”बंशीधर पाठक ”जिज्ञासु” के मार्फत – एक पड़ताल”

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सम्पादक कुमाऊंः नवीन बिष्ट

 

 

             

                   (नया अध्याय)

 

   “बंशीधर पाठक “जिज्ञासु” के मार्फत – एक पड़ताल”

                                                                  

आकाशवाणी को देश के महानगरों से लेकर उत्तराखण्ड के सुदूर सीमान्त गाँव के अंतिम छोर तक श्रोताओं की लम्बी जमात खड़ी करने वाले ”बंशीधर पाठक ”जिज्ञासु” कुमाउनी का अप्रतिम सेनानी” शीर्षक, पुस्तक के मार्फत देश के सुविख्यात पत्रकार नवीन जोशी ने , जो इस पुस्तक के लेखक हैं, की तहकीकात कतई तौर पर गहन संवेदनशीलता लिए हुए अन्वेषणात्मक है। लेखक ने जितनी सघन आत्मीयता से ”जिज्ञासु” का आत्मसात अध्ययन किया है, उन्हें बारीकी से निकट रह कर पढ़ा होगा, गढ़ा है। शायद स्वयम् बंषीधर जी भी अपने आपको इतना नहीं समझे होंगे। लेखक ने जैसा सुघड़ निष्काम संस्मरण का सृजन किया है, साहित्य सााधक ही कर सकता है। जिज्ञासु के बहाने आकाशवाणी लखनऊ के प्रसारित बहुचर्चित कार्यक्रम ”उत्तरायण” में कुमाउनी ही नहीं, गढ़वाली, जोनसारी बोली भाषाओं के प्रति ”जिज्ञासु” के अनुराग, समर्पण और गली-गली घर-घर घूम कर प्रतिभाओं को खोजने का हृदय स्पंदन जो लेखक ने महसूस किया है, वह अद्भुत है, उनकी लोक चेतना की हरियाली को भी सुवासित करता है।

यही नहीं लेखक ने अपने संस्मृण पुस्तक में लिखे में एक ओर जहॉ उस समय के नामचीन कवि, लेखकों की शिनाख्त करते हुए ऐतिहासिक दस्तावेज भी संजोने का काम किया है, वहीं लेखन में एक पत्रकार की साफगोई भी स्पष्ट दिखाई देती है। बतौर पत्रकार जिज्ञासु जी के एक इण्टरव्यू का जिक्र करते हुए लेखक ने कहा है कि- मैंने उनसे पूछा कि ”अपनी रचनात्क यात्रा में आपको परिवार का कितना सहयोग मिला ?”

”उनके जवाब ने, जो लिखित रूप में भी मुझको दिया था, ने मुझे स्तब्ध कर दिया था, शब्दशः इस तरह था-” खेद है कि मुझे मेरे परिवार की ओर से मुझे सहयोग नहीं मिला । ”

मैंने सोचा था कि अपने परिवार को, खासकर अपनी पत्नी को पूूरा श्रेय देंगे लेकिन यह क्या कह गए गुरुजी, आप ? उस दिन नहीं टोक पाया था। जब आज आप नहीं हैं तो यह लिखते हुए कुछ सवाल की गुस्ताखी करूं ? आप नाराज मत होना। मुझसे आप नाराज हुए भी नहीं कभी, भरोसा करते हुए मुझ पर। बताइए , यह क्रूर जवाब आपने क्यों दिया था ?

हाँ, आज भी मुझे आपका जवाब अन्याय पूर्ण लगता है।

 

आगे नवीन जोशी ने लिखा है कि-” पाँच जून 1955 को अल्मोड़ा से जिस देवकी देवी को आप व्याह कर लाए थे और जिस तरह से इतने वर्ष आपकी हर प्रकार से सेवा की, अगर वह पूर्ण सहयोगी नहीं थीं तो गुरुजी, कोई परिवार सहयोगी नहीं हो सकता। मैंने आपको इतने लम्बे सम्पर्क में कभी नीबू खरीदते नहीं देखा। आप सिर्फ एक चीज खरीदते सकते थे, सिगरेट का डिब्बा। घर में किताबों के अलावा आपको सिर्फ ऐश-टेª और बाथरूम के मग्गे का पता होता था। ” परिवार चलाना, बच्चे पालना क्या होता है, आप कतई नहीं जानते थे। आप भूले हों तो हों, हम कैसे भूल सकते हैं कि खुर्रमनगर ( पंतनगर ) में जब आपका मकान बन रहा था तो देवकी जी ने फटी धोती पहन कर दिन भर ईंटा-गारा ढोती थीं कि रोज मजदूरी बचेगी। आपकी रोटी बनाने के बाद वे अंधेरे में सिर पर ईंट रख कर छत के ढोले तक पहुंचाया करतीं थीं ताकी सुबह आते ही राजमिस्त्री काम पर लग सके।” 8 जून 2016 को जिज्ञासु जी के निधन के बाद फेस बुक पर लिखे गए नवीन जोशी श्रद्धांजलि के लम्बे लेख के एक हिस्से के प्रमुख बिन्दुओं का उल्लेख करते हुए अंतिम पैरा में लेखक ने कहा है कि ” और, उस लोक में अब आपको खूब पता चल रहा होगा कि कौन थीं देवकी देवी और उनका आपके जीवन एवं कर्म में कितना बड़ा योगदान रहा।”

इस प्रकार जिज्ञासु जी जैसे विशाल व्यक्तिव्य पर उनके निजि जीवन पर इतना कटु ही नहीं मर्मान्तक सवाल करने का साहस कोई उनसे अति प्रेम करने वाला ही कर सकता है।

 

बहरहाल लेखक जिज्ञासु जी से यदा कदा हुई हल्की फुल्की बात-चीत का जिक्र करते हुए “उत्तरायण” के उनके लगाव पर लिखते हैं, कि एक बार चाय की घुटकी के साथ कहने लगे ” यार, तब मैं “उत्तरायण” में आया तब मुझे कुमाउनी नहीं आती थी,” वे हँसते हुए कहते थे। कहते थे-” बचपन में देहरादून, दिल्ली, शिमला और अम्बाला रहा। पंजाबी को अपनी मातृभाषा कहा करता था। फिर कुमाउनी सीखना शुरू की। श्रीमती जी से शुरूआत की और फिर लखनऊ की कुछ कुमाउनी सयानी महिलाओं के साथ बैठा। यह कहना कि मुझे कुमाउनी नहीं आती थी, यह जिज्ञासु जी की विनम्रता ही थी।

 

नवीन जोशी ने इस किताब के पहले वाक्य की शुरूआत करते हुए पुस्तक के देर में प्रकाशित होने या अपने लिखने की व्यथा को स्वर देते हुए लिखा है – ” कम से कम पहले नहीं तो , देवकी पर्वतीया जी ( जिज्ञासु जी की पत्नी ) के जीवित रहते -रहते तो अवश्य ही, जिनकी बड़ी तमन्ना थी और उम्मीद थी कि जिज्ञासु जी पर नवीन किताब निकालेगा। अपने अंतिम दिनों की गम्भीर बीमारी और कई बार बेहोशी में भी बोल देती थीं-” बाबू पर किताब कब निकालोगे, नवीन ?“

 

यों तो उत्तराखण्ड की लोक परंपरओं की चिन्ता उत्तरायण कार्यक्रम के जरिए जगजाहिर है, लेकिन कुमाउनी के प्रति उनकी छटपहाट, ममता अपने बच्चे के प्रति मॉ जैसी थी। इस बात की तस्दीक लेखक ने स्वयम् तो की ही है, सुविख्यात इतिहासविद्, समाज शास्त्री, ”पहाड़” पत्रिका के संपादक और घुमन्तु लोक चेतना के संवाहक प्रो. शेखर पाठक ने ”कुछ न कुछ करने के बेचैनी” शीर्षक से लिखे संस्मरण में जिज्ञासु जी से अपनी पहली मुलाकात के वाकये को अपने लेख के जरिए कहा है कि- ( प्रो. शेखर पाठक के लेख की चन्द लाईने ) ” इतने में एक हाथ में सिगरेट, दूसरे हाथ में फाइल, डायरी आदि लिए खादी के कपड़ों में एक आदमी आए, कैन्टन में। जरधारी जी (उनके सहकर्मी ) ने मेरा परिचय करते हुए बताया ये चन्द्र शेखर हैं, पिथौरागढ़ से आए हैं। और मुझे बताया कि ये जिज्ञासु हैं, हमारे दगड़ी। जिज्ञासु बैठकर बतियाने लगे। बीच में यह भी पूछ लिया कि क्या ”उत्तरायण” कार्यक्रम सुनते हो। कविता करते हो ? मैंने बताया कि इसी लिए तो आज आप लोगों को खोजने निकला। जिज्ञासु सिगरेट की कस लेना भूल गए थे। धुंवे के नीचे राख दिखाई दे रही थी। जरधारी यह कहते उठे कि षाम के कार्यक्रम की तैयारी करनी है। जिज्ञासु ने कुछ देर बात कर बहुत सारी बाते मेरे बारे में जान लीं। अपने को छिपाए रहे। कहा कि जब तक यहां हो आते रहना। कभी कोई वार्ता भी तैयार करना। अब वसन्त की कवि गोष्ठी होगी तो उसमें भी आना। तमाम कवियों से मुलाकात होगी और उनको सुनोगे भी।

 

एक दिन की मुलाकात का संस्मरण को याद करते हुए शेखर पाठक ने लिखा है कि ” गिरीश ( गिरीश तिवारी गिर्दा कर किसी सन्दर्भ में जिक्र करते हुए कहा था ) अपने भीतर के सब भाव एकदम बाहर निकाल देता है और अनुरागी के भीतर बहुत ज्यादा भरा है पर सब रोके रहता है। क्या है किसी और के भीतर ढोल का समन्दर ? अनुरागी के भीतर का समन्दर बाहर आगया तो तहलका मचा देगा। चारु चन्द्र पाण्डे का बहुत आदर करते थे और उनकी उपस्थिति में सबसे अपेक्षा करते थे कि उनसे सीखें, जाने। इसी प्रभाव में एक बार गोष्ठी से चारु चन्द्र के जाने के बाद नन्द कुमार उप्रेती ने  “चूतियों के बीच से चारु चन्द्र चल पड़े” कविता लिखी थी। अपने लम्बे लेख के समापन में शेखर पाठक ने लिखा है कि ” औरों के लिए चिन्ता करना जिज्ञासु का सर्वश्रेष्ठ गुण था। अपने प्रति लापरवाही को दूसरे महत्व का बिन्दु माना जाकता है। कुछ न कुछ करने की बेचैनी उन्हें “जिज्ञासु” बनाती थी।

इनके अतिरिक्त इस संस्मरण संकलन में गणेश पाठक ने हमारे ठुलदा शीर्षक से लिखा है तो उनके पुत्र दिव्यरंजन पाठक ने – पिता जी- सुलगती सिगरेट, कागज, कलम, ठंडी चाय और सन्नाटा के जरिए पिता के रचना संसार को अपने अन्दाज में बयां किया है। चारु चन्द्र पाठक ने- सतत संघर्षों भरा जीवन के जरिए उनके संघर्षों का बखान किया है। वीना तिवारी, बहादुर सिंह बोरा “श्रीबंधु”, गोपाल दत्त भट्ट, प्रयाग जोशी, रुक्मिणी शर्मा, आलोक जोशी, घनानंद पाण्डे “मेघ”, धन सिंह मेहता  “अंजान”, एम जोशी “हिमानी”, पार्थ सारथि डबराल, त्रिलोचन पाण्डे और जगदीष जोशी के अलावा बकलम जिज्ञासु जी के सात रचनाओं का भी प्रकाशन नवीन जोशी ने किया है।

मेरा सीधा परिचय या संवाद जैसे किसी संपर्क का अवसर जिज्ञासु जी से नहीं मिल पाया। उनका पूरा परिचय नवीन जोशी की इस किताब के जरिए हुआ, जिसने मुझे प्रभावित किया। जिन महानुभाओं ने उन पर कलम चलाई है उनमें से अधिकांश कवियों ,पत्रकारों से मेरा सीधा व सघन परिचय है। इस पुस्तक के सूत्रधार नवीन जोशी हम पेशा होने के कारण उनसे अच्छी आत्मीय बात-चीत है। प्रो. शेखर पाठक ( शेखर दा) से बड़े भाई जैसा संबंध हैं, शेर सिंह बिष्ट “अनपढ” मेरे परिवारजन जैसे थे। हमारे निवास ग्राम सरस्यूं में उनकी सक्रियता तक आना- जाना बना रहा। गोपाल दत्त भट्ट बड़े भाई की तरह़ हैं, बृजेन्द्र लाल साह जिन्हें आदर से में कका (चाचा ) कह कर संबोधित करता था , नन्द कुमार उप्रेती, बहादुर सिंह बोरा “श्रीबन्धु”, लोक गायिका वीना तिवारी और जगदीशी जोशी से यजमान, पुरोहित का संबंध है, अन्य से मंच, कविकर्म और लोकगायक के तौर पर गहरा रिस्ता रहा है। जिन कवियों , लेखकों ने जिज्ञासु जी पर लिखा है , सभी ने सादर, सहज , सरल और सुग्राह्य ही कहा है। इस पूरी किताब में डा. पार्थ सारथि डबराल का जिक्र किए बिना मेरी बात अधूरी रह जाएगी। बहरहाल डबराल जी ने ‘अपनी समग्रता में  “जिज्ञासु ” काव्य पूर्ण हैं‘ शीर्षक से लिखा लेख या जिज्ञासु जी के रचना संसार का मूल्यांकन में बहुत ही तन्मयता से समझा ही नहीं, उनके कृतित्व का एकेडमिक विशलेशण किया है। इस लेख को पूरा पढ़ने के बाद ऐसा लगा कि एक सुस्वाद भोजन के बाद स्वीट डिस के रूप में बहुत ही समृद्ध, पौष्टिक मेवों से केशरादि युक्त व्यंजन का रसास्वादन करा दिया हो, तृप्ति तक।

 

कुल मिलाकर बंशीधर पाठक “जिज्ञासु” को लेकर लिखे गए, नवीन जोशी के 255 पन्नों के संकलन के संपादन में बनी, सँवरी, निखरी संस्मरणों की सुघड़ पोथी-पुन्तुरी कहें याकि उनके विशाल व्यक्तित्व, कृतित्व, समर्पण, अनुराग या लोक के प्रति दीवानगी की परा का ऐतिहासिक दस्तावेजीकरण, के रूप में सामने आई पुस्तक है।” बंशीधर पाठक “जिज्ञासु“ कुमाउनी का अप्रतिम सेनानी” एक पठनीय संकलन है। इसे अवश्य पढ़ा जाना चाहिए, ताकि इस किताब के बहाने उत्तराखण्ड के साहित्यिक, सांस्कृतिक पक्ष के अतीत से दीदार हो सके। नवीन जोशी की रचनाशीलता पल्लवित होती रहे। शुभ कामनाएं !

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