संजय सोंधी
(संयुक्त निदेशक)
शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
हाशियाकरण की प्रतिध्वनि और आदिम चेतना का अनसुना सच
हर वर्ष नौ अगस्त का दिन विश्व आदिवासी दिवस के रूप में आता है, जो हमें इतिहास के उन पन्नों को दोबारा पलटने का अवसर देता है जिन्हें मुख्यधारा के विमर्शों ने अक्सर धुंधला करने का प्रयास किया। भारत का इतिहास और संस्कृति जिस विविधता पर गर्व करती है, उसकी मूल जड़ें आदिवासी समुदाय की जीवन शैली, उनकी परंपराओं और उनके त्याग में निहित हैं। परंतु कटु सत्य यह है कि पौराणिक काल से लेकर मध्यकाल और फिर आधुनिक भारत तक, इस समुदाय के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार कभी नहीं हुआ। प्राचीन आख्यानों से लेकर आधुनिक राजनीतिक विमर्शों तक, आदिवासियों को सदैव मुख्यधारा के समाज से काट कर, जंगल और पहाड़ों तक सीमित एक ‘अन्य’ वर्ग के रूप में देखा गया। उनकी जीवन शैली, पर्यावरण संरक्षण की दूरदर्शिता और सामाजिक समरसता को सराहने के बजाय, उनके योगदान को निरंतर कम आंका गया और उन्हें हाशिये पर धकेल दिया गया।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास जब भी लिखा या पढ़ा जाता है, तो उसमें 1857 की क्रांति को आज़ादी का पहला बिगुल माना जाता है। लेकिन सच यह है कि ब्रिटिश हुकूमत और स्थानीय शोषकों के खिलाफ बगावत की पहली चिंगारी 1857 से दशकों पहले ही आदिवासियों ने सुलगा दी थी। जब मुख्यधारा के राजे-रजवाड़े अपने राज्यों की सीमाओं की रक्षा में उलझे थे, तब अपनी माटी और संस्कृति की रक्षा के लिए तिलका मांझी ने 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे। इसके बाद सिद्धो-कान्हू और चांद-भैरव के नेतृत्व में हुआ संथाल विद्रोह अंग्रेजी शासन की नींव हिला देने वाली एक महागाथा बना। वहीं, भगवान बिरसा मुंडा का ‘उलगुलान’ केवल एक सैन्य या राजनीतिक विद्रोह नहीं था, बल्कि वह आदिवासियों की सांस्कृतिक पहचान, स्वाभिमान और जल, जंगल, जमीन पर उनके पारंपरिक अधिकारों की पुनर्गठन की एक महान क्रांति थी। इसके बावजूद, देश की मुख्यधारा के इतिहास लेखन में इन महान नायकों और उनके आन्दोलनों को वह केंद्रीय स्थान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। उनके संघर्षों को इतिहास की किताबों के कुछ फुटनोट्स तक सीमित कर दिया गया।
1947 में देश की आजादी के बाद यह उम्मीद जगी थी कि स्वतंत्र भारत में इस ऐतिहासिक अन्याय को सुधारा जाएगा और आदिवासियों को उनका वाजिब हक मिलेगा। लेकिन आजादी के सात दशकों बाद भी ‘जल, जंगल, जमीन’ का मुद्दा ज्यों का त्यों खड़ा है। विकास की आधुनिक परिभाषा ने अक्सर आदिवासियों को उनकी ही जड़ों से बेदखल करने का काम किया है। बड़े बांधों, खदानों और औद्योगिक परियोजनाओं के नाम पर जिन्हें सबसे पहले अपनी बलि देनी पड़ी, वे यही आदिवासी थे। बदले में उन्हें न तो विकास का सही फल मिला और न ही सम्मानजनक पुनर्वास। आज भी भारत के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में आदिवासियों की वास्तविक और सशक्त हिस्सेदारी सुनिश्चित नहीं हो सकी है। आर्थिक रूप से उन्हें संसाधनों का संरक्षक माना जाने के बावजूद वे गरीबी और कुपोषण के शिकार हैं, और सामाजिक रूप से उन्हें मुख्यधारा से अलग-थलग रखा गया है।
विश्व आदिवासी दिवस केवल एक औपचारिक उत्सव या भाषणों का दिन नहीं होना चाहिए, बल्कि यह एक आत्ममंथन का अवसर है। जब तक हम आदिवासियों के ऐतिहासिक योगदान को स्वीकार नहीं करते और उन्हें मात्र ‘लाभार्थी’ न मानकर देश के नवनिर्माण में बराबर का साझेदार नहीं बनाते, तब तक हमारा लोकतंत्र अधूरा रहेगा। उनकी पर्यावरण-अनुकूल जीवन दृष्टि आज की वैश्विक जलवायु संकट से जूझती दुनिया के लिए सबसे बड़ा सबक है। अब समय आ गया है कि समाज और सरकारें आदिवासियों के प्रति अपनी औपनिवेशिक और उपेक्षात्मक मानसिकता को बदलें। जल, जंगल और जमीन पर उनके प्राकृतिक अधिकारों को बहाल करते हुए उन्हें देश के सामाजिक-आर्थिक ढांचे के केंद्र में लाया जाए, ताकि उनकी पहचान और स्वाभिमान अक्षुण्ण रहे।







