स्वर साधिका शारदा सिन्हा के सुमधुर संगीत के हमसफर, सशक्त साथी को अंतिम सलाम। 

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ओंकारेश्वर पांडेय। 

स्वर साधिका शारदा सिन्हा के सुमधुर संगीत के हमसफर, सशक्त साथी को अंतिम सलाम।

पटना की गहन शांति में, प्रेम और संगीत से सजी एक जीवनगाथा थम गई। ब्रज किशोर सिन्हा को लोग आदर से, स्नेह से बीके सिन्हा जी ही कहा करते थे। अब वे इस नश्वर दुनिया से विदा ले चुके हैं। बिहार की महान लोक गायिका और पद्मश्री से सम्मानित शारदा सिन्हा के पति, 80 वर्ष की आयु में अंतिम सांस लेते हुए, अपने पीछे एक अमिट विरासत छोड़ गए। उनका जीवन एक ऐसी सिम्फनी था, जिसमें न सिर्फ प्रेम और समर्पण की धुन थी, बल्कि संगीत के प्रति ऐसा गहरा जुड़ाव और लगाव कि स्वयं भले ही गायक न बने, किंतु अपनी धर्मपत्नी व लोक गायिका के आजीवन अडिग आधार भी थे, जो शारदा सिन्हा के संगीत को बुलंदियों तक पहुँचाने में सदा उनके साथ साये की तरह खड़े रहे। 1 अक्टूबर 1952 को बिहार के सुपौल जिले के हुलास में जन्मीं शारदा सिन्हा, लोकगीतों की दुनिया में एक प्रतिष्ठित नाम हैं। उनका ससुराल बेगूसराय जिले के सिहमा गाँव में है, जहाँ उनके जीवनसाथी ब्रज किशोर सिन्हा ने हमेशा उनकी संगीत यात्रा में अडिग समर्थन दिया। शारदा सिन्हा को ‘बिहार-कोकिला’ के रूप में पहचान मिली है और वह ‘पद्म श्री’ और ‘पद्म भूषण’ जैसे सम्मानों से विभूषित हैं।

मैथिली, बज्जिका, भोजपुरी के साथ-साथ हिन्दी में भी गीत गाने वाली शारदा सिन्हा ने अपनी मधुर आवाज से न केवल लोक संगीत को एक नई पहचान दी, बल्कि ‘मैंने प्यार किया’, ‘हम आपके हैं कौन’ और ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ जैसी लोकप्रिय फिल्मों में भी अपनी पहचान बनाई। उनके गाए गीतों ने फिल्मों और संगीत प्रेमियों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी है।

शारदा सिन्हा के पति, ब्रज किशोर सिन्हा, हमेशा उनकी इस संगीतमय यात्रा में एक सशक्त स्तंभ के रूप में खड़े रहे। उनका समर्थन और देखभाल, चाहे वह मंच पर हो या जीवन के कठिन क्षणों में, शारदा जी के संगीत के हर सुर में झलकती रही। ‘दुल्हिन’, ‘पीरितिया’, और ‘मेंहदी’ जैसे उनके गानों के कैसेट्स संगीत बाजार में छाए रहे, और उनकी आवाज़ अब भी दुर्गा-पूजा, विवाह, और अन्य आयोजनों में गूंजती है—जहां हर बार उनके पति का मौन समर्थन महसूस होता है।

बीके सिन्हा जी से मेरा परिचय कई अवसरों पर हुआ, जब मेरी पत्नी, प्रसिद्ध बहुभाषी लोक गायिका विजया भारती और शारदा सिन्हा मंच साझा करतीं। दोनों एक दूसरे से बेहद स्नेह-सम्मान आत्मीयता से जुड़ी रही हैं और इसी नाते बीके सिन्हा जी से भी हमारी मुलाकातें जब भी होती, भले ही संक्षिप्त किंतु आत्मीय होतीं। सिन्हा जी से मेरा संवाद अक्सर कुछ हल्के-फुल्के हंसी-मजाक के साथ कुछ गहरे सामाजिक-राजनीतिक संवादों से भरा रहता था। उनकी मुस्कान शांत, और दृष्टि जीवन की गहराइयों को दर्शाने वाली थी।

मुंबई में एक खास मुलाकात याद आती है, जब शारदा जी और मेरी पत्नी को सांसद संजय निरुपम ने जुहू बीच पर छठ महोत्सव के कार्यक्रम में बुलाया था। वहां बीके सिन्हा जी को करीब से देखा कि कैसे वे अपनी पत्नी के प्रति विशेष देखभाल और सम्मान में डूबे रहते थे। एक अभिभावक की तरह वह हर छोटी-बड़ी चीज का ध्यान रखते, जो अपनी गायिका पत्नी की जरूरतों को पूरा करता हो। शारदा सिन्हा जी की तरह उनके पति बीके सिन्हा जी को भी ‘पान’ चबाने का शौक था। दोनों पति-पत्नी कत्था और पान की तरह एक दूसरे से सहजता से जुड़े दिखते थे।कुछ साल पहले मैंने बीके सिन्हा जी को फोन कर शारदा जी का विस्तृत साक्षात्कार करने की इच्छा जाहिर की थी, जिसमें उनके संगीत की यात्रा को समेटने की बात थी। बीके सिन्हा जी ने इसे लेकर उत्साह दिखाया, लेकिन दुर्भाग्यवश वह साक्षात्कार कभी हो नहीं पाया। आज, मैं उनकी उस सौम्य छवि को याद करता हूं, जो हमेशा पीछे रहते हुए भी हर कदम पर प्रभाव छोड़ते थे। शारदा सिन्हा के हर लोकप्रिय गीत को संगीतमय बनाने में उनका मौन साक्ष्य-साथ गूंजता है।

दो दिन पहले एक अनहोनी घटना घटी। वे बाथरूम में गिर गये। इसके कारण उनके सिर में चोट आई और ब्रेन हेमरेज हो गया। श्री सांई अस्पताल में वेंटिलेटर पर जिंदगी ज्यादा समय साथ नहीं दे पाई। उम्र के इस पड़ाव पर यह मामूली दुर्घटना एक युग के अंत का प्रस्ताव लेकर आई थी। शिक्षा विभाग के पूर्व क्षेत्रीय उपनिदेशक के रूप में, बीके सिन्हा ने एक गरिमापूर्ण और शांत जीवन जिया। लेकिन उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यह थी कि उन्होंने अपनी पत्नी को न सिर्फ हर कदम पर समर्थन दिया, बल्कि उनके सपनों को पंख भी दिए, और वह खुद उनके जीवन का स्थायी स्तंभ बने रहे।

शारदा सिन्हा ने एक बार कहा था कि उनके पति सिर्फ उनके साथी नहीं थे, बल्कि उनके संगीत के सफर के भी सहयात्री थे। 1970 में बिहार के बेगूसराय में विवाह के बाद, बीके सिन्हा ने परिवार के भीतर कई अदृश्य लड़ाइयाँ लड़ीं, अपनी मां को इस बात के लिए राजी किया कि शारदा को उनके संगीत में आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए। जहां समाज की बेड़ियाँ होती हैं, वहां बीके सिन्हा अपनी हमसफर शारदा सिन्हा के कंठ में अपार संभावनाएं देखते थे। उनके समर्थन से शारदा सिन्हा की आवाज़ सीमाओं से परे गूंज उठी, और उनके संगीत का उजाला पूरे देश में फैल गया।

8 मई, 2020 को जब वे पटना में अपनी शादी की 50 वीं सालगिरह मना रहे थे, तो मेरी पत्नी व लोक गायिका विजया भारती विशेष रूप से शामिल होने गयी थीं। इस मौके पर शारदा सिन्हा ने फिल्म मैंने प्यार किया के अपने प्रसिद्ध गीत “कहे तोहसे सजना ये तोहरी सजनियां” को बेहद मधुर आवाज में गाकर अपने पति के योगदान के प्रति सांगीतिक आभार व्यक्त किया। उस खास मौके पर उन्होंने अपने पति को एक भावपूर्ण संदेश भी लिखा था, जिसमें उन्होंने बीके सिन्हा की अडिगता को सराहा। उन्होंने लिखा – “आप मेरे जीवन में एक मजबूत स्तंभ की तरह खड़े रहे, हर तूफान में भी अडिग, हर कठिनाई में साथ—हमारी यह यात्रा धैर्य, प्रेम और एकता की मिसाल है।”

ब्रज किशोर सिन्हा के जाने से एक अध्याय समाप्त हो गया है, लेकिन उनकी उपस्थिति एक मधुर धुन की तरह हमेशा शारदा सिन्हा के संगीत में बसी रहेगी। वह एक ऐसे शिल्पकार थे, जो मंच के पीछे रहकर भी संगीत की गहराइयों में अपना अनदेखा योगदान देते रहे। उनका प्रेम, उनकी साझेदारी, और उनकी अटूट भक्ति, इस बात का प्रतीक है कि जब दो दिल और सपने एक साथ चलते हैं, तो संगीत की गूंज अनंत हो जाती है।

आज, उनके जाने का शोक उनके परिजन समेत शारदा सिन्हा के प्रशंसक भी मना रहे हैं। लेकिन साथ ही वे उनके उस जीवन का उत्सव भी मना रहे हैं, जो प्रेम, सम्मान और उद्देश्य से भरा हुआ था—एक ऐसा जीवन जो संगीत की धुनों के बीच हमें प्रेरित करता रहेगा, हमारे दिलों में सदैव गूंजता रहेगा। (विभूति फीचर्स)

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