संजय सोंधी,
(संयुक्त निदेशक)
शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
अमेरिका-ईरान शांति समझौता
दुनिया की सबसे जटिल और खतरनाक दुश्मनियों में से एक में आखिरकार एक बड़ी सफलता मिली है। अमेरिका और ईरान ने 14 सूत्रीय समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर कर दिए हैं, जो दशकों से चले आ रहे तनाव को कम करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। यह समझौता 28 फरवरी 2026 को शुरू हुए युद्ध को रोकने और होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलने का रास्ता साफ करता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए। खास बात यह है कि ट्रंप ने फ्रांस में जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन के साथ रात्रिभोज के दौरान इस दस्तावेज़ पर दस्तखत किए।
इस समझौते की सबसे अहम बात यह है कि अमेरिका और ईरान, अपने-अपने सहयोगियों के साथ, तुरंत और स्थायी रूप से सभी मोर्चों पर सैन्य अभियान समाप्त करने के लिए सहमत हुए हैं। इसमें लेबनान भी शामिल है, जहाँ इजराइल ईरान समर्थित हिजबुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई कर रहा था। दोनों देशों ने एक-दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने और आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का संकल्प लिया है।
समझौते के तहत 60 दिनों के भीतर अंतिम समझौते पर बातचीत पूरी करनी होगी। इस अवधि को आपसी सहमति से बढ़ाया भी जा सकता है। सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि अमेरिका तुरंत अपनी नौसैनिक नाकेबंदी हटाना शुरू कर देगा और 30 दिनों के भीतर होर्मुज जलडमरूमध्य में यातायात पूरी तरह बहाल कर देगा। इसके बदले ईरान 30 दिनों के भीतर व्यापारिक जहाजों की आवाजाही युद्ध-पूर्व स्तर पर बहाल करेगा और 60 दिनों तक जलडमरूमध्य से मुफ्त मार्ग सुनिश्चित करेगा।
आर्थिक मोर्चे पर, अमेरिका ने अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ मिलकर ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर की योजना बनाने की प्रतिबद्धता जताई है। हालांकि, अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि वह इस राशि में स्वयं योगदान नहीं करेगा। अमेरिका ने ईरान पर लगे सभी प्रकार के प्रतिबंधों को अंतिम समझौते के हिस्से के रूप में समाप्त करने का भी वचन दिया है। साथ ही, ईरानी कच्चे तेल और पेट्रोकेमिकल उत्पादों के निर्यात के लिए तुरंत छूट जारी की जाएगी और ईरान की जमी हुई संपत्तियाँ भी रिहा की जाएँगी।
परमाणु मुद्दे पर, ईरान ने दोहराया है कि वह कभी भी परमाणु हथियार नहीं बनाएगा। समृद्ध यूरेनियम और अन्य परमाणु-संबंधी मुद्दों का समाधान अंतिम समझौते में किया जाएगा। तब तक, दोनों पक्ष अपनी मौजूदा स्थिति बनाए रखेंगे – ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम में कोई बदलाव नहीं करेगा और अमेरिका नए प्रतिबंध नहीं लगाएगा।
हालाँकि, इस समझौते पर इज़राइल ने गहरी नाराज़गी जताई है। इज़राइल को इस वार्ता में शामिल नहीं किया गया और उसे समझौते का पूरा पाठ देखने की अनुमति भी नहीं दी गई। इज़राइली नेतृत्व को चिंता है कि लेबनान में युद्धविराम उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है और उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे खुद को इस समझौते का पक्षकार नहीं मानते। ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर इजराइल लेबनान में अपने सैन्य अभियान जारी रखता है, तो इसे समझौते का उल्लंघन माना जाएगा।
यह समझौता पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक समीकरण को पूरी तरह बदल सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य का फिर से खुलना वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद अहम है। अमेरिकी अधिकारियों ने इसे “प्रदर्शन-आधारित” समझौता बताया है, जहाँ ईरान को अपनी प्रतिबद्धताओं का पालन करने पर ही लाभ मिलेगा। अब देखना यह है कि क्या 60 दिनों की यह नाजुक अवधि एक स्थायी शांति का रास्ता बन पाती है, या फिर यह समझौता पहले की तरह अधूरा रह जाता है।इस समझौते के लिए दोनों पक्षों को मनाने में कतर ने बहुत अहम भूमिका निभाई है। ऐसा लगता है कि मध्य पूर्व में ईरान की प्रतिष्ठा बढ़ सकती है। सऊदी अरब, कतर और UAE ईरान के पुनर्निर्माण के लिए अरबों डॉलर देने का वादा कर सकते हैं। अगर यह समझौता लागू हो जाता है, तो इस इलाके की भू-राजनीतिक स्थिति हमेशा के लिए बदल सकती है।







