राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, देहरादून)
ख्वाब, रेत के घरोंदे हैं, बनकर मिट जाते हैं ,
आंखों में आते ही, हाथों से बिखर जाते हैं।
दोस्त भी ख्वाब से, निगाहों में बस जाते हैं,
मौसम क्या बदला, मिलकर बिछड़ जाते हैं।
चाहत के शीश महल, रेत-गारे से ढलते हैं।
बारिश की चंद बूंदों से, ढहकर बह जाते हैं।
कितनी बार जुड़ा और कितनी बार टूटा है,
उमीदों का कारवां, लेकर हम चले आते हैं।
रंजन ! ये जिन्दगी भी, ख्वाबों जैसी रेत है,
मुट्ठी भरी नहीं कि, कण कण सरक जाते हैं।







