पुरुष नहीं, समय होत बलवान… बदल गया शिवराज सिंह चौहान का वक्त।

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पवन वर्मा

 

 

                  (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)                                               (w 6395080071)

 

         पुरुष नहीं, समय होत बलवान…

           बदल गया शिवराज सिंह चौहान का वक्त।

 

 

एक सुप्रसिद्ध कहावत है पुरुष बलि नहीं होत है समय होत बलवान। भीलन लूटी गोपिका वे ही अर्जुन वे ही बाण ।।

                      प्रसंग उस समय का है जब महाभारत के युद्ध के बाद योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अपनी सोलह हजार पटरानियों को हस्तिनापुर पहुंचाने की जिम्मेदारी अर्जुन को सौंपी थी। जब अर्जुन उन्हें द्वारका से हस्तिनापुर ला रहे थे तो बीच सफर में ही भीलों ने उन पटरानियों (गोपियों) का अपहरण कर लिया। वही गांडीवधारी अर्जुन, जो महाभारत के युद्ध में अपने पराक्रम से बड़े-बड़े योद्धाओं को परास्त करने में सक्षम थे, वही अर्जुन समय बदलने पर असहाय हो गए थे। उनके पास वही गांडीव था, वही भुजाओं का बल था, लेकिन परिस्थितियां बदल चुकी थीं। कभी जिनके सामने कोई टिक नहीं पाता था, वे ही समय बदलने पर अपनी शक्ति का प्रभाव नहीं दिखा सके।

            मध्य प्रदेश की राजनीति में पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ इन दिनों जो हो रहा है, उसे समझने के लिए इस प्रसंग से बेहतर उदाहरण शायद ही मिले। मध्य प्रदेश में 16 साल से ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान के एक इशारे पर कभी पूरा प्रशासनिक तंत्र सक्रिय हो जाता था। अफसरों की पोस्टिंग उनके कहने पर होती थी। अफसर उनकी निकटता पाने के लिए कई प्रकार के प्रयास करते थे। भाजपा के नेताओं के बीच उनके साथ खड़े होने और उनकी कृपा पाने की होड़ रहती थी। सत्ता और संगठन, दोनों में उनकी बात का वजन था। प्रदेश की राजनीति में उनका अपना प्रभाव था, अपनी शैली थी और अपना जनाधार था।

          लेकिन समय बदला। दिसंबर 2023 में मुख्यमंत्री की कुर्सी छूटी। उसके बाद उन्हें केंद्र की राजनीति में कृषि मंत्री की जिम्मेदारी मिली। पद और प्रतिष्ठा उनकी आज भी कम नहीं हैं, लेकिन मध्य प्रदेश की सत्ता में उनका वह पुराना प्रभाव अब पहले जैसा दिखाई नहीं देता। इसका सबसे ताजा उदाहरण सीहोर जिले की बुधनी विधानसभा के कोसमी गांव में देखने को मिला, जहां आदिवासी परिवारों के मकान तोड़े जाने के बाद शिवराज सिंह चौहान को अपने ही क्षेत्र में पीड़ितों के साथ धरने पर बैठना पड़ा। जिस प्रशासनिक व्यवस्था को कभी उनके निर्देर्शों का इंतजार रहता था, उसी व्यवस्था की कार्रवाई रुकवाने के लिए उन्हें प्रदेश के मुख्य सचिव से लेकर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष तक से हस्तक्षेप करने की अपील करनी पड़ी।

           शिवराज सिंह चौहान बुधनी के ग्राम जैत के रहने वाले हैं, बुधनी वह क्षेत्र है, जिसने शिवराज सिंह चौहान को 36 साल पहले चुनाव जिताकर विधानसभा पहुंचाया। इसके बाद वे विदिशा-रायसेन- बुधनी संसदीय क्षेत्र के सांसद बने। फिर जब वे मुख्यमंत्री बने तब भी बुधनी ही चुना, बुधनी विधानसभा के लोगों ने उन्हें बार-बार चुनाव जिताकर प्रदेश की राजनीति में मजबूत बनाया। बुधनी की जनता के बीच उनका जनसंपर्क और उनकी राजनीतिक ताकत दोनों ही मजबूत है। मुख्यमंत्री रहते हुए भी यह उनका अपना क्षेत्र था, जहां उनकी बात को विशेष महत्व मिलता था। इन दिनों यही बुधनी उनकी राजनीतिक स्थिति में आए बदलाव की कहानी कह रही है।

                         सीहोर जिले के कोसमी गांव में वन विकास निगम और संबंधित अमले ने वन भूमि से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की। इस दौरान बरेला आदिवासी समुदाय के 12 परिवारों के मकान तोड़ दिए गए। उनके एक कुएं को भी मिट्टी से भर दिया गया। यह घटना शिवराज सिंह चौहान के लिए केवल प्रशासनिक कार्रवाई का मामला नहीं थी। यह घटना उनके राजनीतिक क्षेत्र में घटित हुई थी। उन्हें जब इस कार्रवाई की जानकारी मिली तो वे रविवार, 11 अक्टूबर को कोसमी गांव पहुंचे। आदिवासी परिवारों की स्थिति देखकर उन्होंने नाराजगी जताई। उन्होंने मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल से भी बात की और कार्रवाई में हस्तक्षेप करने को कहा। लेकिन जिस समय वे प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई रुकवाने का प्रयास कर रहे थे, उस समय उनकी बात का तत्काल वह परिणाम नहीं निकला, जिसकी अपेक्षा की जा रही थी। आखिरकार शिवराज सिंह चौहान को स्वयं गांव पहुंचकर प्रभावित आदिवासी परिवारों के साथ धरने पर बैठना पड़ा।

            नवंबर 2005 से लेकर दिसंबर 2018 तक और फिर मार्च 2020 से दिसंबर 2023 तक शिवराज सिंह चौहान मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। उस दौरान उन्होंने जो प्रशासनिक क्षमता दिखाई उसने यह स्पष्ट संदेश दे दिया था कि मध्य प्रदेश में उनसे ताकतवर नेता किसी भी दल में अब तक नहीं हुआ। प्रशासनिक अधिकारियों के लिए उनकी प्राथमिकताएं सर्वोपरि होती थी । किसी क्षेत्र में सड़क, बिजली, पानी, सिंचाई या किसी अन्य समस्या को लेकर उनका निर्देश आता तो संबंधित विभागों में तुरंत हलचल शुरू हो जाती थी। लेकिन मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद किसी नेता के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होती है कि उसका व्यक्तिगत प्रभाव सत्ता की संस्थागत व्यवस्था में कितना बना रहता है।

             कोसमी की घटना ने इसी अंतर को सामने ला दिया। शिवराज सिंह केंद्रीय मंत्री हैं,भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में उनकी गिनती होती है। इसके बावजूद उन्हें अपने ही क्षेत्र में हुई कार्रवाई के खिलाफ मौके पर पहुंचकर विरोध करना पड़ा। हालांकि बाद में उनकी मुलाकात मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल से हुई और मामले का पटाक्षेप हो गया। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर राजनेताओं को बता दिया कि कोई भी व्यक्ति बलवान नहीं होता बलवान तो सिर्फ और सिर्फ समय होता है।

                   (विनायक फीचर्स)

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