में होता है, मुझे यक़ीन नही होता, यह तो व्यवहार पर निर्भर है , यदि आपने किसी के साथ अच्छा व्यवहार किया होगा, तो बदले में अच्छा व्यवहार ही मिलेगा।” प्रोफेसर सिद्धार्थ ने मेरे कथन पर प्रतिवाद किया।

             अंततः प्रोफेसर सिद्धार्थ सेवानिवृत्त हो गए। लगभग छह माह बाद एक दिवस मुझे बाजार में मिले। हाथ में थैला लिए तरकारी ख़रीद रहे थे । 

              मुझे देखते ही बोले – “परिमल जी … आप सत्य कह रहे थे सेवानिवृत्ति के उपरांत लोगों का व्यवहार कितना बदल जाता है, इसका सच तो सेवानिवृत्ति के बाद ही समझ में आता है। सेवानिवृत्ति के उपरांत अपने ही साथियों के व्यवहार को देखकर लगता है कि जैसे सेवानिवृत्त कर्मियों की उपेक्षा करने वाले सेवारत अधिकारी व कर्मचारी कभी सेवानिवृत्त होंगे ही नहीं।

           (विनायक फीचर्स)

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