थप्पड़ की गूंज 

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मृत्युंजय कुमार मनोज, निराला एस्टेट, टेकजोन-4, ग्रेटर नोएडा (पश्चिम) उ.प.

                          थप्पड़ की गूंज 

             ‘राजू…राजू… जरा गेहूं पीसवा कर लेते आना। और आते समय पापा के लिए ये दवाइयां भी लेते आना’ -श्यामा जी ने अपने ग्यारह वर्ष के बेटे को प्रेस्क्रिप्शन थमाते हुए कहा। अस्सी का दशक, वर्ष 1989, बिहार की राजधानी पटना का  ‘श्यामा निवास’। मार्च महीने का एक रविवार। दोपहर तीन बजे का समय। राजू अपने घर के बाहर दोस्तों के साथ खेल रहा था।  उसके पिता, गोपाल प्रसाद, बिहार सरकार के सचिवालय में क्लर्क के पद पर कार्यरत थे। राजू तीन भाई-बहनों में सबसे छोटा है।

        आधे घंटे बाद। चटाक, चटाक…। ‘तुझे आधे घंटे पहले कुछ कहा था। गया क्यों नहीं? छुट्टी के दिन दोस्तों के साथ केवल मस्ती याद रहता है’ – श्यामा जी ने थप्पड़ लगाते हुए राजू को कहा।

‘भूल गया मां। अभी जाता हूं’ – राजू ने कहा।

उस दौर में मिडिल क्लास घर के कामकाज आमतौर पर घर के बच्चे ही किया करते थे। माता-पिता की डांट और पिटाई जिंदगी का अटूट अंग था। प्यार, गुस्सा, त्याग, सेवा-भाव रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा थी।

                राजू प्रसाद उसी परिवेश में  पलते हुए बड़े हो गए। बीतते वक्त के साथ जिंदगी अपने नए रूप में उनके सामने खड़ी थी। पच्चीस वर्ष की अवस्था में एक सरकारी बैंक में नौकरी लगी। अब वे बैंक में एक बड़े अधिकारी हैं। रागिनी उनकी पत्नी है। वह एक होममेकर हैं। यशस्वी उनका सत्रह वर्ष का इकलौता बेटा है। बड़े नाजों से, सुख- सुविधा के परिवेश में पला है। वह नए जमाने का टेक-सेवी बच्चा है।

                राजू प्रसाद जी अपने परिवार के साथ दिल्ली के द्वारका में हिमालय सोसायटी में रहते हैं। वर्ष 2023 मार्च का महीना। ‘रागिनी निवास’ में एक सामान्य रविवार का दिन।’

     बेटा, पापा की तबीयत ठीक नहीं नहीं है। जरा केमिस्ट के शाॅप से दवा ले आओ। और आते समय एक पैकेट आटा भी लेते आना’ -रागिनी जी ने यशस्वी से कहा।

      ‘मम्मी, मैं गेम खेल रहा हूं। अभी मैं बड़े क्रूसियल लेवल पर हूं।  गेम रोक नहीं सकता। आप चली जाइए’ -यशस्वी ने जवाब दिया।

        ‘जब देखो मोबाईल में गेम। कभी तो घर के काम भी  किया करो। इतना  बड़ा हो गया, पता नहीं कब जिम्मेवारियों का अहसास होगा’ -रागिनी जी ने यशस्वी से दुखी मन से कहा।

       ‘मम्मी, आॉनलाईन मंगवा लीजिए। आज के जमाने में जब टेक्नोलॉजी ने हमें इतनी सुविधा दी है तो खुद जाकर दवा लाना समय की बर्बादी है। मतलब दवा आने से है। मैं लाऊं या किसी कंपनी का डिलेवरी ब्यॉय दे जाए, क्या फर्क पड़ता है?’ -यशस्वी ने जवाब दिया।

        ‘फर्क पड़ता है बेटा, टेक्नोलॉजी ने जिंदगी को जरूर आसान बना दिया है। लेकिन घर के छोटे-मोटे काम केवल काम नहीं है, समय की बर्बादी नहीं हैं, बल्कि ये परिवार को एक-दूसरे से भावनात्मक रूप से जोड़ने की कड़ी भी हैं’ – रागिनी जी ने यशस्वी को समझाते हुए कहा।

बहसबाजी सुनकर राजू जी आ गए।

         ‘रहने दो रागिनी। इसे क्या समझाना। गलती हमारी भी है। जैसे -जैसे हम पैसे से समृद्ध होते गए, घर के काम से अपने बच्चों को दूर करते चले गए। केवल उनकी भौतिक सुख-सुविधाओं और टेक्नोलॉजिकल डेपलवमेंट पर विशेष ध्यान देने लगे। नतीजा अब उसे काम करने में केवल समय की बर्बादी और बचत का ही ऐंगल दिख रहा है। उसे पता नहीं कि घर के ये छोटे-मोटे काम सामाजिक एवं पारिवारिक उत्तरदायित्वों के प्रति जागरूक करने के माध्यम हैं। इन कार्यों में पारिवारिक रिश्तों के प्रति भावनात्मक पहलू भी है, जो छिपा हुआ है। टेक्नोलॉजी पर हमारी बढ़ती निर्भरता के कारण आज मानवीय रिश्तों के भावनात्मक पहलू धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं। अगर इसकी जगह मैं होता तो इस जवाब के लिए मेरी मां कब का थप्पड़ जड़ चुकी होती’ -राजू जी ने कहा।

            राजू जी को ऐसे मौके पर उनके बचपन में मां की थप्पड़ की गूंज अब भी सुनाई पड़ रही थी।

 

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