राजकुमार कुम्भज, इन्दौर
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
दिल्ली दृश्य
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धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से, देशभर की सड़कों पर जोशो-खरोश से चल रहा छात्र-छात्राओं का “नीट पेपर लीक-कांड” विरुद्ध जारी धरना-प्रदर्शन समाप्त हो गया है।
सामान्य जनता का सामान्य जन-जीवन सामान्य हुआ। प्रसन्नता हुई।
सामान्य जनता को सामान्य राहत मिली। सीजेपी की जीत हुई,सरकार की हार हुई।
देश के शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफा लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस राजनीतिक अपरिपक्वता का परिचय दिया है, उसके परिणाम उन्हें जल्द ही देखने को मिल सकते हैं।
इस इस्तीफे से रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के उस अहंकारी-कथन की सारी हवा निकल गई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि “एनडीए में इस्तीफ़े नहीं होते हैं.”
सवाल महत्वपूर्ण है कि केवल शिक्षामंत्री के इस्तीफे की ऑंच से प्रधानमंत्री को लाॅंछित होने से कैसे बचाया जा सकता है? अंतिम ज़िम्मेदारी तो प्रधानमंत्री की ही ठहरती है। क्या वे अपनी नैतिकता स्वीकार करेंगे? क्या वे इस्तीफ़ा देंगे?
प्रधानमंत्री चाहते तो किसी एक मंत्री से इस्तीफा लेने की बजाय, सभी मंत्रियों के इस्तीफे लेकर विभागों का परिवर्तन करते हुए कुछ मंत्रियों की छुट्टी कर सकते थे। ऐसा करने से प्रधानमंत्री अपनी कुछ दृढ़ता का संकेत दे सकते थे, किन्तु वे तो पहले से ही बंधुआ हैं।
उनके अभी तक के समस्त सुसंस्कृत कार्य-कलापों से क्या यही साबित नहीं होता रहा है?
अन्यथा नहीं है कि छात्र-छात्राओं के आक्रोश में इस बार जिस घृणा और ईमानदारी ने अपनी जगह निर्मित की है, वह किसी भी राजनीतिक-सामाजिक मत-मतांतर से सर्वथा भिन्न दिखाई दे रही है।
ये आक्रोशित आंदोलन आगे नहीं बढ़ेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है और होना भी नहीं चाहिए; क्योंकि सिर्फ़ एक मंत्री के बदल जाने से कोई भी व्यवस्था बदल नहीं जाती है।
ये सोचना भावुकतापूर्ण हो सकता है कि इस आक्रोश को अब आगे चुप न बैठते हुए, व्यवस्था-परिवर्तन तथा घनघोर भ्रष्टाचार, इन दो मुद्दों पर जनहित में ऐसी ही जमीनी-लड़ाई लड़ जाना चाहिए।
देश कलंकित हो गया है, हो रहा है, इसी तरह होता रहेगा, तो इसे कौन बचाएगा? मत-मतांतर से आगे निकलकर क्या आम नागरिक आक्रोशित छात्र-छात्राओं का साथ नहीं देंगे?







