संजय सोंधी,
(संयुक्त निदेशक)
शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
गुरु अर्जुन देव जी की शहादत: सत्य और बलिदान की अमर कहानी।
18 जून को संपूर्ण जगत गुरु अर्जुन देव जी के शहीदी दिवस को बड़े आदर और भावुकता से मना रहा है। यह दिन सिर्फ याद करने का नहीं, बल्कि उन महान गुरु के अद्वितीय साहस, शांति और सत्य के प्रति अटूट निष्ठा को दिल में उतारने का है। सिख धर्म के पांचवें गुरु जी का जीवन ज्ञान, सेवा और समानता का अनुपम उदाहरण था, जिसने तपती गर्मी में भी ठंडक बिखेर दी।
गुरु अर्जुन देव जी का जन्म 1563 में गोइंदवाल में हुआ था। वे गुरु राम दास जी के छोटे पुत्र थे। मात्र 18 वर्ष की उम्र में वे सिखों के गुरु बने। उनका पूरा जीवन लोगों को जोड़ने और भगवान के नाम पर एक करने में बीता। सबसे बड़ा योगदान था श्री आदि ग्रंथ (आज का गुरु ग्रंथ साहिब) का संपादन। उन्होंने न सिर्फ अपने पहले गुरुओं की वाणी संकलित की, बल्कि कबीर, रविदास, नामदेव, फरीद जैसे अलग-अलग संतों और सूफियों की अमृतवाणी भी इसमें शामिल की। इससे समाज में फैली छुआछूत और ऊंच-नीच की दीवारें टूट गईं। सभी को एक ही सूत्र में पिरोकर उन्होंने भाईचारे का संदेश दिया।
अमृतसर में स्वर्ण मंदिर (हरिमंदिर साहिब) की नींव रखना भी उनका अद्भुत कार्य था। चारों दिशाओं में चार दरवाजे बनवाकर उन्होंने साफ संकेत दिया कि ईश्वर का घर हर किसी के लिए खुला है – चाहे कोई किसी भी जाति, धर्म या वर्ग का हो। सूफी संत मियां मीर से नींव रखवाकर धार्मिक सहिष्णुता की मिसाल कायम की। गुरु जी की लोकप्रियता बढ़ती देख मुगल बादशाह जहांगीर और कट्टर तत्व बौखला गए। उन्होंने गुरु जी को इस्लाम कबूल करने या ग्रंथ में बदलाव करने का दबाव डाला। लेकिन गुरु जी ने साफ मना कर दिया। वे कहते थे कि सिर कट सकता है।







