सम्पादक कुमाऊंः नवीन बिष्ट
(नया अध्याय)
ब- जरिए विज्ञान बदल रहा जनजातीय भारत
: सी पी राधाकृष्णन उप राष्ट्रपति ने प्रो. पंत को प्रदान किया सम्मान।
नई दिल्ली/ अल्मोड़ा: यूकोस्ट के महानिदेशक प्रो. दुर्गेश पंत को भारत के उप राष्ट्रपति सी पी राधाकृष्णन ने विज्ञान के माध्यम से जनजातीय जीवन में बदलाव के लिए उन्हें यह सम्मान दिया गया है। विज्ञान के जरिए बदल रहा जनजातीय भारत के लिए प्रो. पंत को यह पुरस्कार प्रदान किया गया।
इस मौक पर मुख्य अतिथि उप राष्ट्रपति सी पी राधाकृष्णन ने प्रो. पंत की सराहना करते हुए कहा कि विज्ञान प्रोद्योगिकी के में उनके विशिष्ट योगदान के लिए उन्हें इस सम्मान से नवाजा गया है।भारत मंडपम, नई दिल्ली में आयोजित “विज्ञान और प्रौद्योगिकी के माध्यम से जनजातीय जीवन में परिवर्तन” विषयक राष्ट्रीय सेमिनार में देश के विभिन्न राज्यों से आए वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं और विशेषज्ञों ने भाग लिया। इस महत्वपूर्ण आयोजन में भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम के दौरान उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (यूकॉस्ट) के महानिदेशक प्रो. दुर्गेश पंत को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए सम्मानित किया गया।
यह सम्मान न केवल प्रो. पंत के व्यक्तिगत कार्यों की सराहना है, बल्कि उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में विज्ञान आधारित विकास मॉडल की सफलता का भी प्रमाण है। समारोह में उपराष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कहा कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी आज के समय में केवल विकास के उपकरण नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन के सशक्त माध्यम बन चुके हैं। उन्होंने विशेष रूप से जनजातीय क्षेत्रों में विज्ञान के उपयोग को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया।
उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा कि भारत की जनजातीय संस्कृति और परंपराएं अत्यंत समृद्ध हैं, लेकिन आधुनिक विकास की दौड़ में कई बार ये समुदाय पीछे रह जाते हैं। ऐसे में विज्ञान और तकनीक के माध्यम से उनके जीवन स्तर में सुधार लाना सरकार और वैज्ञानिक समुदाय की साझा जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि यदि स्थानीय ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का समन्वय किया जाए, तो जनजातीय क्षेत्रों में सतत विकास की नई संभावनाएं उत्पन्न हो सकती हैं।
कार्यक्रम के तकनीकी सत्र में अपने विचार रखते हुए प्रो. दुर्गेश पंत ने विस्तार से बताया कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी का प्रभाव केवल शहरी क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दूरस्थ और जनजातीय इलाकों में भी सकारात्मक बदलाव ला सकता है। उन्होंने कहा कि विज्ञान के माध्यम से आजीविका के नए साधन विकसित किए जा सकते हैं, स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाया जा सकता है, शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता है और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी सुनिश्चित किया जा सकता है।
प्रो. पंत ने अपने प्रस्तुतीकरण में उत्तराखंड के विभिन्न जनजातीय क्षेत्रों में किए गए प्रयोगों और परियोजनाओं का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि कैसे स्थानीय जड़ी-बूटियों, पारंपरिक कृषि पद्धतियों और जल संरक्षण तकनीकों को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़कर ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में आर्थिक सशक्तिकरण किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इन प्रयासों से न केवल लोगों की आय बढ़ी है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिली है।
उन्होंने यह भी कहा कि जनजातीय समुदायों के पास पारंपरिक ज्ञान का विशाल भंडार है, जिसे संरक्षित और प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। यदि इस ज्ञान को वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ जोड़ा जाए, तो यह वैश्विक स्तर पर भी उपयोगी सिद्ध हो सकता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि कई पारंपरिक औषधीय पौधों का वैज्ञानिक परीक्षण कर उन्हें औषधि निर्माण में उपयोग किया जा रहा है।
सेमिनार में देशभर से आए विशेषज्ञों ने भी अपने विचार साझा किए। कई वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि जनजातीय क्षेत्रों में तकनीकी पहुंच बढ़ाने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म, मोबाइल एप्लीकेशन और सोलर तकनीक का व्यापक उपयोग किया जाना चाहिए। इसके अलावा, कौशल विकास कार्यक्रमों के माध्यम से युवाओं को तकनीकी रूप से सक्षम बनाना भी आवश्यक है।
कार्यक्रम में यह भी चर्चा हुई कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से जनजातीय क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। ऐसे में विज्ञान आधारित समाधान जैसे जल संरक्षण, टिकाऊ कृषि और वन प्रबंधन अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाते हैं। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि इन क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करते हुए योजनाएं बनाई जानी चाहिए।
उपराष्ट्रपति ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि भारत सरकार द्वारा जनजातीय विकास के लिए अनेक योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन इन योजनाओं की सफलता तभी संभव है जब उनमें विज्ञान और तकनीक का प्रभावी उपयोग किया जाए। उन्होंने वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं से आह्वान किया कि वे अपने अनुसंधान को प्रयोगशाला से निकालकर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाएं।
इस उन्होंने कहा कि उत्तराखंड जैसे राज्य में सीमित संसाधनों के बावजूद जिस प्रकार से वैज्ञानिक कार्य किए जा रहे हैं, वह सराहनीय है।
कार्यक्रम के अंत में आयोजकों ने सभी प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया और यह आशा जताई कि इस सेमिनार से निकले विचार और सुझाव भविष्य में जनजातीय क्षेत्रों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। इस आयोजन ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि यदि विज्ञान और परंपरा का सही समन्वय किया जाए, तो समाज के सबसे कमजोर वर्गों को भी विकास की मुख्यधारा में लाया जा सकता है।









