सुश्री सरोज कंसारी
लेखिका, कवयित्री व अध्यापिका
अध्यक्ष: कंसारी महिला संगठन
नवापारा-राजिम, (रायपुर, छ.ग.)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
लेख:
कर्तव्य पथ पर अनवरत सेवा: श्रीमती प्रमिला साहू
— सुश्री सरोज कंसारी
“परिचारिका के रूप में बिताए गौरवपूर्ण सफर और अनुकरणीय विदाई!”
—————————————————-
जब कर्तव्य की वर्दी पहन आई थीं नवापारा के प्रांगण में,
तब त्याग व तप से सेवा का संकल्प रोप दिया इस आँचल में।
अस्पताल परिसर से विदा लेती एक समर्पित और आत्मीय जीवन-यात्रा…- वही चिकित्सालय, वही गलियारे… अब माता के साथ पुत्र भी। कुछ कथाएँ समाचार-पत्रों की सुर्खियों में नहीं, काल की परतों में लिखी जाती हैं। ऐसी ही एक कथा है नवापारा की श्रीमती प्रमिला साहू की, एक परिचारिका, जिसने अपने आँचल में परिश्रम छिपाकर अपने पुत्र के स्वप्नों को पाला।
वर्ष 1989। सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, गोबरा नवापारा। उस समय ग्रामीण अञ्चलों में स्वास्थ्य सुविधाएँ परिमित थीं, और एक नारी का नौकरी करना भी सरल नहीं था। प्रमिला जी ने परिचारिका का परिधान धारण किया तो गृह-परिवार का उत्तरदायित्व और सेवाकाल के दीर्घ प्रहर, दोनों को साथ निभाना पड़ा। वेतन अल्प था, उपाय सीमित थे, पर संकल्प महान था। उन्होंने निश्चय किया कि पुत्र टेजेन्द्र को वह सब देंगे जो उन्हें प्राप्त न हो सका।
पुत्र टेजेन्द्र का बाल्यकाल इन्हीं वार्डों की गन्ध में बीता। विद्यालय छूटते ही वह सीधे माता के पास चिकित्सालय पहुँच जाता। कभी सूचिका लगते देखता, कभी रोगियों की पीड़ा सुनता। औषधियों की सुगन्ध और माता की ममता, इन दोनों के बीच उसने मन ही मन कह दिया, “मैं भी एक दिन जन-पीड़ा हरूँगा।” माता ने भी पुत्र की आँखों में वैद्य बनने की द्युति देख ली थी। दिन में सेवाकाल, रात्रि में पुत्र की पुस्तिका और लेखन सामग्री, प्रमिला जी ने निद्रा त्यागी, पर तेजेन्द्र की शिक्षा में कोई न्यूनता न आने दी।
माता का तप और पुत्र की निष्ठा, दोनों मिले तो आश्चर्य हुआ। टेजेन्द्र ने कठोर परिश्रम से चिकित्सा प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण की और पुणे के चिकित्सा महाविद्यालय से एम.बी.बी.एस. किया। शिक्षा काल में भी वह प्रायः माता को दूरभाष कर चिकित्सालय की कथाएँ सुनाता। लौटकर जब वह उसी सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में वैद्य बनकर खड़ा हुआ, जहाँ उसकी माता आज भी परिचारिका हैं, तो प्रमिला जी की नेत्र अश्रुपूर्ण हो आईं। एक माता के लिए इससे बड़ा पुरस्कार और क्या हो सकता है।
कोरोना के अन्धकारमय दिवसों में जब मृत्यु द्वार पर आघात कर रही थी, डॉ. टेजेन्द्र कोविड वार्ड के प्रभारी बनकर रोगियों के शीर्ष पर खड़े रहे। प्राणवायु का अभाव, भय, और निरन्तर सेवाकाल, फिर भी उन्होंने पराजय स्वीकार न की। उनकी निःस्वार्थ सेवा के लिए शासन ने उन्हें सम्मानित भी किया। प्रमिला जी उस समय भी सेवाकाल पर थीं, माता-पुत्र एक ही चिकित्सालय में, एक ही लक्ष्य के लिए युद्धरत थे, मानवता की रक्षा हेतु।
आज वही चिकित्सालय, वही गलियारे हैं। अन्तर केवल इतना है कि एक ओर माता परिचारिका के परिधान में रोगी को सांत्वना देती है, और दूसरी ओर पुत्र श्रवणयन्त्र कण्ठ में धारण कर चिकित्सा करता है। ग्रामवासी कहते हैं, “प्रमिला दीदी का पुत्र अब डॉक्टर बन गया।” यह गौरव केवल एक परिवार का नहीं, सम्पूर्ण नवापारा का है।
प्रमिला साहू की यह कथा बताती है, माता का त्याग यदि आधारशिला बने तो पुत्र का स्वप्न आकाश छू लेता है। उन्होंने न केवल अपने पुत्र को डॉक्टर बनाया, अपितु यह भी सिखाया कि सेवा का वास्तविक अर्थ क्या होता है।
छत्तीस वर्ष, आठ मास, चौबीस दिवस की यह सेवा-यात्रा अब विश्राम के समय पर है। एक जीवन जो सेवा से प्रारम्भ हुआ, वही सेवा के साथ एक नव चरण पर पहुँच रहा है।
————————————————-
शुभकामनाएँ एवं आदर समर्पित:







