राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
मैनपाट, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
जीवन
ख्वाबों के सहारे कैसे गुजारे ये जीवन
रुसवा होकर दुनियां में,
अपनी ही कहानी के किरदार बनके
दर्द को चेहरे पर ओढ़े,
झूठी मुस्कान को पहने
कैसे स्वीकार ये जीवन,,
जब हर साँस घुटती है सीने में,
जब हर रात, यादों की आग में जलती है,
जब दुनिया देखती है सिर्फ पात्र को,
इंसान को छोड़ देती है अकेला।
कब तक घुट-घुटकर
कैसे अंगीकार करे ये जीवन,,
ये ज़िन्दगी जो हर दिन पूछती है,
तुम अब भी खड़े हो? “रंजन “
कब तक सीने में दबाएँ रखोगे चीखें,
और आँखों में छुपाएँ रहोगे तूफान?
मत बेकार करो, ये जीवन,,
अरे हाँ ! पर सुनो…
रुसवा होकर रोना, अंत नहीं,
ये फकत एक दृश्य था कहानी का।
जो घुटता है, वही साँस लेता है गहराई से।
जो गिरता, वही उठकर चलना सीखकर
बलिहार करता है ये जीवन,,,
ये जीवन तुम्हारा है, फिल्म का नहीं।
स्क्रीन पर जो रुसवा हुआ, उसे छोड़ दो वहीं।
और खुद को फिर से लिखो
नए दृश्य, नई भूमिका, नई सुबह
गुलजार करो ये जीवन,,







