डॉ0 हरि नाथ मिश्र
(पूर्व विभागाध्यक्ष-अंग्रेजी)
का0 सु0 साकेत स्नातकोत्तर महाविद्यालय,
अयोध्या, (उ0प्र0)
(नया अध्याय, देहरादून)
गुरु-पूर्णिमा
गुरु–गरिमा है सिंधु सम, गुरु विराट आकाश।
गुरु-प्रसाद से बल मिले, यदि हो शिष्य हताश।।
गुरु समान हैं मातु-पितु, प्रथम बोल के स्रोत।
मातु-पिता-गुरु चंद्र सम, अन्य लोग खद्योत।।
सकल ज्ञान-विज्ञान का, होता गुरु से बोध।
करे सीख गुरु से मिली, जीवन में नव शोध।।
ऋषि-मुनि,संत-असंत सब, कर निज गुरु-सम्मान।
कुशल-निपुण होकर सदा, पाए जग-पहचान।।
ब्रह्मा-विष्णु-महेश ही, गुरु-गरिमा को जान।
गुरु ही तो जग ब्रह्म है, रखो सदा गुरु-मान।।
होता गुरु अतिशय मुदित, लखकर शिष्य-विकास।
गुरु की ही आशीष से, पूर्ण सकल हो आस।।
लेकर गुरु-आशीष ही, होते लोग महान।
जग देता आदर उन्हें, घटे न उनकी शान।।







