कवयित्री/लेखिका
सुश्री सरोज कंसारी
नवापारा राजिम, रायपुर(छ.ग.)
आलेख
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समाज के पिछड़े वर्ग में प्रेम एक जरूरत ।
समाज आधार हैं सर्वांगीण विकास का,
रूढ़िवादी विचारों के पूर्ण त्याग का।
मिलकर गढ़े समाज नए एहसास का,
मिटा दें हर लकीरें आपसी भेदभाव का।।
यूँ तो रोटी- कपड़ा और मकान हैं जिंदगी-जो मनुष्य के जीवन के लिए आवश्यक हैं। पेट भरने के लिए भोजन, तन ढकनें के लिए कपड़ा और रहने के लिए मकान के अभाव में हम सिर्फ इनमें ही सिमट कर रह जायेंगे। मूलभूत जरूरतों की पूर्ति परम आवश्यक कर्तव्य हैं, जो सभी को मिलना ही चाहिए, ये तो हुआ व्यक्तिगत जिम्मेदारी अपने लिए जिसे करना ही हैं अपने लिए और परिवार के लिए।इसके बाद हमारी सोच विशाल होना चाहिए उस सागर की तरह जो अनेक नदियों को अपनी बाहों में निस्वार्थ भर लेती हैं तब हमें नही पता चलता की- सागर में नदी, नाले- झरने, या तालाब ये सब कहां-कहां से आकर मिले कोई नहीं जानते ? सब एक होकर अविरल बहती हैं अपनी मौजो में और आकर्षित करती हैं -इस जहान को।
हम जिस समाज में रहते हैं, वहां अच्छे- बुरे अमीर- गरीब कई तरह के लोग रहते हैं। किसी की स्थिति दयनीय होती हैं, तो कोई आलीशान महलों में रहते हैं, पर कहलाते हैं सामाजिक जन।समाज में रहते हुए जिम्मेदारी का निर्वहन समय- समय पर करना पड़ता हैं ।समाज विहीन मनुष्य का जीवन पशु तुल्य होता हैं।समाज से ही हमें अधिकार-कर्तव्य, संस्कार -साहस और विभिन्न जीवनोपयोगी जानकारी मिलती हैं जो हमारे सुख-दुख के सहभागी होते हैं, जिनकी कुछ मर्यादाएं होती हैं, नियम-कानून होते हैं जो बहुत ही जरूरी हैं।
समाज की कल्पनाएं बहुत ही व्यवस्थित हैं, जिसमें अलग-अलग विचार, रंग- रूप, वेश-भूषा के लोग रहते हैं, जिनकी अलग दिनचर्या हैं पर विभिन्न तीज-त्यौहार सभी मिलकर मनाते हैं, जहाँ ऊंच-नीच का कोई भेद नहीं होता जिनमें बंधुत्व के भाव होते हैं।
हर समाज के नियम अलग होते हैं, कुछ कठोर तो कुछ लचीले पर उद्देश्य सबका एक ही होता हैं समाज के लोगो का सतत विकास ये जरूरी भी हैं।
कुछ दिन पहले अखबार में पढ़ने को मिला कि- अमुख समाज के लोग रूढ़िवादी कुछ विचारों को त्यागकर नई सोच से आगे बढ़ने के लिए अब समाज के प्रत्येक व्यक्ति के स्तर को ध्यान में रखकर कार्य करेंगे, जिसमें ऐसे परंपराओं को हटाया जाए जिससे लोगों। को मानसिक और आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ता हैं, जैसे- मरनी घर में दशगात्र, तेरहवीं भोज में अनिवार्य नहीं होकर स्वेच्छिक होना, या कुछ गरीबों को भोजन करा देना, समाज के द्वारा दुखी परिवार की आर्थिक सहायता, कफन के कपडे के बदले कुछ राशी देना, समाज के निर्धन परिवार के मेधावी बच्चों की शिक्षा का खर्च उठाना सामाजिक कन्याओं का सामूहिक विवाह, युवावर्ग की ऊर्जा का सदुपयोग समाज के हित के लिए करना। समाज के पीड़ित-दुखी, असहाय-कमजोर, गंभीर बीमार व्यक्ति की सहायता आदि। अगर सभी समाज के लोगों में औरो की पीड़ा को समझने की समझ, सूझबूझ और आपसी भाई-चारे के भाव सच्चे रूप में हो तो निश्चित ही ऎसे समाज अन्य समाज के लोगों के लिए प्रेरक होंगे।
समय और परस्थिति के अनुसार बदलाव अति आवश्यक हैं तभी समाज का चहुँमुखी विकास संभव हैं। कुछ दकियानूसी रीति-रिवाज जो बरसो से चले आ रहे हैं, उस पर चिंतन- मनन आवश्यक हैं देखेें- क्या यह रिवाज सच में समाजोपयोगी हैं, और नहीं तो ऐसे रीति-रिवाजों का में समय के अनुसार सामाजिक हित में बदलाव पर चिंतन अवश्य करिए।
हम देखते हैं जरा सी बात और तिल का ताड़ और राई का पहाड़, छोटी-छोटी बातों पर बहस, लड़ाई-झगड़े, आपसी बैर भाव, द्वेष, मनमुटाव ये सब समाज में नहीं होने चाहिए तभी हम बदलते दौर का, कठिनाई का और विकट समस्याओं का मिलकर सामना कर सकते हैं।
गंभीरता से अगर ध्यान दे तो समाज के पिछड़े वर्ग में प्रेम एक जरूरत हैं। जिन्हें मूलभूत आवश्यकताओं के साथ ही सामाजिक लोगों के सहयोग, दया-करुणा, अपनेपन-सहानुभति,

सहयोग-प्रेरणा, उचित मार्गदर्शन और साथ की बेहद आवश्यकता होती हैं। समाज एक कोरी कल्पना नही होना चाहिए। बाहरी आडम्बर से दूर वास्तव में एक पारिवारिक भाव का माहौल समाज में होना चाहिए, जिसमें पिछड़े वर्ग के लोग अपनी भावनाओं को निर्भीक होकर व्यक्त कर सकें। किसी मजबूरी की वजह से वे शारीरिक- मानसिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ जाते हैं उनको साथ लेकर चलना, उनकी स्थिति को ऊपर उठाना, सबसे जरूरी काम हैं। अपने सामाजिक बंधुओं को दर्द और गम की गहराई से निकाल कर खुशनुमा माहौल देना सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक दायित्व हैं। अपने ही सामाजिक जानो की रूठी हुई सोच को समझना जरूरी हैं। समाज के साथ हर व्यक्ति सहभागी बने इसके लिए जरूरी हैं- पिछड़े हुए नाराज- उदास, लोगों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास करें। समाज का विरोध क्यूँ करते हैं इसका सही कारण जाने और निदान करें तभी हम एक श्रेष्ठ समाज के जिम्मेदार नागरिक तैयार करने में सफल हो पाएंगे।
समाज हमारी एक जिम्मेदारी हैं,
जीवन की ये एक सुंदर धुरी हैं।
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