सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री/लेखिका/अध्यापिका
अध्यक्ष: दुर्गा शक्ति समिति,
गोबरा नवापारा-राजिम,
रायपुर, (छत्तीसगढ़)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
“इस पल को हर गहरी साँस के साथ पूरी तरह स्वीकारो!”
– सुश्री सरोज कंसारी
………………………………………….
“सजग बने रहकर गहरी साँसें भर लें,
ठहर जाएगा यह मानसिक द्वंद्व।
खिलखिलाकर हँसिए यूँ ही बेवजह,
जिंदगी खुद संगीत बन जाएगी।”
हम मनुष्यों का मन अक्सर बीते हुए कल की यादों में उलझा रहता है या आने वाले कल की चिंता में। ऐसा क्यों? जबकि जिंदगी आज, इसी पल में है। जो गुज़र गया, उसे छोड़ देना चाहिए। आज और अभी का यह पल ही बस हमारे हाथ में है। ज़िंदगी होती ही इसी पल में है। इसी पल को अगर हम पूरी सांस के साथ जी लें, तो हमारे आधे दुख अपने आप खत्म हो जाएंगे।
जब हम गुस्से या घबराहट में होते हैं, तो हमारी साँसें तेज़ हो जाती हैं। इसके विपरीत, जब हम शांत होते हैं, तो हमारी साँस गहरी और लंबी होती है। यह दर्शाता है कि साँस और मन का आपस में एक गहरा संबंध है। यदि हम सजग होकर गहरी साँसें लेते रहें, तो हमारा मन भी शांत रहेगा।स्वीकार करने का अर्थ है—“हाँ, इस समय स्थिति ऐसी ही है।”
इस भाव को अपनाकर जब हम गहरी साँस लेते हैं, तब हमारे भीतर का मानसिक संघर्ष समाप्त हो जाता है। जहाँ यह आंतरिक लड़ाई खत्म होती है, सुकून की शुरुआत वहीं से होती है। अत:खुलकर हँसिए और कभी-कभी बिना किसी वजह के भी हँसकर देखिए। फूलों को निहारिए, प्रकृति से प्रेम कीजिए और थोड़ा रुककर जीवन के इस संगीत को सुनिए।
”चित्त-सजग हो,
प्राण का महा-आवाहन कर लें,
विराम पाएगा
यह अंतर्मन का मूक द्वंद्व।”
जब हम अपनी चेतना को पूरी तरह जाग्रत रखकर, जीवनदायिनी श्वासों को गहरे भीतर उतारते हैं, तब हम केवल वायु ग्रहण नहीं करते, बल्कि वर्तमान क्षण की अनंत सत्ता से जुड़ जाते हैं। इस सजगता के आते ही, अंतर्मन में सही-गलत और अतीत-भविष्य के बीच चल रहा मूक द्वंद्व स्वतः ही विलीन हो जाता है। वास्तविक शांति किसी बाहरी परिस्थिति को बदलने में नहीं, बल्कि इस पल की स्थिति को पूर्णतः स्वीकार कर लेने में है। इसलिए, सांसारिक कारणों से परे हटकर, जब मनुष्य अहैतुक आनंद में मुस्कुराता है, तो उसके भीतर का सारा मानसिक शोर समाप्त हो जाता है।
तब यह जीवन कोई संघर्ष या बोझ नहीं रह जाता, बल्कि अस्तित्व का अंतर्निहित संगीत बनकर प्रकट होने लगता है। जब आप बिना किसी बाहरी कारण के भीतर से आनंदित होते हैं, तो आपकी ज़िंदगी अपने आप में एक ईश्वरीय और मधुर संगीत बन जाती है।…वर्तमान को जीना किसी साधु की साधना नहीं, हर मनुष्य की आत्मिक आवश्यकता है। इसे अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाना बेहद सरल है।
भोर होते ही, बस एक मिनट मौन होकर अपनी आती-जाती साँसों की थाप को महसूस करें। जीवन के साधारण से साधारण काम करते हुए—चाहे गाड़ी चलाना हो या अपनों से बात करना—जब भी मन का भटकाव शुरू हो, ठहरें, और एक गहरी साँस भरकर खुद को केंद्र में लाएँ। जीवन कोई बड़ी घटना नहीं, बल्कि इन्हीं जागरूक और जीवंत पलों का सुंदर कोलाज है। हमारी हर खुशी, हर दुःख और हर अहसास हमारे भीतर ही सांस ले रहा है। सुख-दुःख के इस पार-उस पार, हमें बस इस बहते हुए क्षण की धारा में पूरी तरह बह जाना है।
………………………………………..







