सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री/लेखिका/शिक्षिका
नवापारा/राजिम
रायपुर, (छत्तीसगढ़)
(नया अध्याय, देहरादून)
लेख –
बेटियाँ बेमिसाल होती हैं, ईश्वर का दिया हुआ उपहार होती हैं ! -सुश्री सरोज कंसारी
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बेटी है दुर्गा का रूप प्यारा,
सृष्टि में उसका है बड़ा प्यारा।
शिक्षा पाकर वो भरती उड़ान ,
दुनियां में स्वयं बना लेती है ठिकाना।
स्नेह रूपी दीप जलाती है हर घर में ,
बेटी है फुलवारी, खुशबू भरती है दिल में।
माँ की हमसाया, पिता की दुलारी ,
भाई की मुस्कान, घर की है कहानी सारी।
नाजुक सी होती है ,
पर कल्पनाओं की उड़ान ,
हिला देती है दुनियां ,
बनकर एक तूफान।
बेटी है शक्ति, बेटी है प्यार,
बेटी है जीवन, बेटी है संसार।
बेटियों की अनमोलता और उनके महत्व को समझने के लिए हमें जीवन के वास्तविक अर्थ को समझना होगा। बेटियाँ न केवल परिवार की धरोहर होती हैं, बल्कि वे समाज और देश की भविष्य भी होती हैं।
बेटियों के माध्यम से हम जीवन के वास्तविक मूल्य को समझ सकते हैं। वे हमें सिखाती हैं कि प्यार, सहानुभूति, और सहयोग क्या होता है। वे हमें जीवन के छोटे-छोटे पलों को जीने का तरीका सिखाती हैं।
बेटियों की अनमोलता को समझने के लिए हमें उनके अधिकारों और उनकी स्वतंत्रता का सम्मान करना होगा। हमें उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य, और अवसर प्रदान करने होंगे ताकि वे अपने सपनों को पूरा कर सकें।
इस प्रकार, बेटियों को ईश्वर का अनमोल उपहार मानना न केवल एक भावनात्मक अभिव्यक्ति है, बल्कि यह एक सामाजिक और दार्शनिक सत्य भी है। कुदरत की कलम से लिखी, अजीब दास्तान है बेटी, सच पूछो तो सृष्टि में, दुर्गा का अवतार है बेटी। दुर्गा, काली और चंडी के अवतार, बेटियों की सुरक्षा का बनो अब तुम ढाल। शिक्षा पाकर वो भरेगी एक नई उड़ान, शोषित, पीड़ित और दुखी न हो बेटी परेशान। स्नेह रूपी प्रकाश की दीप जलें हर देहरी में, बेटी स्नेह रूप किलकारी है, घर-आँगन की फुलवारी है, प्रेम की निर्मल बहती धारा है। माँ की हमसाया है, पिता की दुलारी, भाई की मुस्कान है,नाजुक सी होती है बेटी, पर कल्पनाओं की जब उड़ान भरती है तो हिल जाती है दुनियां। अपने हौसलों से छूना चाहती है आसमान, अपनी तुतली भाषा से, आंखों के इशारों से, मनमोहक गतिविधियों से आकर्षित करती है हर किसी को। दुनिया की रस्म-रिवाजों से वो अनजान होती है, छल-कपट, बैर की लांघ जाती है दीवार। कहाँ समझती है वो जाति-मजहब की बात? अनंत चाहतों को लेकर बढ़ती है, जैसे-जैसे आगे सामना होता है उसका खोखले कुंठित मानसिकता के लोगों से। भले ही हम आज उन्नति के शिखर पर पहुँच गए हैं, कहते हैं जमाना बदल गया, विज्ञान के युग में जी रहे हैं। फिर भी दूषित मानसिकता आज भी मौजूद है। कई घरों में बेटी-बेटा में फर्क नहीं कहता है जमाना, फिर भी दिखता है हर तरफ झूठा ही अफसाना। जैसे ही यौवन की दहलीज में पाँव रखती है, चिंता सताने लगती है बेटी के विवाह की। रिश्तेदार, पड़ोसी भी चिंतित होने लगते हैं।
गलत नहीं, कन्यादान तो महादान है, पर, वही बेटी जब ससुराल और मायके के भंवर में होती है, दोनों कुलों की लाज रखती है।…जो सीख उसे दी जाती है, उसे पूर्ण रूप से निभाती है, त्याग, तपस्या और समर्पण की देवी बन रहती है। अपने ज्ञान से मां शारदा बन, संस्कारों का आवरण ओढ़े, हर नियमों का बखूबी पालन करती है। अपने कोख में नौ माह पालती है भ्रूण को, तब मौत से जूझकर सृजन करती है। उस वक्त भर लेती है साहस, हर दर्द को सहनकर दुर्गा का अवतार होती है।
माँ बन सुबह से लेकर रात तक बच्चों की सेवा में लीन रहती है, परिवार के हर सदस्यों के हर छोटी-बड़ी बातों का ध्यान रखती है। रसोई के हर सामानों, मिर्च-मसाले से लेकर बर्तन से भी बातें करती है। उलझी-बिखरी, थकी, फिर भी स्वादिष्ट पकवान बनाती है, रातों में मीठी लोरी सुनाती है बच्चों को। जब परिवार पर मुसीबत आती है, तब चंडी, काली का रूप धारण कर सुरक्षा कवच बन जाती है। वास्तव में, वंदनीय है, बहन, माँ और बेटी, हर घर में लक्ष्मी बन रहती है। तभी तो गृहलक्ष्मी और अन्नपूर्णा माता कहलाती है।
बेटियों के लिए कविता:
बेटियाँ हो तुम ईश्वर का वरदान ,
सृष्टि में तुम्हारा है बड़ा मान।
शिक्षा, शक्ति, और प्यार से भरपूर ,
तुम्हारी उड़ान है अनंत ,
तुम्हारा भविष्य है अज़ूर।
बेटियाँ हो तुम माँ की मुस्कान ,
पिता की शान, परिवार की पहचान।
तुम्हारी हँसी में है जीवन की मिठास ,
तुम्हारी आँखों में है भविष्य की रौशनी की आश।
बेटियाँ हो तुम शक्ति, साहस, और सम्मान,
तुम्हारी उड़ान को कोई नहीं रोक सकता।
तुम्हारी आवाज़ को दबा नहीं सकते,
तुम्हारी सपनों को कोई नहीं रोक सकता।
आज भी भेदभाव की खाई है इस समाज में, बेटी के बाद बेटे की चाह को हम इनकार नहीं कर सकते। दो बेटी के बाद इंतजार रहता है बेटा हो जाए, मन्नत मांगते हैं, घर का चिराग मिले। ये कैसी विडंबना है इस समाज की…? एक तरफ कहते हैं बेटी दो कुल की लाज है, एक तरफ बेटा चाहिए वंश वृद्धि के लिए। समझ से परे है सोच, कहीं भी कभी भी नहीं रुकी है बेटी, हर पल, हर क्षण ध्यान रखती है माता-पिता का। हर दर्द समझती है, बराबर सहभागी होती है, शुरू से अंत तक परिवार के हर सुख-दुख में। तो सिर्फ बेटे ही क्यों घर के चिराग…? बेटी भी तो रोशन करती है। वाह रे समाज! तेरी हद हो गई। बेटी पराई है, ये शब्द मन को व्यथित कर देती है। जिस आँगन में खेली-कूदी, पढ़ी-लिखी,ममता के आंचल में सोई, वहीं वो पराई हो जाती है पल भर में विवाह के बाद। माता-पिता भी निश्चिंत हो जाते हैं, गंगा नहा लिए बेटी का ब्याह करके, ये बात भी किसी आश्चर्य से कम नहीं। सारी वसीयत, जमीन-जायदाद का बंटवारा सिर्फ बेटों में होता है। वाह, रे समाज! हद हो गई। बेटी कभी कोई मुसीबत में हो, ससुराल से दुखी हो या कोई सहारा न हो…! और मायके आये तो उसे बोझ समझा जाता है। हर पल बेटी को परायेपन का एहसास दिलाया जाता है।
उस वक्त न जाने कहाँ चले जाते हैं।…वे लोग जो बड़े-बड़े नारे लगाते हैं, बेटी मेरी शान है, अभिमान है,बेटी पढ़ेगी, भेदभाव नहीं बेटे-बेटी में, सब कहावत बनकर रह जाती है। ये पूरे हिंदुस्तान की बेटी की आवाज है, भले ही सुनने में अजीब लगे, पर अक्सर यही होता है। जब बेटी अपना सब कुछ छोड़कर चली जाती है ससुराल, अपना हिस्सा, जमीन-जायदाद कुछ नहीं मांगती। फिर दुख में क्यों उसे सहारा, बराबरी का प्यार, हिम्मत का हथियार, क्यों नहीं मिलता, क्यों है झूठी बातों का दामन थामे बैठे हैं? बेटी सिर्फ प्यार, अपनापन मांगती है। उसे कभी लालच नहीं होता, वो भी नहीं मिलता, धिक्कार है ऐसे लोगों को, उनकी सोच को।
बेटी के लिए पराई शब्द को एक बार हटाकर देखें! उसे आपके होने का जीव भर एहसास दीजिए। ममता का स्पर्श दें, मुश्किल में साथ दीजिए…और एक पिता, भाई और मित्र का फर्ज सदा के लिए निर्वहन करें। एक बेटी के हजारों रूप हैं, रिश्तों की जाल में उलझी रहती है, उनका सहयोग कीजिए।…निभाने में वो ही बेटी, बहन, मां, भाभी, ननद, सास, नानी, दादी और न जाने कितने नाम हैं। तभी तो कहते हैं बेटी दुर्गा स्वरूप है। हम सभी अपने हर रिश्तों का सम्मान करें, मर्यादा में रहें और खुशियों के दामन में एक-दूजे का हाथ थामे जिंदगी के हर लम्हों को जी भर जी लें।
नवरात्र में कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है, कन्या के रूप में माता अपने नौ रूप के साक्षात दर्शन देती है। सच्ची श्रद्धा-भक्ति से पूजन करें और बेटी के जीवन से भय के भूत को हटा दें। हर कोने से वहशी दरिंदों, बुरी नजर रखने वालों, बेटी का अपमान करने वालों का नामोनिशान मिटा दें। सच्चे पहरेदार बन सुरक्षा रूपी ढाल बनें, कोई भी बेटी बेखौफ कहीं भी आ जा सके। हर बेटी की रक्षा का संकल्प लेकर, कन्यापूजन को सार्थक बनाएं। बेटा-बेटी दोनों का पालन-पोषण समान रूप से करें, बराबर का हक दें और हिंदुस्तान की हर बेटी के चेहरे पर, सदा मुस्कान रहे, यही कामना करें। एक ऐसी कानून व्यवस्था जरूर बने, जिससे बेटियों की तरफ आंख उठाने से भी लोग डरें। बेटी की सुरक्षा सबकी जिम्मेदारी, आइए विचार करें।
कन्यापूजन का सिर्फ न हो कोई दिखावा ,
दुनिया में न हो वहशी दरिंदों का निशान।
शक्ति, साहस और स्वतंत्रता का दे हथियार ,
बेटियां तो होती हैं देश की आन-बान-शान।
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