सुनील कुमार वर्मा:
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
साथ: (काव्य)
तुम सड़क.
मैं मील का पत्थर.
मैं स्थिर.
तुम्हारा लंबा सफर.
मुझे रुकना होगा.
पर तुम्हे चलना है.
मैं बतलाऊंगा मुसाफिरों को
कितनी दूर और चलना है, उन्हें ?
फिर तुम्हे आगे ले जाना है, उन्हें.
मैं जुड़ा रहूंगा तुमसे.
पर अब साथ न चल पाऊंगा.
सूने पथ पर भी रहना तुम निडर.
तुम सड़क.
मैं मील का पत्थर.
मै स्थिर.
तुम्हारा लंबा सफर.
मेरा साथ अब बस,यहीं तक.
ध्यान रहे.
लंबे सफर में मुसाफिर कोई
न जाए बहक.
न जाए भटक और न जाए थक.
हम दोनो का साथ बना रहे सार्थक.
तुम न रुकना.
एक भी मुसाफिर बचा हो
जब तलक.
तुम सड़क.
मैं मील का पत्थर.
मैं स्थिर.
तुम्हारा लंबा सफर.
तुम्हें मुसाफिरों को सुरक्षित
पहुंचाना है.
उनकी मंजिलों तक.
आज की गति पर
रखना रोक थाम.
महज दर्शक बन
न देख पाऊंगा दुखद अंजाम.
कुछ लौटेंगे भी वापस
किनारा बदलकर.
तुम्हे फिर से निभाना होगा
समकक्ष दायित्व.
उनका सहारा बनकर.
तुम सड़क.
मै मील का पत्थर.
मै स्थिर.
तुम्हारा लंबा सफर.







