फिर शुरू हुआ रीएडमिशन, किताबो का विक्रय और मोटी वसूली का स्कूली खेल।

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प्रभारी सम्पादक जौनपुर (यूपी): पंकज सीबी मिश्रा

       (राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार) 

 

                          (नया अध्याय, देहरादून)

 

 

फिर शुरू हुआ रीएडमिशन, किताबो का विक्रय और मोटी वसूली का स्कूली खेल।

 

मार्च और अप्रैल का महीना निजी स्कूलों के लूट और कमाई का जरिया बन जाता है। री-एडमिशन के नाम पर अभिभावकों से मोटी फीस वसूली जाती है। वाहन सुविधा के नाम पर जर्जर वाहन बिना मानक के वर्षो पुराने वैन और बसें और खुद के कैम्पस में महंगी किताबें और कापियाँ। हर साल यह शोर उठता है और दब जाता है। इसका सबसे ज्यादा बोझ मिडिल क्लास परिवारों पर पड़ रहा है। हर साल दोबारा एडमिशन के नाम पर हजारों रुपये देने पड़ते हैं। और हर साल पूरा नया बुक चेंज कर कर के लाखो का घोटाला किया जा रहा। जिस पर सीबीएससी भी चुप है और सरकार भी खामोश है। गरीब हो या अमीर सब को लूटा जा रहा है निजी स्कूल प्रबंधन द्वारा। हर साल आपके स्कूलों मे पुरे के पुरे बुक चेंज कर दिए जाते है कॉपी तक कैम्पस में बेची जाती है। हैरानी की बात यह है कि इस मुद्दे पर कोई भी नेता कोई मंत्री आगे नहीं आ रहा है सभी अपने काम से मतलब रख रहे हैं, जिससे अभिभावकों में नाराज़गी बढ़ती जा रही है। शिक्षा माफियाओं के खिलाफ मोर्चा खोला जाना अनिवार्य सा होता जा रहा। नेप लागू है, एनसीआरटी कोर्स लागू है पर तब भी निजी प्रकाशकों की किताबें चलवाई जा रही। हर स्कूल का अपना सिलेबस अपनी किताब है। और महंगी इतनी की बस कमीशन का खेल। उत्तर प्रदेश में लगातार शिक्षा के नाम पर पिछड़ रहा और इसके पीछे का जिम्मेदार निजी स्कूलों की मनमानी है। जो हर साल जारी हैं। इस पर कोई सांसद मंत्री ध्यान नहीं दे रहा है, लेट फीस के नाम पर लूट, पढ़ाई के नाम पर लूट, ट्रांसपोर्टसन के नाम पर लूट ! उत्तर प्रदेश में जिन स्कूलों में निजी प्रकाशन कोर्स चल रहा है उन स्कूलों पर कार्यवाही की जाए, जिससे पढ़ाई के नाम पर बच्चों के अभिभावकों की जेब न काटी जाए।

 

शिक्षा के नाम पर बच्चों के अभिभावकों को लूटना बंद हो इसके लिए कई बार अभियान चला, हर साल हंगामा होता है। शिक्षा का मंदिर या व्यापार का अड्डा यह सवाल बना हुआ है ? स्कूलों की मनमानी और स्टेशनरी की लूट के खिलाफ आवाज़ बुलंद करेने वालों को धमकियाँ भी मिलती रही है। हर साल नया सत्र शुरू होते ही अभिभावकों के सामने वही सवाल खड़ा हो जाता है —

 

जब बच्चा उसी स्कूल में पढ़ रहा है, क्लास आगे बढ़ रही है, तो फिर “री-एडमिशन फीस” किस बात की ली जाती है? इसी मुद्दे को लेकर सांसद राघव चड्ढा ने एक बार फिर आवाज उठाई है। उनका कहना है कि स्कूलों द्वारा हर साल ली जाने वाली दोबारा एडमिशन फीस अभिभावकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालती है और इसकी पारदर्शिता पर सवाल उठने चाहिए। अभिभावकों की दलील भी जायज है जिसके अनुसार बच्चा स्कूल बदल नहीं रहा। नया इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं जुड़ रहा। फिर हर साल एडमिशन फीस क्यों ? मध्यवर्गीय परिवारों के लिए यह फीस छोटी नहीं होती। ट्यूशन फीस, किताबें, यूनिफॉर्म, ट्रांसपोर्ट — पहले ही खर्चों की लंबी सूची है। ऐसे में “री-एडमिशन” नाम से लिया जाने वाला शुल्क कई घरों का बजट बिगाड़ देता है। निजी स्कूलों का पक्ष यह कि कई निजी स्कूलों का तर्क है कि यह फीस प्रशासनिक खर्च, रिकॉर्ड अपडेट, नई कक्षा की तैयारी और अन्य व्यवस्थाओं के लिए ली जाती है। उनका कहना है कि सालाना प्रक्रिया में संसाधन लगते हैं, इसलिए शुल्क जरूरी है। क्या संसद में नही उठना चाहिए यह मुद्दा ? यही बड़ा सवाल है — क्या यह मामला संसद के स्तर का है? तर्क ‘हाँ’ में क्यूंकि शिक्षा एक मौलिक अधिकार और सार्वजनिक महत्व का विषय है। देशभर के लाखों परिवार इसकी मनमानी से प्रभावित होते हैं। फीस संरचना में पारदर्शिता लाने के लिए राष्ट्रीय स्तर की बहस जरूरी हो सकती है क्यूंकि निजी स्कूल टीचरों को नाम मात्र की सैलरी वो भी केवल दस माह का देकर बच्चों से पूरे बारह माह की फीस वसूलते है। क्या निजी स्कूल ठीक करते है तो तर्क ‘नहीं’ में क्यूंकि सैलरी और स्कूल फीस का मामला अक्सर राज्य सरकारों और शिक्षा विभाग के अधिकार क्षेत्र में आता है निजी संस्थानों की नीतियों में केंद्र का सीधा हस्तक्षेप सीमित होता है। यह मुद्दा व्यापक है और देशभर के अभिभावकों को प्रभावित कर रहा है, तो संसद में चर्चा से पारदर्शिता और नीति-निर्माण की दिशा मिल सकती है। लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि राज्यों के स्तर पर फीस नियमन कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए।आखिर सवाल सिर्फ एक फीस का ही नहीं सवाल है शिक्षा को बोझ नहीं, अधिकार बनाए रखने का भी है। आज शिक्षा के नाम पर जो खुलेआम लूट मची है उस पर हम सबको मिलकर विचार करने की जरूरत है। निजी स्कूलों का काम बच्चों को अच्छी शिक्षा देना है लेकिन आज ये स्कूल पूरी तरह से व्यापार का केंद्र बन चुके हैं। हर साल शिक्षा बोर्ड और शिक्षा मंत्री की तरफ से बड़े-बड़े दावे और घोषणाएं की जाती हैं कि निजी स्कूल परिसर के अंदर कोई भी व्यावसायिक गतिविधि नहीं चलेगी और कोई भी स्कूल कॉपी, किताबें, स्कूल बैग या ड्रेस नहीं बेचेगा। लेकिन अफसोस कि ये आदेश सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह जाते हैं। जमीनी स्तर पर आज तक कोई सख्त कार्रवाई नहीं दिखी। आखिर क्यों प्रशासन इन निजी स्कूलों पर लगाम नहीं लगा पा रहा? क्या ये सिर्फ दिखावे की कागजी घोषणाएं हैं या फिर इसमें कुछ नेताओं और रसूखदारों की मिलीभगत है ? आज इन निजी स्कूलों में हर चीज बेची जा रही है वो भी प्रिंट रेट पर । वहां अभिभावकों को एक पैसे की भी छूट नहीं मिलती। इसके उलट जब हम स्थानीय दुकानदारों से सामान खरीदते हैं तो हम आपको ड्रेस हो स्टेशनरी हो या अन्य सामान उस पर भारी डिस्काउंट देते हैं। कुछ तो एक दर्जन कॉपी के साथ तीन-चार कॉपियां तक मुफ्त दे देते हैं क्योंकि उनकी रोजी-रोटी ग्राहकों के भरोसे ही चलती है। आपकी मेहनत की गाढ़ी कमाई से ही आज इन निजी स्कूलों की कई-कई शाखाएं खुल रही हैं, जो सीधे तौर पर छोटे व्यापारियों के हक पर डाका और अभिभावकों का शोषण है। हमें इस भ्रष्ट व्यवस्था और दिखावे की घोषणाओं के खिलाफ एकजुट होना होगा। बाजार से सामान खरीदकर स्थानीय व्यापारियों का साथ दें और निजी स्कूलों के इस अवैध व्यवसायीकरण को रोकें। सरकार और प्रशासन को अब गहरी नींद से जागना चाहिए ताकि शिक्षा का मंदिर सिर्फ मोटी कमाई और नेताओं की साठगांठ का अड्डा बनकर न रह जाए।

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