मानवीय संवेदनाओं के प्रखर शिल्पी:
युगपुरुष कविवर ‘सूर्य’
(भारतीय संस्कृति के संरक्षक, सामाजिक समरसता के प्रतीक, आध्यात्मिक चिंतक, महनीय साहित्यकार, दार्शनिक एवं मानवतावादी समाज-सुधारक)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
जागो रे जागो!
(कविता)
खो गई संवेदनाएँ,
हर तरफ बस क्रूरता है।
चीखती इंसानियत अब,
मौन बैठी मनुजता है।
जब मनुष्य के भीतर की
करुणा और संवेदना मर जाती है,
तब समाज इंसानों का नहीं…
बल्कि हिंसक प्रवृत्तियों वाले’
भेड़ियों’ का जंगल बन जाता है।
जागो रे जागो,
और इस मरुस्थल में
सद्भावना का बीज बो लें।
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